सीतामढ़ी : फिर मिलने के संकल्प के साथ सात दिवसीय मेले का समापन

सीतामढ़ी : फिर मिलने के संकल्प के साथ सात दिवसीय मेले का समापन

संक्षेप:

नवादा/मेसकौर, हिसं/निप्र। अगले वर्ष फिर से मिलने के संकल्प के साथ सीतामढ़ी मेला महोत्सव का बुधवार को समापन हो गया। इसके साथ ही सीतामढ़ी मेला महोत्सव लोक संस्कृति की विरासत छोड़ गया।

Dec 11, 2025 05:15 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नवादा
share

नवादा/मेसकौर, हिसं/निप्र। अगले वर्ष फिर से मिलने के संकल्प के साथ सीतामढ़ी मेला महोत्सव का बुधवार को समापन हो गया। इसके साथ ही सीतामढ़ी मेला महोत्सव लोक संस्कृति की विरासत छोड़ गया। नवादा की लोक-संस्कृति, लोक आस्था और ऐतिहासिक विरासत को समर्पित प्रतिष्ठित सीतामढ़ी मेला महोत्सव का सात दिवसीय भव्य आयोजन बुधवार को औपचारिक रूप से संपन्न हो गया। माता जानकी की जन्मभूमि सीतामढ़ी में आयोजित इस मेले ने एक बार फिर आपसी सद्भाव और आस्था का अनूठा उदाहरण पेश किया। अंतिम दिन, बुधवार की सुबह भी माता जानकी मंदिर में पूजा-अर्चना का दौर जोरों पर रहा और दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं का जुटना निरंतर जारी रहा।

LiveHindustan को अपना पसंदीदा Google न्यूज़ सोर्स बनाएं – यहां क्लिक करें।

मेले के अंतिम दिन, मंगलवार की शाम से ही इसका ढलान साफ तौर पर दिखने लगा था। बुधवार को मुख्य बाजार और मेला क्षेत्र में पिछले दिनों जैसी भारी भीड़ देखने को नहीं मिली। हालांकि, भक्तों और ग्राहकों की रवानगी आखिरी दिन भी बरकरार रही। कई दुकानदार अपनी दुकानों को समेटने की प्रक्रिया शुरू कर चुके थे, जबकि कुछ लोग अंतिम क्षणों में बाजार का जायज़ा लेते नजर आए। मेला परिसर में लगे झूले, सर्कस और अन्य मनोरंजन के साधनों के इर्द-गिर्द भी बुधवार को भीड़ कम हो चुकी थी, जो इस बात का संकेत था कि लोक-पर्व का यह महाकुंभ अब अपने विराम की ओर बढ़ रहा है। हालांकि सीतामढ़ी मेले की विशिष्ट पहचान रहे काठ बाजार में अब रवानगी छा रही है। काठ बाजार अगले एक से डेढ़ माह तक लगा रहेगा। नवादा की लोक-आस्था का बना एक बेहतर उदाहरण सीतामढ़ी मेला महोत्सव केवल एक बाजार या मनोरंजन का केंद्र नहीं, बल्कि यह नवादा की लोक संस्कृति व लोक आस्था को समर्पित एक महत्वपूर्ण आयोजन साबित हुआ। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहीं पर माता सीता ने भूसमाधि ली थी। यहीं लव-कुश का जन्म हुआ था। यह मेला हर साल इसी आस्था को नवजीवन देता है। इस वर्ष भी, इसने एक उदाहरण स्थापित किया कि कैसे आधुनिकता के दौर में भी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को बड़े उत्साह के साथ जीवित रखा जा सकता है। मेले के दौरान आयोजित भजन संध्या, लोक-नृत्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने न केवल स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान किया, बल्कि आगंतुकों को भी अपनी समृद्ध विरासत से जोड़ा। दुकानदारों के चेहरे पर दिखी खुशी सात दिवसीय इस मेले में सबसे अधिक उत्साहित दुकानदार दिखे। पूरे मेले के दरम्यान उनकी दुकानदारी काफी बेहतर रही। दूर-दराज से आए व्यापारी हों या स्थानीय छोटे विक्रेता, सभी ने इस वर्ष अच्छी बिक्री होने की बात स्वीकार की है। विक्रेताओं ने बताया कि इस साल भीड़ बहुत अच्छी रही। ग्राहकों ने न केवल पूजा-सामग्री खरीदी, बल्कि घरेलू सामान और खिलौनों की बिक्री भी जोरदार हुई है। हम इस सफल आयोजन से काफी खुश हैं। खास बात यह रही कि दुकानदारों की खुशी के साथ ही ग्राहक भी संतुष्ट रहे। मेले में उपलब्ध वस्तुओं की गुणवत्ता और वाजिब कीमतों ने ग्राहकों को आकर्षित किया। सुरक्षा व्यवस्था भी चुस्त-दुरुस्त रही, जिससे पूरे आयोजन के दौरान कोई अप्रिय घटना सामने नहीं आई। बुधवार की देर शाम तक मेला क्षेत्र पूरी तरह से सिमट गया। माता जानकी के आशीर्वाद और सफल आयोजन की यादों के साथ, स्थानीय लोग और श्रद्धालु अब अगले वर्ष के सीतामढ़ी मेला महोत्सव के इंतजार को साथ लिए विदा हुए। कुल मिला कर, यह मेला एक बार फिर यह संदेश दे गया कि आस्था और परंपरा की जड़ें आज भी गहरी हैं और जन-जीवन का अटूट हिस्सा हैं।