उपेक्षा का शिकार शोभिया नाला, अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट से किसान निराश

Mar 08, 2026 05:26 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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नवादा के शोभिया नाला का अस्तित्व संकट में है। यह नाला एक समय क्षेत्र की कृषि और जल प्रबंधन का आधार था, लेकिन अब यह कचरे और अतिक्रमण से भर गया है। किसान अब महंगे डीजल पंपों पर निर्भर हैं। अगर नाले की सफाई और पुनरुद्धार नहीं हुआ, तो क्षेत्र में जल संकट और कृषि संकट गहरा होगा।

उपेक्षा का शिकार शोभिया नाला, अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट से किसान निराश

नवादा। राजेश मंझवेकर ​नवादा जिले की भौगोलिक और कृषि संरचना में शोभिया नाला का स्थान कभी सर्वोपरि था। इसे केवल एक नाला कहना इसके महत्व को कम करने जैसा है। वास्तव में यह एक छोटी नदी के समान था। हिसुआ क्षेत्र से निकलकर शोभिया कृषि फार्म होते हुए बुधौल जंगल-बेलदारी तक जाने वाली यह जलधारा सदियों से इस इलाके की प्यास बुझाती आई है। ​अतीत में, इस नाले में साल के बारह महीने पानी का प्रवाह बना रहता था। यह प्रवाह न केवल भू-जल स्तर को बनाए रखता था, बल्कि पशु-पक्षियों और वन्यजीवों के लिए भी जीवन का आधार था। लेकिन आज, आधुनिकता की अंधी दौड़ और प्रशासनिक उदासीनता ने इसे एक गंदे नाले और झाड़ियों के ढेर में तब्दील कर दिया है।

​सिंचाई व्यवस्था पर हो गया वज्रपात ​नवादा एक कृषि प्रधान जिला है, जहां खेती पूरी तरह से मानसूनी बारिश और पारंपरिक जल स्रोतों पर टिकी है। शोभिया नाला इस क्षेत्र के दर्जनों गांवों के लिए सिंचाई का मुख्य साधन था। किसान नाले से सीधे पानी उठाकर अपने खेतों तक ले जाते थे, जिससे रबी और खरीफ दोनों फसलें लहलहाती थीं। वर्तमान में, नाले में जमा गाद और कचरे के कारण पानी का भंडारण और प्रवाह शून्य हो गया है। नतीजा यह है कि किसानों को अब महंगे डीजल पंपों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे खेती की लागत दोगुनी हो गई है। कई छोटे किसानों ने तो पानी के अभाव में खेती करना ही छोड़ दिया है। ​अतिक्रमण और प्रशासनिक विफलता ​शोभिया नाला के सिकुड़ने का सबसे बड़ा कारण भू-माफियाओं और स्थानीय लोगों द्वारा किया गया अतिक्रमण है। नाले की जमीन को धीरे-धीरे समतल कर खेती या अवैध निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकारी रिकॉर्ड में इसकी चौड़ाई जितनी दर्ज है, धरातल पर उसकी आधी भी नहीं बची है। प्रशासन की भूमिका यहां केवल एक मूकदर्शक की रही है। जल जीवन हरियाली जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद, शोभिया नाला की उड़ाही के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। हर साल जल संसाधन विभाग और स्थानीय निकाय सफाई के दावे तो करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत जलकुंभी और झाड़ियों के पीछे छिपी रह जाती है। ​पर्यावरणीय असंतुलन और आपदा ​शोभिया नाले के इस बुरे हाल पर प्रभावित किसान कहते हैं कि जब प्राकृतिक जल स्रोत अवरुद्ध होते हैं, तो प्रकृति अपना बदला लेती है। बरसात के दिनों में जब पहाड़ी क्षेत्रों से पानी आता है, तो नाले का मार्ग संकरा होने के कारण पानी खेतों और रिहायशी इलाकों में घुस जाता है। इससे जलजमाव की समस्या पैदा होती है और फसलें बर्बाद हो जाती हैं। गर्मी के दिनों में यही इलाका सूखे की चपेट में आ जाता है क्योंकि जल संचयन की कोई व्यवस्था शेष नहीं बची है। -------------------- ​जनता की आवाज़: ​1.30 साल पहले हम शोभिया नाला के पानी से किसान अपनी पूरी खेती करते थे। तब उन्हें कभी सूखे का डर नहीं सताता था। आज नाला पूरी तरह झाड़ियों से भर गया है। प्रशासन ने इसे लावारिस छोड़ दिया है। अगर इसकी सफाई और उड़ाही नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ी केवल कहानियों में सुनेगी कि यहां कभी पानी बहता था। किसानों की मांग है कि सरकार तुरंत इसकी सीमांकन कराकर खुदाई शुरू कराए। -अजय कुमार कुशवाहा, स्थानीय नागरिक। ​2.जिले के मवेशियों के लिए यह नाला वरदान था। चिलचिलाती धूप में भी जानवरों को यहां पानी मिल जाता था, लेकिन अब यहां केवल गंदगी और कीचड़ है। पानी के अभाव में अब पशुओं को दूर ले जाना पड़ता है। नाले के किनारे अतिक्रमण होने से रास्ता भी बंद हो गया है। गरीब लोग अब मुसीबत में हैं। मुख्यमंत्री की जल-जीवन-हरियाली योजना यहां फेल नजर आती है। किसानों को पुराना नाला वापस चाहिए। -मनोज कुमार, स्थानीय नागरिक। ​3.शोभिया नाला क्षेत्र का इकोसिस्टम बैलेंस करता था। प्रभावित लोगों ने कई बार लिखित आवेदन दिए, लेकिन अधिकारी फाइलें दबाकर बैठे हैं। नाले के किनारे जो अवैध कब्जा हुआ है, उसे हटाने की हिम्मत कोई नहीं दिखा रहा। यह केवल किसानों का मुद्दा नहीं है, बल्कि जलस्तर गिरने से पूरे शहर पर खतरा मंडरा रहा है। किसान जल्द ही इसके पुनरुद्धार के लिए एक बड़ा जन-आंदोलन शुरू करने की योजना बना रहे हैं। -अशोक कुमार क्रांति, स्थानीय नागरिक। ​4.प्राकृतिक जलधाराओं का मरना एक सभ्यता के अंत की शुरुआत है। शोभिया नाला का गाद से भर जाना क्षेत्र के लिए चेतावनी है। मिट्टी का कटाव और कचरा पानी के प्राकृतिक सोतों को बंद कर चुका है। इसके पुनर्जीवन के लिए वैज्ञानिक तरीके से सफाई और किनारों पर वृक्षारोपण अनिवार्य है। जिला प्रशासन को चाहिए कि इसे मनरेगा या अन्य योजनाओं से जोड़कर जल संचयन का एक मॉडल विकसित करे। -रंजन गुप्ता, स्थानीय जानकार। --------------------- सामाजिक पहल जरूरी है समाधान की राह के लिए नवादा। ​शोभिया नाला का अस्तित्व बचाना अब केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी बन चुका है। इसके समाधान हेतु कुछ जरूरी कदम उठाए जाने आवश्यकता पर प्रभावित लोग जोर देते दिख जाते हैं। लोग कहते हैं कि नाले की वास्तविक जमीन का डिजिटल सीमांकन कर अतिक्रमणकारियों को चिन्हित करना होगा। नाले की गहराई बढ़ाकर जल संचयन क्षमता में वृद्धि करना होगा। ​चेक डैम का निर्माण कर पानी के वेग को नियंत्रित करने और सिंचाई के लिए छोटे-छोटे बांध बनाना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, ​जन भागीदारी पर भी सभी जोर दे रहे हैं। कहा जा रहा है कि ग्रामीणों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक करना होगा, ताकि वे इसमें कचरा न फेंकें। आमजनों की राय है कि ​यदि समय रहते जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं त्यागी, तो शोभिया नाला केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगा और हिसुआ क्षेत्र एक बड़े जल संकट की ओर बढ़ जाएगा। ​---------------------- कभी शोभिया नाला था क्षेत्र का गौरव नवादा। शोभिया नाला का लाभ उठाने वाले वर्तमान के प्रभावित लोगों ने बताया कि शोभिया नाला कभी केवल एक जल निकासी का मार्ग नहीं था, बल्कि इसे एक बहुविकल्पीय रूप में देखा जाता था। पुराने समय में, शोभिया कृषि फार्म के आसपास के इलाकों में जब भीषण गर्मी पड़ती थी, तब भी इस नाले की गहराई के कारण इसमें पानी लबालब रहता था। मगध क्षेत्र के इस हिस्से में जल प्रबंधन की आहर-पइन प्रणाली अत्यंत विकसित थी और शोभिया नाला उसी प्राकृतिक तंत्र का एक हिस्सा था। उस समय इसके किनारों पर विशाल वटवृक्ष और पीपल के पेड़ हुआ करते थे, जो न केवल ऑक्सीजन देते थे, बल्कि मिट्टी के कटाव को भी रोकते थे। आज वे पेड़ भू-माफियाओं की कुल्हाड़ी की भेंट चढ़ चुके हैं और नाला अपनी पहचान खो चुका है। -------------------- किसानों की कमर तोड़ती खेती-किसानी की लागत, समाधान शून्य नवादा। ​शोभिया नाला के सूखने का सबसे सीधा और घातक प्रहार स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। पहले नाले के प्राकृतिक बहाव से लिफ्ट इरिगेशन के जरिए बिना किसी अतिरिक्त खर्च के सिंचाई हो जाती थी। अब किसानों को प्रति घंटा 150-200 रुपये खर्च कर बोरवेल या डीजल पंप का सहारा लेना पड़ता है। पहले इस नाले में प्राकृतिक रूप से मछलियां पाई जाती थीं, जिससे कई केवट और गरीब परिवारों की आजीविका चलती थी। पानी के जहरीले और कीचड़युक्त होने से यह स्वरोजगार पूरी तरह समाप्त हो गया है। पानी की किल्लत के कारण पशुपालकों ने अपने मवेशियों की संख्या कम कर दी है। चारे और पानी की अनुपलब्धता ने दूध उत्पादन को भी प्रभावित किया है, जिससे गांवों की प्रति व्यक्ति आय में कमी आई है। ​विशेषज्ञों की मानें तो शोभिया नाला के मरने के पीछे केवल कचरा ही कारण नहीं है, बल्कि इकोलॉजिकल इंजीनियरिंग की कमी है। पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाली मिट्टी नाले की तली में बैठ गई है। वैज्ञानिक भाषा में कहें तो इसकी वॉटर कैरिंग कैपेसिटी 80 प्रतिशत तक कम हो गई है। इसके आसपास के इलाकों का प्लास्टिक कचरा और पॉलिथीन नाले के तल में एक परत बना चुके हैं, जिससे पानी जमीन के अंदर नहीं जा पा रहा और जलस्तर लगातार गिर रहा है। नाले के प्राकृतिक घुमावों को जबरन सीधा करने या संकरा करने से पानी का वेग खत्म हो गया है, जिससे यह एक ठहरे हुए गंदे तालाब जैसा दिखने लगा है। -------------------- ​जल-जीवन-हरियाली मिशन का लाभ दिलाने पर जोर नवादा। ​बिहार सरकार की जल-जीवन-हरियाली योजना का उद्देश्य ही पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना है। ऐसे में शोभिया नाला का भला न हो पाना निराशाजनक है। स्थानीय लघु सिंचाई विभाग और मनरेगा के पास इस नाले के लिए कोई मास्टर प्लान नहीं है। चुनाव के समय शोभिया नाला का ध्यान रहता है, लेकिन जीत के बाद यह प्राथमिकता से बाहर हो जाता है। ​यदि शोभिया नाला का अस्तित्व समाप्त हो गया, तो इसके परिणाम भयावह होंगे, ऐसा प्रभावितजनों की राय है। उनका कहना है कि यह ​मरुस्थलीकरण का कराण बनेगा, जिससे उपजाऊ जमीन धीरे-धीरे बंजर होने लगेगी। भू-जल स्तर इतना नीचे चला जाएगा कि चापाकल और बोरिंग फेल होने लगेंगे। रुका हुआ गंदा पानी मच्छर जनित बीमारियों का केंद्र बन जाएगा, जिससे महामारी फैलने का डर बना रहेगा। -------------- ​समाधान के रोडमैप पर अमल की जरूरत नवादा। समाधान के रोडमैप को जमीन पर उतारने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। किसानों ने कहा कि नाले के पुराने नक्शे के आधार पर सैटेलाइट मैपिंग की जाए ताकि वास्तविक चौड़ाई का पता चल सके। नाले के दोनों किनारों पर 10-10 फीट की चौड़ाई में सघन वृक्षारोपण किया जाए ताकि दोबारा अतिक्रमण न हो और ग्रीन बेल्ट तैयार हो। ​सीवेज ट्रीटमेंट का भी लाभ लिया जाए, ताकि शहर की नालियों का पानी सीधे शोभिया नाला में गिरने से पहले फिल्टर किया जाए। संभव हो तो गंगा जल उद्वह जैसी किसी जीवित जलधारा से जोड़कर इसमें साल भर पानी का प्रवाह सुनिश्चित किया जाए। तब जा कर ही शोभिया नाला का संकट टलेगा, अन्यथा आने वाली नस्लों के भविष्य का संकट बरकरार रहेगा। यह प्रकृति की पुकार है जिसे अब अनसुना करना आत्मघाती साबित होगा। ​

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