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कौआकोल के जेपी आश्रम में नए साल पर पिकनिक मनाने जुटते हैं सैलानी

कौआकोल के जेपी आश्रम में नए साल पर पिकनिक मनाने जुटते हैं सैलानी

संक्षेप:

नवादा/कौआकोल, हिसं/एसं।कौआकोल स्थित जेपी आश्रम में पहली जनवरी को खूब गहमागहमी रहेगी। पिकनिक रवानगी की तैयारी में अभी से जिलेवासी जुट गए हैं।

Dec 24, 2025 03:11 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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नवादा/कौआकोल, हिसं/एसं। कौआकोल स्थित जेपी आश्रम में पहली जनवरी को खूब गहमागहमी रहेगी। पिकनिक रवानगी की तैयारी में अभी से जिलेवासी जुट गए हैं। यहां आने वाले लोग ऐतिहासिक दर्शन समेत पिकनिक मनाने का अलग ही आनंद उठाएंगे। जेपी आश्रम के अलावा बोलता पहाड़ और देवनगढ़ का अवशेष आदि देखने यहां लोग पहुंचते हैं। नए साल के आरंभ पर दिन को विशिष्ट बनाने बनाने के लिए पिकनिक के बहाने जिले भर के लोग यहां जुटते हैं। यहां के महत्व को बस इसी समझा जा सकता है, अक्सर नए साल पर जिला प्रशासन के आला हुक्मरान यहां परिभ्रमण को पहुंचते हैं। समाजवाद के प्रखर नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जन्मभूमि सिताब दियारा की तरह ही उनकी कर्मस्थली कौआकोल का सोखोदेवरा आश्रम काफी प्रसिद्ध है।

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भारत में ही नहीं विदेशों में भी चर्चित इस स्मारक स्थल पर लोग वर्ष भर तो आते ही हैं, जबकि नए साल पर यहां का भ्रमण करने वाले और पिकनिक के उद्देश्य से आने वालों की संख्या हर वर्ष बढ़ती ही जा रही है। 1954 में हजारीबाग जेल से भागने के बाद जयप्रकाश नारायण ने कौआकोल के सोखोदेवरा के पास पहाड़ी से सटे घनघोर जंगल में एक कुटिया बना स्थानीय लोगों को इकट्ठा कर उनमें देश सेवा व क्रांति के विकास का पाठ भरने का काम शुरू किया था। यही कुटी आज दर्शनीय है। उनके ही अथक प्रयास से सोखोदेवरा ग्राम निर्माण मंडल परिसर में ही कृषि विज्ञान केन्द्र की स्थापना की गयी। यहां भी उन्नत प्रभेद की फसलों को देखने एवं बाग-बगान का आनन्द लेने लोग जुटते हैं। पिकनिक स्पॉट है कौआकोल का बोलता पहाड़ कौआकोल प्रखंड के तरौन गांव के पास बोलता पहाड़ अवस्थित है। इस इलाके की प्राकृतिक छटा और सुंदरता देखते ही बनती है। पर्वत श्रृंखलाओं में जंगलों की हरियाली के बीच मनोरम वादियों में अवस्थित इस पहाड़ के नीचे कुछ भी बोलने के बाद हुबहू आवाज लौटकर वापस आती है। इसी कारण यह बोलता पहाड़ के नाम से जाना जाता है। यहां नव वर्ष के अवसर पर बिहार समेत इसके पड़ोसी राज्य झारखंड के इलाके से लोग पिकनिक मनाने आते हैं। चर्चा है कि रामायण काल में कागभुशुण्डि जी तरुवन के इसी पहाड़ी के पास बैठ कर प्रवच़न किया करते थे। रमणीय है महंत बाबा का देवस्थल इस स्थान से लगभग 400 फीट की ऊंचाई पर एक देवस्थल है। जिसे लोग महंत बाबा स्थल के नाम से जानते हैं। बोलता पहाड़ से उत्तर की तरफ एक प्राचीन गुफा है जिसके एक दीवार पर लाल रंग का घड़ी नुमा चित्र अंकित है, जो कोहबरवा के नाम से जाना जाता है। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यह चित्र ईसा पूर्व का है। यहां से आधा किलोमीटर की दूरी पर खोपड़ो पहाड़ी है। इस पहाड़ी के एक गुफा की दीवार में दो फीट चौड़ी, ढाई फीट ऊंची तथा एक फीट गहराईका एक आलमीरा बना हुआ है। ठीक उसी के नीचे एक फर्शनुमा स्थान है। तीन लोगों के बैठने के इस स्थान को किसी तपस्थली का स्थान कहा जाता है। इस गुफा के बौद्ध कालीन होने की बात बताई जाती है। -------- आज भी मौजूद है जेपी का अवंतिका बाग, रहेगी कड़ी सुरक्षा जेपी का अवंतिका बाग आज भी उनकी कर्मस्थली सोखोदेवरा के आश्रम परिसर में मौजूद है। जिसे जेपी ने खुद बहंगी से पानी ढोकर उसमें लगे पेड़ पौधों को सींचने का काम किया करते थे। उन्होंने शौक से इस बगीचे को अपनी ही हाथों से लगाया था। जहां वे नित्य प्रतिदिन अपने साथियों के साथ बैठा करते थे। इतना ही नहीं आज भी यहां जेपी के हाथों खुद से निर्माण किए गए मिट्टी के की भवन मौजूद हैं। जेपी ने इस मकसद से इन भवनों का निर्माण किया था, ताकि लोग खुद ही स्वाबलंबी बन सकें। यह बाग और परिसर बेहद दर्शनीय स्थल बन कर रह गया है। हर बार की तरह इस बार भी एक जनवरी को यहां पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रहेगी।