
केजी रेलखंड बना लेटलतीफी का शिकार, कुप्रबंधन की भेंट चढ़ रहे यात्री
नवादा/हिसुआ, हिसं/निसं।भारतीय रेलवे एक ओर वंदे भारत जैसी अत्याधुनिक ट्रेनों को चलाकर अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं दूसरी ओर मगध क्षेत्र के अति महत्वपूर्ण किऊल-गया रेलखंड पर सफर करने वाले हजारों दैनिक...
नवादा/हिसुआ, हिसं/निसं। भारतीय रेलवे एक ओर वंदे भारत जैसी अत्याधुनिक ट्रेनों को चलाकर अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं दूसरी ओर मगध क्षेत्र के अति महत्वपूर्ण किऊल-गया रेलखंड पर सफर करने वाले हजारों दैनिक यात्रियों की जिंदगी अघोषित ब्लॉक और कुप्रबंधन की भेंट चढ़ रही है। तिलैया जंक्शन इन दिनों रेल कुप्रबंधन का केंद्र बन गया है, जहां शाम ढलते ही यात्रियों का धैर्य जवाब देने लगता है। हालांकि सुबह भी बहुत राहत भरी साबित नहीं हो रही है। इस रेलखंड का तिलैया जंक्शन सबसे अधिक परेशानीदायक बना पड़ा है, जहां पैसेंजर ट्रेनों के यात्री भारी परेशानी का सामना करने को बाध्य हैं।
लम्बे अरसे से कोई समाधान नहीं निकल पाना संकट का कारण बना पड़ा है। तिलैया जंक्शन के पूर्वी आउटर पर हर शाम एक ही कहानी दोहराई जाती है। गया से किऊल की ओर जाने वाली पैसेंजर ट्रेनों को आउटर पर तब तक रोक दिया जाता है जब तक कि वीआईपी ट्रेनों और मालगाड़ियों का रास्ता साफ न हो जाए। विशेष रूप से केजी मेमू (63355) और झाझा-गया मेमू (63315) के यात्री इस अव्यवस्था के सबसे बड़े शिकार बन रहे हैं। प्रत्येक शाम इन ट्रेनों को आउटर पर आधे-आधे घंटे तक खड़ा रखा जाता है। इस बीच वंदे भारत एक्सप्रेस को प्राथमिकता के आधार पर क्रॉस कराया जाता है। यात्रियों को सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता है जब वंदे भारत के गुजरने के तुरंत बाद एक मालगाड़ी को भी पार कराने के लिए पैसेंजर ट्रेन को सिग्नल नहीं दिया जाता। इस अनावश्यक प्राथमिकता के कारण साधारण रेल यात्रियों का रोजाना 45 मिनट से एक घंटा बर्बाद हो रहा है। प्लेटफॉर्म प्रबंधन का संकट: एक नंबर की मनमानी और तीन नंबर का मोह तिलैया जंक्शन पर प्लेटफॉर्म का प्रबंधन भी सवालों के घेरे में है। जंक्शन पर कुल तीन मुख्य प्लेटफॉर्म हैं, लेकिन इनका उपयोग यात्रियों की सुविधा के बजाय ट्रेन पार्किंग के लिए अधिक हो रहा है। प्लेटफॉर्म नंबर 01 को कभी भी खाली नहीं रखा जाता। यहां अक्सर कोई न कोई रैक या अन्य ट्रेन खड़ी रहती है। जबकि प्लेटफॉर्म नंबर 03 आमतौर पर राजगीर की ओर से आने वाली या उस तरफ जाने वाली ट्रेनों के लिए आरक्षित रखा जाता है। कई बार इसे लंबे समय तक खाली छोड़ दिया जाता है या इस पर ऐसी ट्रेनें खड़ी की जाती हैं जो काफी देर बाद खुलने वाली होती हैं। इन सबके बीच केवल प्लेटफॉर्म नंबर 02 ही ऐसा बचता है, जिसका उपयोग पैसेंजर ट्रेनों के लिए हो पाता है। एक ही प्लेटफॉर्म पर निर्भरता के कारण ट्रेनों को आउटर पर घंटों अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। सुबह का सफर भी बना सिरदर्द, वजीरगंज से तिलैया की अनंत दूरी समस्या सिर्फ शाम की नहीं है। सुबह के समय चलने वाली गया-किऊल मेमू (63356) की स्थिति भी दयनीय है। यह ट्रेन वजीरगंज स्टेशन तक तो अपने निर्धारित समय या मामूली देरी के साथ पहुंच जाती है, लेकिन असली खेल वजीरगंज और तिलैया के बीच शुरू होता है। इस छोटे से खंड को पार करने में ट्रेन को सवा घंटे तक फंसा दिया जाता है। नवादा और तिलैया से शेखपुरा की ओर जाने वाले दैनिक यात्रियों विशेषत: ऑफिस जाने वालों के लिए यह ट्रेन कभी लाइफलाइन हुआ करती थी, लेकिन अब यह लेटलाइन बन चुकी है। यह ट्रेन इन दिनों अपने गंतव्य तक दो से ढाई घंटे की देरी से पहुंच रही है, जिससे नौकरीपेशा लोगों की उपस्थिति पर संकट खड़ा हो गया है। यात्रियों की स्थिति अब न घर के, न घाट के वाली होकर रह गई है। सांसद के वादों के बावजूद रैक का संकट बरकरार नवादा के सांसद विवेक ठाकुर ने पूर्व में केजी रेलखंड के यात्रियों को भरोसा दिलाया था कि सभी ट्रेनों को 12 से 15 रैक (डिब्बों) के साथ चलाया जाएगा, ताकि भीड़ कम हो सके और यात्रियों को बैठने की जगह मिले। लेकिन हकीकत यह है कि आज भी अधिकांश ट्रेनें पुराने 08 रैक के साथ ही चल रही हैं। डिब्बों की संख्या कम होने के कारण ट्रेनों के भीतर पैर रखने की जगह नहीं होती। ऊपर से ट्रेनों का घंटों लेट होना यात्रियों के मानसिक और शारीरिक तनाव को बढ़ा रहा है। सांसद के आश्वासनों के बावजूद रेल प्रशासन इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाता नहीं दिख रहा है। ------------------ यात्रियों की व्यथा: 1.मैं रोज तिलैया जंक्शन से शेखपुरा के लिए अपने कार्यालय के लिए जाता हूं। शाम को वापसी के समय तिलैया आउटर पर ट्रेन का रुकना तय है। वंदे भारत को पास कराना समझ आता है, लेकिन उसके पीछे मालगाड़ी को भी प्राथमिकता दी जाती है। गरीब की पैसेंजर ट्रेन को रेलवे ने कचरा समझ लिया है। हमारा कीमती समय रोजाना प्लेटफॉर्म और आउटर पर बर्बाद हो रहा है। -जीतेन्द्र कुमार, कृषि कर्मी, मनवां, हिसुआ, नवादा। 2.सुबह की मेमू ट्रेन से क्लास के लिए निकलता हूं। वजीरगंज तक सब ठीक रहता है, लेकिन उसके बाद तिलैया पहुंचते-पहुंचते ट्रेन कब दो घंटे लेट हो जाती है, पता ही नहीं चलता। रैक भी सिर्फ आठ हैं, जिसके कारण डिब्बे में चढ़ना युद्ध जीतने जैसा है। सांसद महोदय ने 15 रैक का वादा किया था, लेकिन इस पर कोई अमल होता नहीं दिखता। -नीरज कुमार, सांख्यिकी कर्मी, अनंतपुरा, नवादा। 3.रेलवे प्लेटफॉर्म प्रबंधन में पूरी तरह फेल है। तिलैया जंक्शन पर प्लेटफॉर्म नंबर 01 और 03 का सही इस्तेमाल नहीं होता। यात्रियों को केवल दो नंबर पर धकेल दिया जाता है। बुजुर्गों और महिलाओं के लिए आउटर पर खड़ी ट्रेन में एक-एक घंटा बिताना किसी सजा से कम नहीं है। पानी और शौचालय की सुविधा के बिना ट्रेन में फंसे रहना बेहद कष्टदायक है। -मनिन्द्र कुमार, कोर्ट कर्मी, नवादा। 4.अपने कार्यालय कार्य से मुझे शेखपुरा तक किऊल-गया रेलखंड से सफर करना पड़ता है। पहले यह रेलखंड समय पालन के लिए जाना जाता था, लेकिन अब यहाँ अघोषित ब्लॉक रहता है। मालगाड़ियों को पास कराने के लिए पैसेंजर ट्रेनों की बलि दी जा रही है। रेल मंत्री और स्थानीय सांसद को इस कुप्रबंधन पर तुरंत ध्यान देना चाहिए, ताकि आमजनों को राहत मिल सके। -नीरज कुमार, सांख्यिकी कर्मी, कुहिला, अकबरपुर, नवादा। --------------------- दोहरीकरण का फायदा नदारद, घंटों लेट चल रही यात्री ट्रेनें नवादा। पूर्व मध्य रेलवे के अंतर्गत आने वाले किऊल-गया रेलखंड पर दोहरीकरण का फायदा सिरे नदारद है। अब भी यात्री ट्रेनें घंटों लेट चल रही हैं। केजी रेलखंड पर यात्री और मालगाड़ी समेत एक्सप्रेस ट्रेन के सुगम परिचालन के लिए वर्षों से प्रतीक्षित डबल लाइन परियोजना का कार्य पूरा हो जाने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि ट्रेनों की रफ्तार बढ़ेगी, उन्हें क्रॉसिंग के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा और उनकी टाइमिंग सुधरेगी। हालांकि, हकीकत इसके विपरीत है। डबल लाइन चालू हो जाने के महीनों बाद भी, इस महत्वपूर्ण रेलखंड पर ट्रेनों की स्थिति जस की तस बनी हुई है। हद तो यह कि यात्री ट्रेनों को अब भी दो से तीन घंटे की देरी से परिचालित किया जा रहा है। इतना ही नहीं अब तो एक नए बखेड़े का सामना भी करना पड़ रहा है। तीन नए क्रॉसिंग प्वाइंट बाघी बरडीहा, चातर तथा मंझवे में आधे-आधे घंटे तक ट्रेन को रोका जाना बेहद भारी पड़ रहा है। सुविधाविहीन इन स्टेशनों पर रात में ट्रेन का काफी देर तक रोक कर रखा जाना सुरक्षा के दृष्टिकोण से चिंता का कारण बन रहा है। कुल मिला कर, इन दिनों यह रोज की परेशानी बन गयी है। -------------------- आधे घंटे का इंतजार, घंटों में बदला नवादा। यात्रियों का अनुभव बताता है कि दोहरीकरण का कोई ठोस लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है। पहले जहां सिंगल लाइन होने के कारण एक ट्रेन को दूसरे के पास होने का इंतजार करना पड़ता था, वहीं अब डबल लाइन होने के बावजूद ट्रेनों को अगले प्रमुख स्टेशन पर पटरी खाली नहीं होने के बहाने बेवजह तीन नए बनाए गए क्रॉसिंग प्वाइंट वाले स्टेशनों पर रोक कर रखा जा रहा है। स्थानीय यात्रियों की शिकायत है कि इन स्टेशनों के अलावा तिलैया जंक्शन के दोनों साइड के आउटर पर ट्रेनें आधे घंटे से लेकर एक घंटे तक खड़ी कर दी जा रही हैं। इस विलंब से सिर्फ लंबी दूरी की एक्सप्रेस ट्रेनों और मालगाड़ी को मुक्ति मिली हुई, जबकि लोकल पैसेंजर ट्रेनों की तो फजीहत चरम पर है, जिससे दैनिक यात्रियों समेत तमाम सवारियों का जीवन बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। ------------------- मालगाड़ी की अधिकता, तिलैया जंक्शन बनी बड़ी बाधा नवादा। इस परिचालन गतिरोध का एक प्रमुख कारण मालगाड़ियों की अत्यधिक आवाजाही और तिलैया जंक्शन पर बन रही अव्यवस्था है। केजी रेलखंड मुख्य रूप से कोयला और खाद तथा नमक आदि के परिवहन के लिए एक महत्वपूर्ण रूट है। डबल लाइन हो जाने के बाद, रेलवे ने इस खंड पर मालगाड़ियों का दबाव काफी बढ़ा दिया है। तिलैया जंक्शन, जो इस खंड का एक महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु है, वहां मालगाड़ी के लिए अतिरिक्त लूप लाइन या बाईपास लाइन का अभाव है। जब कोई मालगाड़ी तिलैया पहुंचती है, तो उसे कई बार मुख्य यात्री लाइन पर ही खड़ा करना पड़ता है, जिससे यात्री ट्रेनों के आवागमन के लिए जगह नहीं बचती। मालगाड़ी के गुजरने या उसके खड़े रहने तक पैसेंजर ट्रेनों को मजबूरन आस-पास के छोटे स्टेशनों अथवा तिलैया आउटर पर रोक दिया जाता है। इस कारण, जो ट्रेनें पहले से ही निर्धारित समय से विलंब हो कर चल रही होती हैं, वे घंटों लेट हो जाती हैं। यहां अक्सर सभी पटरियों पर ट्रेन और मालगाड़ियों का खड़ा रहना रेल आवागमन पर भारी पड़ जाता है और यह यात्रियों के लिए कोफ्त पैदा कर देता है।

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