नवादा में बीमार है स्वास्थ्य तंत्र, रेफर पर टिकीं लाखों जिंदगियां

Feb 17, 2026 04:26 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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​नवादा। राजेश मंझवेकरनवादा जिला वर्तमान में स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में एक गहरे संकट से गुजर रहा है। 2026 की शुरुआत में भी यहां का चिकित्सा ढांचा आधुनिकता से कोसों दूर है।

नवादा में बीमार है स्वास्थ्य तंत्र, रेफर पर टिकीं लाखों जिंदगियां

नवादा। राजेश मंझवेकर नवादा जिला वर्तमान में स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में एक गहरे संकट से गुजर रहा है। 2026 की शुरुआत में भी यहां का चिकित्सा ढांचा आधुनिकता से कोसों दूर है। जिले की करीब 25 लाख की आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाएं केवल कागजों पर स्वस्थ दिखती हैं, जबकि हकीकत में यहां का पूरा तंत्र रेफर वाली व्यवस्था यानी जिले के अस्पतालों से जिलों या पटना स्थित विशिष्ट अस्पतालों तक भेजने पर टिकी है। जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति यह है कि यहां डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। सरकारी आंकड़ों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, जिले में विशेषज्ञों और नर्सों के लगभग 50 से 70 फीसदी तक पद रिक्त पड़े हैं।

इसका सीधा परिणाम यह होता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज जब अस्पताल पहुंचते हैं, तो उन्हें वहां केवल कंपाउंडर या आयुष डॉक्टर मिलते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों के अभाव में मामूली जटिलता वाले केस को भी तुरंत पावापुरी (नालंदा) या पटना रेफर कर दिया जाता है। आमलोगों ने मुखर हो कर कहते मिले कि इस हाल में, नवादा को केवल नए भवनों की नहीं, बल्कि उन भवनों में बैठने वाले संवेदनशील और कुशल डॉक्टरों की जरूरत है। जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित कर त्वरित निर्माण और रिक्त पदों पर नियमित बहाली तथा सम्पूर्ण संसाधनयुक्त व्यवस्था ही इस रेफरल राज को खत्म कर सकती है। दूरी की मार, कर रही और भी बीमार जिले के सुदूर इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए इलाज किसी युद्ध को जीतने जैसा है। जिले के अनेक ऐसे क्षेत्रों का उदाहरण है, जहां अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र की इमारत तो खड़ी है, लेकिन वहां सुविधाओं और जांच मशीनों का नामोनिशान नहीं है। मजबूरन, एक सामान्य प्रसव या तेज बुखार के मरीज को भी उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर कम से कम 15 से 25 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय तक जाना पड़ता है। अक्सर गंभीर स्थिति में मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। एम्बुलेंस की अनुपलब्धता इस समस्या को और भयावह बना देती है। अधर में लटका बुनियादी ढांचा और जमीन विवाद केंद्र और राज्य सरकार ने हर पंचायत में हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर खोलने का लक्ष्य रखा था, लेकिन नवादा में यह योजना जमीन की अनुपलब्धता की भेंट चढ़ गई है। कई केंद्रों का निर्माण जमीन का चयन नहीं हो पाने के कारण या विभाग के पास स्पष्ट एनओसी नहीं रहने के कारण जहां के तहां वाली स्थिति में पड़ी है। जहां भवन बन भी गए हैं, वहां बिजली, पानी और शौचालयों की बुनियादी व्यवस्था तक नहीं है। नर्सों पर काम का बोझ नर्सों पर उनकी क्षमता से तीन गुना अधिक काम सौंप दिया गया है। इसका भी बुरा असर पड़ रहा है। एक वार्ड में 40 मरीजों पर एक नर्स तैनात होती है, जिससे देखभाल की गुणवत्ता गिरती है। नाइट शिफ्ट में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होते। अगर सरकार रिक्त पदों पर जल्द बहाली नहीं करती, तो मौजूदा स्टाफ भी तनाव का शिकार हो जाएगा। उन्हें भी काम करने के लिए पर्याप्त संसाधन और सहयोग चाहिए होता है, जिसका अभाव उन्हें काफी खटकता रहता है। जाहिर है वर्तमान संकटपूर्ण दौर से बाहर निकलने के लिए प्रशासन को रेफरल की आदत छोड़कर उपचार की नियत अपनानी होगी। रेफरल का जाल, गरीब की जेब पर डाका नवादा सदर अस्पताल में भी वेंटिलेटर और आधुनिक डायग्नोस्टिक किट की कमी अक्सर देखने को मिलती है। जब सरकारी अस्पताल हाथ खड़े कर देता है, तो मरीजों के पास दो ही रास्ते बचते हैं। या तो जान जोखिम में डालकर पटना के चक्कर काटें या शहर के निजी नर्सिंग होम में जाकर अपनी जमा-पूंजी लुटा दें। दोनों ही स्थिति आम मरीजों व उनके परिजनों के लिए जी का जंजाल साबित हो रही है, जिसका कोई भी स्थायी समाधान निकलता नहीं दिख रहा है। ------------------- आम-ओ-खास की बातें: 1.नवादा की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे बड़ा कैंसर स्टाफ की कमी है। जब तक पीएचसी स्तर पर गायनेकोलॉजिस्ट और सर्जन की नियुक्ति नहीं होगी, तब तक रेफरल का सिलसिला नहीं थमेगा। सरकार भवन तो बना देती है, लेकिन मानव संसाधन पर ध्यान नहीं देती। 70 प्रतिशत पद खाली होना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शर्मनाक है। बुनियादी ढांचे के साथ-साथ डॉक्टरों की सुरक्षा और उनके रहने की व्यवस्था भी सुधरनी चाहिए। -प्रगति श्रीवास्तव, समाजसेवी, नवादा। 2.यूं तो अब गांव-गांव में अस्पताल हो गए हैं, लेकिन वहां सिर्फ ताला लटका रहता है। महिलाओं को प्रसव पीड़ा होने पर अमूमन निजी गाड़ी किराए पर लेकर 15 से 25 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय के लिए भागना पड़ता है। रास्ते में गाड़ी खराब हो जाए अथवा ट्रैफिक वाला झंझट झेलने की नौबत इस बीच आ जाए, तो सहज ही समझा जा सकता है कि उस परिवार को क्या मुसीबतें उठानी पड़ी होगी? पास के केंद्र में डॉक्टर होते, तो संकट नहीं रहता। -अमरदीप सिन्हा, शिक्षक, नवादा। 3.जमीन की कमी ने जिले के हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों का गला घोंट दिया है। कई जगहों पर संसाधन की कमी ने पूरी व्यवस्था को लकवाग्रस्त कर रखा है। प्रशासन फाइलें घुमाता रहता है और जनता इलाज के लिए तरसती है। लोगों ने कई बार सिविल सर्जन को ज्ञापन दिया, लेकिन तमाम कमियों या कार्य प्रक्रियाधीन बताकर बात टाल दी जा रही है। नवादा के स्वास्थ्य तंत्र को आईसीयू से बाहर निकालने की जरूरत है, तब ही सबका भला हो सकता है। -डॉ.अरविंद कुमार सिंह, प्राध्यापक, केएलएस कॉलेज, नवादा। 4.2026 में भी अगर हम डिजिटल हेल्थ की बात करते हैं और नवादा में एक डिजिटल एक्सरे तक के लिए लाइन लगानी पड़ती है, तो यह विडंबना है। जिले के युवाओं को स्वास्थ्य के क्षेत्र में रोजगार नहीं मिल रहा, और अस्पतालों में पद खाली हैं। तकनीक का अभाव और पुरानी पड़ चुकी मशीनें मरीजों की जान की दुश्मन बनी हुई हैं। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, नवादा के लोग इलाज के लिए पटना और पावापुरी पर ही निर्भर रहेंगे। -निखिल बरनवाल, युवा कारोबारी, नवादा। -------------- संसाधनों की जंग और सिस्टम की बेबसी नवादा। जिले के स्वास्थ्य ढांचे में केवल डॉक्टरों की कमी ही समस्या नहीं है, बल्कि कई ऐसे पहलू हैं जो मिलकर एक पूर्ण संकट पैदा करते हैं। 2026 के आधुनिक दौर में भी ये बुनियादी कमियां जिले के विकास की राह में रोड़ा बनी हुई हैं। जिले के सुदूरवर्ती क्षेत्रों जैसे कौआकोल, गोविंदपुर, सिरदला और मेसकौर के पहाड़ी इलाकों में संस्थागत प्रसव आज भी एक चुनौती है। हालांकि सरकारी आंकड़ों में सुधार का दावा किया जाता है, लेकिन धरातल पर स्थिति यह है कि ममता और आशा कार्यकर्ताओं को समय पर प्रोत्साहन राशि नहीं मिलती, तो सारा किया-धरा निरर्थक चला जाता है और पूरी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो कर रह जाती है। वर्तमान स्थिति यह है कि नवादा सदर अस्पताल के अलावा अन्य अनुमंडलीय अस्पतालों में रक्त भंडारण की बहुत उचित व्यवस्था नहीं है। प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव की स्थिति में महिलाओं को अक्सर पावापुरी मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है, जिससे रास्ते में ही उनकी जान को खतरा बना रहता है। इधर, एम्बुलेंस सेवाएं जिले के विशाल भौगोलिक विस्तार के सामने बौनी साबित हो रही हैं। नवादा के कई गांव ऐसे हैं, जहां पक्की सड़कें नहीं हैं। बरसात के दिनों में जब नदियां उफान पर होती हैं, तो एम्बुलेंस गांव तक पहुंच ही नहीं पाती। सरकारी एम्बुलेंस के समय पर न पहुंचने का फायदा निजी एम्बुलेंस चालक उठाते हैं। वे मरीजों के परिजनों से मनमाना किराया वसूलते हैं और अक्सर कुछ खास निजी क्लीनिकों से साठगांठ कर मरीजों को वहां भर्ती कराने का दबाव बनाते हैं। -------------------- मानसिक स्वास्थ्य और टेलीमेडिसिन की विफलता नवादा। डिजिटल इंडिया के युग में नवादा में टेलीमेडिसिन (ई-संजीवनी) की शुरुआत तो हुई, लेकिन इंटरनेट की खराब कनेक्टिविटी और बिजली की आंख-मिचौली ने इसे बेअसर कर रखा है। इसके अलावा, जिले में एक भी सरकारी मनोरोग विशेषज्ञ स्थायी रूप से उपलब्ध नहीं है। तनाव, अवसाद और नशे की लत से जूझ रहे युवाओं के लिए जिले में कोई पुनर्वास केंद्र या परामर्श केंद्र सक्रिय नहीं है। लोग आज भी मानसिक बीमारियों के लिए ओझा-गुणी या नीम-हकीमों के चक्कर काटते हैं। तमाम संकटों के बीच, सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवा की योजना तो है, लेकिन अक्सर दवाएं बाहर से लाने की नौबत बनी रहती है। गरीब मरीजों को मजबूरी में अस्पताल के ठीक सामने स्थित निजी मेडिकल स्टोर से महंगी दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं। प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों की संख्या भी जिले की आबादी के अनुपात में नगण्य है, जबकि जो भी हैं, वह निष्क्रिय हैं। जीवन रक्षक दवाओं तक के लिए मरीजों को छोटे कस्बों से जिला मुख्यालय तक की दौड़ लगानी पड़ती है। ------------------ आयुष और वैकल्पिक चिकित्सा की उपेक्षा नवादा। जिले में बड़ी संख्या में आयुष यानी आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी डॉक्टर तैनात हैं, लेकिन उन्हें अक्सर प्रशासनिक कार्यों या ओपीडी में एलोपैथिक दवाइयां लिखने के लिए मजबूर किया जाता है। आयुष पद्धतियों के लिए अलग से फार्मेसी या पंचकर्म जैसी सुविधाओं का अभाव है, जिससे इस प्राचीन चिकित्सा पद्धति का लाभ जनता को नहीं मिल पा रहा है।

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