
कौआकोल : बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं करमाटांड़ के ग्रामीण
कौआकोल, शिवशंकर सिंहस्वाधीनता के 77 साल बीत जाने के बाद भी कौआकोल प्रखंड की महुडर पंचायत के करमाटांड़ गांव के लोग बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। जंगल एवं पहाड़ की गोद में बसे महुडर पंचायत के करमाटांड़...
कौआकोल, शिवशंकर सिंह स्वाधीनता के 77 साल बीत जाने के बाद भी कौआकोल प्रखंड की महुडर पंचायत के करमाटांड़ गांव के लोग बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। जंगल एवं पहाड़ की गोद में बसे महुडर पंचायत के करमाटांड़ गांव प्रखंड मुख्यालय कौआकोल से करीब 32 किलोमीटर दूर है। इस गांव में घटवार (राय) जाति के लगभग चार सौ लोग निवास करते हैं। इनके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पक्की सड़क आज भी एक सपना है। लोग कच्चे रास्ते एवं पगडंडी पर चलकर आवागमन करते हैं। सूखे मौसम में तो किसी प्रकार काम चल जाता है। मगर बारिश के दिनों में कच्चे रास्ते और पगडंडी पर चलना दुष्कर होता है।
ऊपर से जंगल और पहाड़ को लांघकर बाजार अथवा कहीं और जाना खतरा भरा काम होता है। सबसे बड़ी समस्या तो उस वक्त उत्पन्न होती है जब किसी बीमार व्यक्ति अथवा गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने की बारी आती है। पक्की सड़क के अभाव में उन्हें खाट पर लादकर डॉक्टर के पास पहुंचाना पड़ता है। 16 किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचते हैं कौआकोल करमाटांड़ गांव के ग्रामीणों को 16 किलोमीटर की दूरी जंगल पहाड़ लांघते हुए पैदल तय कर प्रखंड मुख्यालय कौआकोल पहुंचना पड़ता है। सड़क मार्ग से कौआकोल जाने के लिए उन्हें सबसे पहले 7 किमी दूरी पैदल तय करके महुलियाटांड़ के पास मुख्य सड़क तक पहुंचना होता है। इसके बाद ई-रिक्शा अथवा टेम्पो से 25 किलोमीटर सफर कर लोग कौआकोल पहुंचते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि गांव से कौआकोल बाजार तक पहुंचने के लिए यातायात की कोई सुविधा नहीं है। लिहाजा एक माह के लिए दैनिक उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी करनी पड़ती है। मगर जीवन रक्षक दवाओं की जरूरत पड़ने पर बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है। खास कर तब, जब कोई व्यक्ति काफी बीमार पड़ गया हो। इस परिस्थिति में कई बार लोगों को जान भी गंवानी पड़ी है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सीधे कौआकोल पीएचसी जाना पड़ता है। पीडीएस का राशन उठाने के लिए गांव से पैदल आठ किलोमीटर की दूरी तय कर जंगल पहाड़ को लांघकर महुडर जाना पड़ता है। गांव में प्राथमिक विद्यालय तो है पर शिक्षक कभी नहीं आते हैं। जिसके कारण गांव में शिक्षा की स्थिति काफी बदतर है। तथा की लगभग आबादी अनपढ़ बनी हुई है। आंगनबाड़ी केंद्र भी सिर्फ दिखावे की वस्तु बनकर रह रही है। धरातल पर नहीं उतर सकी है विकासात्मक योजनाएं हर घर नल का जल का नारा यहां के निवासियों को मुंह चिढ़ा रहा है। क्योंकि इस गांव में यह योजना धरातल पर नहीं उतरी है। नतीजन आज भी यहां के निवासी अपनी स्तर से चापाकल लगाकर पीने को बाध्य हैं। करीब चार सौ की आबादी के लिए वर्षों पूर्व लगाए गए सरकारी तथा गैर सरकारी चापाकल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच गया है। गर्मी के दिनों में चापाकल का पानी भी पाताल पहुंच जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि ऐसी हालत में प्यास बुझाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। गांव की गली-नाली का नहीं हुआ पक्कीकरण मुख्यमंत्री की महत्वकांक्षी योजना सात निश्चय के तहत प्राथमिकता के आधार पर गांवों में नाली-गली का पक्कीकरण की बात कही गई थी। लेकिन करमाटांड़ गांव में न तो पक्की नाली का निर्माण हुआ और न ही गली का पक्कीकरण किया गया। नतीजा बारिश के बाद गलियों में कीचड़ उत्पन्न हो जाता है। वहीं नाली का पानी रास्ते पर बहते रहने से लोगों को नारकीय स्थिति का सामना करना पड़ता है। नहीं बना शौचालय, जंगल की ओर शौच को जाते हैं ग्रामीण सरकार खुले में शौच से मुक्ति दिलाने के लिए घर घर शौचालय का निर्माण करवा रही है। ताकि कोई भी व्यक्ति खुले में शौच नहीं जाए और बीमारियों से बचाव हो सके। मगर करमाटांड़ गांव के किसी भी घर में शौचालय का निर्माण नहीं हुआ है। लिहाजा लोगों को शौच के लिए जंगल की तरफ जाना पड़ता है। ग्रामीण बताते हैं कि शौचालय निर्माण के लिए उनके पास पैसा नहीं है। सरकारी स्तर पर शौचालय निर्माण के लिए उन्हें कोई राशि नहीं मिली है। दर्जनों गरीब परिवार आवास योजना से वंचित करमाटांड़ के निवासियों के मुताबिक इस टोले में करीब 45 परिवार रहते हैं। जिसमें से एक परिवार को भी प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं मिला है। लिहाजा यहां अधिकांश लोग मिट्टी व खपरैल के मकान में किसी प्रकार गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। कई लोगों का मिट्टी का मकान गिर चुका है तो किसी का मकान गिरने के कगार पर है। कोई परिवार टूटे छप्पर पर प्लास्टिक, तो कोई पुआल की छौनी डालकर गुजर बसर कर रहा है। पत्तल बना कर बेचना है इनका मुख्य व्यवसाय ग्रामीण गणेश राय, मूसो राय, टूकलाल राय, रामदेव राय, बिजेंद्र कुमार, तुलसी राय आदि बताते हैं कि खेती बारी का संसाधन नहीं होने के कारण वे लोग खेती गृहस्थी नहीं कर सकते। भू-जल का स्तर काफी नीचे रहने के कारण गांव में बोरिंग आदि भी नहीं है। लिहाजा लोग जंगल से सखुआ का पत्ता लाकर उससे पत्तल बना कर बाजार में बेचते हैं। जिससे उन्हें प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 70 से 100 रुपए की आमदनी हो जाती है। जो जीविका का मुख्य साधन है। इस रोजगार के लिए सड़क काफी जरूरी है। चूंकि पत्तल को बेचने के लिए बाजार ले जाने होते हैं। सड़क के लिए ग्रामीणों द्वारा दर्जनों बार क्षेत्रीय विधायक और सांसद से अनुरोध किया गया बावजूद इसके आजतक पक्की सड़क निर्माण की दिशा में कोई काम नहीं किया गया। वहीं किसी अन्य प्रकार के विकास कार्य भी नहीं कराए गए। ग्रामीणों की शिकायत है कि आजादी के लगभग 77 वर्ष बीतने को हैं पर एक बार भी क्षेत्रीय मुखिया, विधायक अथवा सांसद कभी भी लोगों की समस्या से अवगत होने के लिए गांव नहीं पहुंचे हैं। ग्रामीणों द्वारा मतदान वक्त सड़क का मुद्दा उठाया जाता है। लेकिन ग्रामीणों को कोरा आश्वासन के अलावा आज तक कुछ भी नहीं मिला। जनप्रतिनिधियों के रवैए से निराश करमाटांड़ गांव के लोग इस उम्मीद के साथ प्रशासन की ओर टकटकी लगाए हैं कि शायद प्रशासन के लोग उनकी समस्या को हल कर दें। साफ सफाई की नहीं है व्यवस्था सरकार द्वारा गांवों की साफ सफाई को लेकर तरह तरह की योजनाएं व कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। पर स्थानीय अधिकारियों एवं ग्रामीणों की निष्क्रियता के कारण इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता दिख रहा है। स्थानीय पदाधिकारियों से लेकर जनप्रतिनिधियों द्वारा गांव देहातों में सफाई के नाम पर लाखों रुपए खर्च किए जाने का काम किया जा रहा है। बावजूद यह योजना धरातल पर उतरता नहीं दिख रहा है। जिसका एक उदाहरण करमाटांड़ गांव भी है । जहां ग्रामीणों को स्वच्छता अभियान मुंह चिढ़ाने का काम कर रहा है। मुख्य गली (पीसीसी सड़क) की स्थिति देखरेख के अभाव में पूरी तरह से नारकीय बनी हुई है। बीच सड़क पर ही आस पास के घरों से निकलने वाली नालियों एवं शौचालय से निकलने वाली दुर्गंधयुक्त गंदी पानी का जमाव हो जाने से सड़क नाला का रूप ले चुका है। कचड़े का लगा है अंबार गांव वासियों की शिकायत है कि पंचायत के मुखिया लापरवाही के कारण गांव के विभिन्न घरों से कचरा का उठाव एवं निस्तारण किए जाने का समुचित व्यवस्था नहीं हो सका है। जिसके कारण लोग जहां तहां खुले स्थानों पर ही कचड़ों का जमाव कर दे रहे हैं। जिससे सार्वजनिक जगहों एवं गलियों में जहां तहां कचड़ों का अंबार लगा हुआ है। गांव के लोगों का अशिक्षित होने के कारण इसके दुष्प्रभाव पर भी ध्यान नहीं दिया जाता है और न ही संबंधित जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों द्वारा ही कभी इसके लिए लोगों को जागरूक करने का काम किया जाता है कि इससे कौन कौन से नुकसान होते हैं और इसका निस्तारण किस प्रकार किया जा सकता है। लिहाजा गांव की गलियों, घरों के आगे, सार्वजनिक स्थलों आदि पर कचरों का अंबार लगा हुआ है। जिस पर अक्सर ही छोटे- छोटे बच्चे खेलते, बैठते व लेटते रहते हैं। लोगों की व्यथा सड़क के अभाव में हमलोग अभिशप्त जीवन जीने को विवश हैं। टेक्नोलॉजी के युग में भी करमा टांड़ गांव के लोग देश दुनियां से कटे हुए हैं। लिहाजा गांव के लोगों पक्की सड़क तक पहुंचने के लिए कम से कम 5 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करने पड़ते हैं। इस परिस्थिति में बुजुर्ग लोगों को भारी परेशानी होती है। रामदेव राय, ग्रामीण। सरकारी मुलाजिमों एवं क्षेत्रीय विधायक व सांसद के अनदेखी के कारण करमाटांड़ गांव तक विकास की किरण नहीं पहुंच सकी है। ग्रामीणों को शिक्षा, सड़क, पेयजल, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए भी तरसना पड़ रहा है। आज भी यहां के लोग 18 वीं सदी जैसे जिंदगी जीने को विवश हो रहे हैं। ज्ञानी राय, ग्रामीण। ग्रामीणों को जंगल और पहाड़ पैदल पार करके दैनिक उपयोग के सामना के लिए कौआकोल जाना पड़ता है। सरकारी अनाज उठाने के लिए 8 किमी दूर महुडर जाना पड़ता है। पर जब किसी की तबीयत खराब हो जाती है तो उन्हें अस्पताल तक पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। लाचार होकर इलाज के लिए जंगली जड़ी बूटी का सहारा लेना पड़ता है। मीनमा देवी, ग्रामीण। विकास की बाट जोहते हुए उम्र बीत गई। नेताओं को सिर्फ हमलोगों का वोट चाहिए। कोई हमारी समस्या का समाधान करने वाला नहीं है। नेताओं से आश्वासन के सिवा आज तक कुछ नहीं मिला। लिहाजा आज के दौर में भी हमलोग पशुवत जीवन जीने के लिए विवश हैं। इसके प्रति न तो कोई अधिकारी गंभीर दिखते हैं और न ही कोई जनप्रतिनिधि। टूकलाल राय, ग्रामीण।

लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




