
ठंड में ठिठुर रही मजदूरों की उम्मीद, काम नहीं मिलने पर खाली हाथ लौट रहे गांव
नवादा में कड़ाके की ठंड और घने कोहरे के कारण मजदूरों का काम ठप हो गया है। प्रजातंत्र चौक पर मात्र 10-12 मजदूरों को काम मिल पा रहा है, जबकि अन्य खाली हाथ लौट रहे हैं। रैन बसेरे भी खाली हैं और मजदूर घर लौटने को मजबूर हैं। प्रशासन ने सुरक्षा और रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं की है।
नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। सुबह के आठ बज रहे हैं, लेकिन शहर के प्रजातंत्र चौक पर मजदूरों के हुजूम के बावजूद निराशा वाला माहौल है। आम दिनों में यहां सैकड़ों मजदूरों का मजमा लगा रहता था, जहां राजमिस्त्री और लेबर काम की तलाश में जुटते थे तो एक अलग ही हलचल रहती थी। आज यहां गिनती के 10-12 लोगों को काम मिल सका है और शेष काम मिलने की प्रतीक्षा में खड़े हैं, जिनके चेहरे पर ठंड की ठिठुरन से ज्यादा काम न मिलने की चिंता की लकीरें गहरी हैं। नवादा जिले में इस समय कड़ाके की ठंड और घने कोहरे का सितम जारी है।
जहां आम लोग अपने घरों में रजाई के भीतर दुबके हैं, वहीं दिहाड़ी मजदूरी कर पेट पालने वालों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। कंकपाती ठंड ने न केवल उनके शरीर को जकड़ लिया है, बल्कि उनके हाथों से काम भी छीन लिया है। नवादा जिले में निर्माण कार्य लगभग ठप पड़े हैं। ठंड के कारण लोग घरों का काम शुरू नहीं करा रहे हैं। चातर के रहने वाले 55 वर्षीय मजदूर रामविलास बताते हैं, पिछले चार दिनों से शहर आ रहे हैं, लेकिन दोपहर तक इंतजार करने के बाद खाली हाथ लौटना पड़ता है। घर में राशन खत्म होने को है, समझ नहीं आता बच्चों को क्या खिलाएंगे। यह अकेले रामविलास की कहानी नहीं है। जिले के सैकड़ों मजदूर इस समय बेकारी की दोहरी मार झेल रहे हैं। काम नहीं मिलने के कारण कई मजदूर इन दिनों काम की तलाश में आने से भी कतराने लगे हैं, लेकिन पेट की आग के शमन को लेकर कुछ कमाई की आस में उन्हें शहर का रूख करना ही पड़ता है। रैन बसेरे में पसरा है सन्नाटा, मजदूर लौट जाते हैं घर नवादा नगर परिषद द्वारा संचालित रैन बसेरों में भी सन्नाटा पसरा है। भारी ठंड और काम का अभाव रैनबसेरों को मजदूर विहीन कर चुके हैं। कभी काम की अधिकता रहती थी तो अनेक मजदूर रात में रैन बसेरों में ठहर जाते थे। हालांकि ज्यादातर मजदूर साइट पर ही ठहरना मुनासिब समझते हैं, लेकिन वर्तमान में परिस्थिति यह है कि मजदूर काम मिलने या न मिलने की स्थिति में अपने गांव ही लौट जाना चाहते हैं, ताकि घर में ठंड से बचाव भी हो जाए और रूखा-सूखा ही सही, कम से कम घर का दाना-पानी तो मिल जाए। काम की अधिकता और मौसम की अनुकूलता पर कार्य स्थल यानी साइट पर ठहराव मजदूरों के लिए आम बात रहती थी, लेकिन वर्तमान में परिस्थितियां काफी अलग हैं। वैसे भी नवादा शहर में स्थित एक मात्र रैन बसेरा सदर अस्पताल में स्थित है, लेकिन यहां की बिछाने के लिए मिलने वाली पतली दरी और ओढ़ने के लिए दिए जाने वाले हल्के कंबल इस भीषण ठंड को रोकने में नाकाम हैं। ऐसे में मजदूर घर वापसी में ही भलाई समझते हैं। दिक्कत यह भी है कि नियमानुसार रैन बसेरों के बाहर अलाव की रहने वाली व्यवस्था भी केवल कागजों तक सीमित है। मजदूरों को ऐसी विकल्पहीनता में कम या ज्यादा कमाई रहने की स्थिति में भी परिवार संग ही घर पर साथ समय बितना श्रेयस्कर लगता है। मजदूर रामस्वरूप ने कहा कि साहब, आज दिन भर से चाय-बिस्कुट पर हैं। अगर कल काम नहीं मिला, तो भूखे सोने की नौबत आ जाएगी। आजीविका का कोई वैकल्पिक साधन भी नहीं हो रहा उपलब्ध नवादा के इन मजदूरों का संघर्ष केवल ठंड से नहीं, बल्कि उस सिस्टम से भी है जो उन्हें आपदा के समय सुरक्षा देने में विफल रहा है। प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ठंड के इन दो महीनों में इन भूमिहीन मजदूरों के पास आजीविका का कोई वैकल्पिक साधन हो। वर्तमान में तो यही हाल है कि जब तक सूरज की तपिश नहीं बढ़ती, तब तक नवादा के इन चौक-चौराहों पर मजदूरों की उम्मीद यूं ही ठिठुरती रहेगी। ---------------------------- मजदूरों की व्यथा: सुबह 06 बजे से आ कर कम से कम 10 बज बजे तक तो जरूर उम्मीद रहती है कि कोई काम मिल जाएगा, लेकिन जैसे ही इससे अधिक समय बीतता है, हमें कोई पूछने वाला तक नहीं रहता। इतनी ठंड है कि हड्डियां कांप रही हैं, पर घर की मजबूरी यहां खींच लाती है। इतना बुरा हाल है कि घर का चूल्हा जलना मुश्किल हो गया है। हमारी सुध कोई तो ले। -तस्लीम जमाली, भदौनी, नवादा। गांव में हमें काम मिलता नहीं, इसलिए बाध्य हो कर शहर का रूख करते हैं। वर्तमान में हाल इतना बुरा है कि यहां शहर आ कर भी कुछ दिहाड़ी बन पाने की आस नहीं दिख रही है। कड़ाके की ठंड और कोहरे ने सब ठप कर दिया है। सरकार कहती है कि सभी के लिए रोजगार की गारंटी है, पर हमें तो सिर्फ पेट की भूख ही नसीब हो पा रही है। -मोहम्मद जमाल, इस्लामनगर, नवादा। इन दिनों ठंड की वजह से लोग काम ही नहीं करवा रहे। लोगों को लगता है कि काम के घंटे कम पड़ जाते हैं। ऐसे में सीमेंट-बालू का काम सब बंद पड़ा है। दो वक्त की रोटी के लिए दिन भर इस चौराहे पर ठिठुरना पड़ता है। घर में बाल-बच्चे आस लगाए बैठे रहते हैं कि कुछ खाने की वस्तु शाम को घर आएगी, लेकिन हम खाली हाथ लौटने को बाध्य हैं। -अरुण राजवंशी, नरहट, नवादा। इस ठंड में काम की कमी के कारण हमें कोई पूछ ही नहीं रहा है। सुबह की कड़ाके की ठंड में यहां खड़े रहकर भी हाथ खाली रह जाते हैं। समझ नहीं आता कि यह ठंड कब खत्म हो और हमारे दिन बदलें। सरकार तो हमारी सुधि ले ही नहीं रही। स्थिति काफी गंभीर हो कर रह गयी है। न जाने कब हमारी आमदनी नियमित हो पाएगी और कम हमारे दिन बदलेंगे। -सुबोध राजवंशी, बभनौर, नवादा।

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