जिले में सोना उगल रही पराली, 19 किसानों ने बदली अपनी किस्मत

Newswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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नवादा जिले के किसान अब पराली को सोने की तरह समझने लगे हैं। आधुनिक स्ट्रॉ रीपर मशीन का उपयोग कर किसान न केवल पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं, बल्कि अपनी आमदनी भी दोगुना कर रहे हैं। प्रशासन का लक्ष्य अन्य किसानों को भी इस तकनीक से जोड़ना है, जिससे नवादा का मॉडल पूरे प्रदेश में नजीर बन सके।

जिले में सोना उगल रही पराली, 19 किसानों ने बदली अपनी किस्मत

​नवादा जिले के कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जिस पराली यानी फसल अवशेष को कल तक किसान बोझ समझकर खेतों में जला दिया करते थे, वही पराली अब जिले के किसानों के लिए सोना साबित हो रही है। नवादा के जागरूक किसानों ने आधुनिक कृषि यंत्र स्ट्रॉ रीपर को अपनाकर न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाया है, बल्कि अपनी आमदनी को दोगुना करने का एक नया जरिया भी खोज लिया है। प्रशासन और कृषि विभाग की योजना अब जिले के अन्य किसानों को भी इस तकनीक से जोड़ने की है। यदि इसी रफ्तार से पराली प्रबंधन को आय से जोड़ा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब नवादा का मॉडल पूरे प्रदेश के लिए नजीर बनेगा।

​कुल मिलाकर, नवादा के किसान अब आधुनिक तकनीक के सारथी बनकर समय, श्रम और लागत की बचत करते हुए समृद्धि की नई राह पर अग्रसर हैं। ​जिले के विभिन्न प्रखंडों के 19 प्रगतिशील किसानों ने स्ट्रॉ रीपर मशीन की खरीदारी की है। कृषि विभाग के प्रोत्साहन और सरकारी अनुदान का लाभ उठाकर इन किसानों ने खेती को एक लाभकारी व्यवसाय में बदल दिया है। ये 19 किसान आज पूरे जिले के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं। जहां पहले गेहूं की कटाई के बाद किसान अगली फसल की तैयारी के लिए बचे हुए ठूंठ को जला देते थे, जिससे न केवल वायु प्रदूषण फैलता था बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी नष्ट हो जाती थी, वहीं अब इन मशीनों की मदद से उसी कचरे से बेहतरीन किस्म का भूसा तैयार किया जा रहा है। जादुई मशीन की तरह काम करती है स्ट्रॉ रीपर जिला कृषि पदाधिकारी अजीत प्रकाश बताते हैं कि ​स्ट्रॉ रीपर तकनीक का कमाल यह है कि यह गेहूं की कटाई के बाद खेत में बचे डंठलों को जड़ के पास से काटकर उन्हें थ्रेशिंग और सफाई की प्रक्रिया से गुजारती है। इसके बाद यह उसे महीन भूसे में बदल देती है। यह मशीन 40 से 55 हॉर्स पावर के ट्रैक्टर से संचालित होती है। महज 15 से 20 मिनट में एक पूरी ट्रॉली भूसा तैयार हो जाता है। ट्रैक्टर के साथ मशीन और ट्रॉली सीधे जुड़ी रहती है, जिससे खेतों में ही पैकिंग का काम आसान हो जाता है। इस प्रकार, यह मशीन किसानों के लिए सबसे उपयोगी साथी साबित हो रही है। स्ट्रॉ रीपर के माध्यम से भारी मात्रा में निकलता है भूसा नवादा नारदीगंज के प्रगतिशील किसान चितरंजन सिंह, कझिया अकबरपुर के मनोज सिंह समेत वारिसलीगंज कुम्भी के प्रगतिशील किसान आदि कहते हैं कि एक एकड़ खेत से स्ट्रॉ रीपर के माध्यम से भारी मात्रा में भूसा निकलता है। बाजार में भूसे की बढ़ती कीमतों को देखते हुए, किसान अब गेहूं के दाने बेचने के साथ-साथ भूसा बेचकर भी मोटी कमाई कर रहे हैं। प्रति किलो सात रुपए तक की आमदनी इन भूसा से हो जाती है। पहले हमें पराली हटाने के लिए मजदूर लगाने पड़ते थे या उसे जलाना पड़ता था। अब मशीन की मदद से हम खुद का भूसा तो बना ही रहे हैं, साथ ही दूसरे किसानों के खेतों में मशीन चलाकर भी अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। ​पर्यावरण और पशुपालन को दोहरा लाभ ​स्ट्रॉ रीपर से तैयार भूसे की गुणवत्ता काफी बेहतर होती है क्योंकि इसमें धूल और मिट्टी की मिलावट नहीं होती। यह पशुओं के लिए एक पौष्टिक चारे का काम करता है, जिससे जिले में दुग्ध उत्पादन को भी बढ़ावा मिल रहा है। दूसरी ओर, खेतों में आग न लगाने के कारण मिट्टी के मित्र कीट सुरक्षित रहते हैं और जमीन की नमी बरकरार रहती है, जिससे अगली फसल जैसे मूंग या मक्का की पैदावार बेहतर होती है। कुल मिलाकर, पराली प्रबंधन के साथ ही किसानों की आय को दोगुना करने में सहायक साबित हो रही यह स्ट्रॉ रीपर मशीन जिले को एक नई दिशा देने में सफल साबित हो रही है। नवादा से राजेश मंझवेकर

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