
मकर संक्रांति: स्नान व दान होता है शुभ फलदायक, रखें विशेष ध्यान
मकर संक्रांति हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो सूर्य के उत्तरायण होने के साथ जुड़ा है। इस दिन भक्तों में खासा उत्साह है। ज्योतिषाचार्य पंडित धर्मेंद्र झा के अनुसार, इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है, जिसे विधि-विधान से करना चाहिए। यह दिन सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है।
नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। मकर संक्रांति हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक आधार वाले त्योहारों में से एक है। इस वर्ष भी मकर संक्रांति को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है। मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के परिवर्तन का संगम है। मकर संक्रांति पर सूर्य का उत्तरायण होना सकारात्मकता और देव लोक का द्वार खोलता है। शहर के ज्योतिषाचार्य पंडित धर्मेंद्र झा बताते हैं कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी दिन से देवताओं का दिन शुरू होता है और उत्तरायण की अवधि प्रारंभ होती है।
शास्त्रों में दक्षिणायन को नकारात्मकता और उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। यही कारण था कि महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति की प्रतीक्षा की थी। वे अपार पीड़ा सहते हुए शर-शैय्या पर लेटे रहे और जैसे ही सूर्य उत्तरायण हुए, उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया, क्योंकि माना जाता है कि उत्तरायण में देह त्याग करने वाले जीव जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर ब्रह्म गति को प्राप्त होते हैं। गंगा स्नान का शास्त्रोक्त तरीका, श्रद्धा और नियम का रखें ख्याल पंडित धर्मेन्द्र झा के अनुसार, गंगा स्नान का फल तभी पूर्ण मिलता है जब उसे विधि-विधान से किया जाए। उन्होंने विशेष नियम साझा करते हुए बताया कि गंगा तट अथवा किसी नदी में स्नान के लिए जाते वक्त नंगे पांव पैदल चलकर जाना सबसे उत्तम माना गया है। यदि कोई वाहन या जूते पहनकर तट तक जाता है, तो उसे स्नान का केवल एक चौथाई पुण्य ही प्राप्त होता है। जल में प्रवेश करने से पूर्व गंगा मैया को हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए। पवित्र जल को अपने पैर लगने के कारण देवी से क्षमा मांगनी चाहिए और आचमन के बाद ही प्रवेश करना चाहिए। गंगा स्नान के दौरान साबुन लगाना, कपड़े धोना, तैरना या जल में थूकना वर्जित है। पूजा या हवन के बाद की सामग्री जल में प्रवाहित करना भी वर्जित माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, गंगा अथवा पवित्र नदी में तीन बार डुबकी लगाना आवश्यक है। स्नान के बाद शरीर को तौलिया या वस्त्र से नहीं पोंछना चाहिए, बल्कि उसे हवा और सूर्य के प्रकाश से स्वतः सूखने देना चाहिए, ताकि गंगा की ऊर्जा शरीर में समाहित हो सके।

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