
जिले में 350 एकड़ में शून्य जुताई तकनीक से हो रही रबी की बुआई
नवादा जिले के किसान पारंपरिक खेती को छोड़कर जीरो जुताई तकनीक को अपनाने लगे हैं। इस विधि से लागत कम होने के साथ ही पैदावार में भी वृद्धि हो रही है। किसान अब लगभग 350 एकड़ में गेहूं की बुआई इस तकनीक से कर रहे हैं, जिससे उनकी आय में सुधार और पर्यावरणीय लाभ भी हो रहा है।
नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। नवादा जिले की खेती-किसानी एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रही है। यहां के प्रगतिशील किसान अब खेती की पुरानी और पारंपरिक विधियों को छोड़कर शून्य जुताई तकनीक को अपना रहे हैं। यह आधुनिक कृषि विधि न केवल किसानों के लिए कम लागत में अधिक पैदावार सुनिश्चित कर रही है, बल्कि उन्हें जलवायु अनुकूल खेती की ओर भी अग्रसर कर रही है। रबी सीजन-2025-26 के लिए जिले के किसान लगभग 350 एकड़ भूमि में गेहूं की बुआई इसी विशिष्ट तकनीक के माध्यम से करने पर केंद्रित हैं, जो नवादा की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
शून्य जुताई तकनीक यानी जीरो टिलेज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें धान की कटाई के बाद खेतों को बिना जोते ही अगली फसल यानी गेहूं की सीधी बुआई की जाती है। किसान इस कार्य के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए उपकरण जीरो-टिल सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल मशीन का उपयोग कर रहे हैं। प्रगतिशील किसान मुसाफिर कुशवाहा, मनोज कुशवाहा और ईश्वरी प्रसाद ने बताया कि पारम्परिक खेती में गेहूं की बुआई से पहले खेत को ट्रैक्टर से तीन से चार बार जोतना पड़ता था, जिसमें भारी डीजल और श्रम की लागत आती थी। साथ ही इसमें काफी समय भी खर्च होता था, जिससे बुआई में अनावश्यक देरी होती थी। लेकिन जीरो टिलेज मशीन का उपयोग करने पर यह सारा श्रम और खर्च बच जाता है। यह मशीन एक ही बार में बीज और खाद को सीधे मिट्टी में गहराई तक पहुंचा देती है। इस मशीन की क्षमता और सटीकता अत्यंत उच्च है। यह प्रति हेक्टेयर लगभग 100 किलोग्राम बीज की सटीक बुआई सुनिश्चित करती है। साथ ही, बीज के साथ ही आवश्यक खाद भी डालने की व्यवस्था होने से किसानों का समय और श्रम दोगुना बच रहा है। एक ओर जहां जुताई और बुआई के अलग-अलग चरण समाप्त हो गए हैं, वहीं कम समय में अधिक क्षेत्र को कवर करने की क्षमता के कारण किसान समय पर बुआई करने में सक्षम हो रहे हैं, जिसका सीधा लाभ फसल के बेहतर उत्पादन के रूप में मिलता है। आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ का गणित शून्य जुताई विधि का आकर्षण केवल इसकी सरलता में नहीं है, बल्कि इसके ठोस आर्थिक और पर्यावरणीय लाभों में निहित है। किसानों ने बताया कि एक एकड़ खेत की जुताई में जहां 1500 से 2000 रुपए तक का खर्च आता था, वहीं जीरो टिलेज तकनीक से यह लागत 500 से 700 रुपए तक सिमट जाती है। डीजल आदि की बचत से किसानों का मुनाफा सीधे बढ़ जाता है। इधर, जिला कृषि पदाधिकारी अजीत प्रकाश ने बताया कि जुताई न करने से मिट्टी की ऊपरी परत बनी रहती है, जिससे मिट्टी का क्षरण रुकता है। धान के अवशेष यानी पराली मिट्टी पर मल्च की तरह कार्य करते हैं, जो मिट्टी की नमी को बनाए रखने में मदद करते हैं और खरपतवारों के जमाव को भी कम करते हैं। यह पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पराली जलाने की समस्या भी स्वतः ही हल हो जाती है। समय पर और सटीक बुआई, मिट्टी में नमी के बेहतर संरक्षण और मिट्टी के बेहतर स्वास्थ्य के कारण, इस विधि से गेहूं का उत्पादन पारंपरिक विधि की तुलना में प्रति एकड़ 2 से 3 क्विंटल अधिक प्राप्त होता है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि भी सुनिश्चित हो जा रही है। किसानों की जुबानी: आत्मविश्वास और विशेषज्ञता पूर्व में नवादा जिले के लिए शून्य जुताई तकनीक से गेहूं की बुआई का एक विशिष्ट लक्ष्य निर्धारित होता था, जो लगभग 350 से 400 एकड़ का ही रहता था। हालांकि, अब जिले को कृषि विभाग से लक्ष्य मिलना बंद हो गया है, लेकिन नवादा के किसानों में इस तकनीक को अपनाने का उत्साह कम नहीं हुआ है। प्रगतिशील किसान मुसाफिर कुशवाहा ने बताया कि शुरुआत में वैज्ञानिक स्वयं गांवों में आकर किसानों की उपस्थिति में इस तकनीक से बुआई कराते थे, ताकि किसानों का आत्मविश्वास बढ़े। लेकिन अब किसान न सिर्फ स्वयं इस तकनीक में पारंगत हो चुके हैं, बल्कि वे अपने आस-पास के अन्य किसानों को भी इस विधि से बुआई के लिए प्रेरित कर रहे हैं। विभिन्न गांवों के किसान अब अपने स्तर पर जीरो-टिल सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल मशीन का उपयोग कर रहे हैं। यह किसानों की आत्मनिर्भरता को दर्शाता है और यह सिद्ध करता है कि एक बार सही ज्ञान मिलने पर किसान उसे किस तरह सफलतापूर्वक अपना लेते हैं। ------------------------

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