बढ़ती लागत और कुदरत की मार के बीच गेहूं की फसल से किसानों का हो रहा मोहभंग
नवादा के किसानों के लिए गेहूं की खेती अब घाटे का सौदा बन गई है। लागत में 29% वृद्धि और मुनाफे में 45% की कमी ने उनकी स्थिति को गंभीर बना दिया है। महंगाई, मौसम की मार और सरकारी खरीद की कमी से किसान निराश हैं। अगर हालात नहीं बदले, तो खेती की परंपरा खत्म हो सकती है।

नवादा की धरती पर गेहूं की सुनहरी बालियां अब किसानों की आंखों में वैसी चमक नहीं पैदा कर रहीं, जैसी कुछ साल पहले हुआ करती थी। लागत और मुनाफे का गणित अब किसानों के पक्ष में नहीं रहा। रबी सीजन की मुख्य फसल गेहूं अब नवादा के किसानों के लिए लगभग घाटे का सौदा ही साबित हो रही है। एक तरफ महंगाई ने खेती की कमर तोड़ दी है, तो दूसरी तरफ मौसम का बदलता मिजाज और सरकारी तंत्र की सुस्ती अन्नदाता को बिचौलियों के पास जाने को मजबूर कर रही है। इन प्रतिकूल परिस्थितियों में जहां विगत वर्ष की तुलना में चालू चत्र में गेहूं की खेती की लागत 29 फीसदी तक बढ़ गयी, वहीं मुनाफा लगभग 45 प्रतिशत तक घट गया।
स्पष्ट कहा जा सकता है कि गेहूं की खेती में अब किसानों को मुनाफा के लाले पड़ गए हैं। जैसे-तैसे कर परिवार के खाने भर ही गेहूं का उत्पादन जिले के किसान कर पा रहे हैं। बाजार तक गेहूं पहुंचाना एकदम से टेढ़ी खीर साबित हो रही है। सरकार द्वारा गेहूं खरीद बस एक मजाक सा बन कर रह गया है। चालू सत्र में महज 337 एमटी गेहूं की खरीद का लक्ष्य निर्धारित किया जाना ही अपने आप में एमएसपी पर क्रय का पोल खोलती नजर आती है। खुले बाजार में औने-पौने दाम पर किसान तब ही गेहूं बेचने का मन बना पाते हैं, जब अत्यंत आवश्यकता हो। इस हाल में, जिले के किसानों का मन खेती से मन उचाट होता जा रहा है। आसमान छूती महंगाई से गड़बड़ा रहा लागत का गणित नवादा जिले के विभिन्न प्रखंडों के किसानों का कहना है कि पिछले एक साल में खेती की लागत में 25% से 30% तक की वृद्धि हुई है। खाद, बीज से लेकर सिंचाई और मजदूरी तक, हर मोर्चे पर जेब ढीली करनी पड़ रही है। वर्तमान हालात में नवादा में गेहूं की खेती अब केवल एक परंपरा बनकर रह गई है। अगर समय रहते लागत पर नियंत्रण और खरीद प्रक्रिया में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में जिले का किसान खेती से पूरी तरह विमुख हो सकता है। पांच आपदाओं की दोहरी मार से त्रस्त हैं किसान नवादा का किसान सिर्फ महंगाई से नहीं, बल्कि कुदरत के पांच प्रहारों से भी जूझ रहा है। मानसून की बेरुखी से जमीन की नमी खत्म हो जाती है, जिससे बोआई में देरी होती है। मार्च-अप्रैल में चलने वाली तेज पछुआ हवाएं और अचानक आए तूफान गेहूं की खड़ी फसल को गिरा देते हैं, जिससे दाने काले पड़ जाते हैं। पिछले कुछ सालों में नवादा के कुछ हिस्सों में हुई बेमौसम ओलावृष्टि ने तैयार फसल को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। कटनी के समय खेतों में शॉर्ट सर्किट या अन्य कारणों से लगने वाली आग हर साल दर्जनों एकड़ फसल राख कर देती है। मार्च के महीने में जब गेहूं पकने की कगार पर होता है, तब होने वाली बारिश अमृत नहीं, जहर साबित होती है। सरकारी खरीद बनी एक अबूझ पहेली कहने को तो सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है, लेकिन नवादा के धरातल पर कहानी कुछ और है। जब किसान की फसल तैयार होती है, तब पैक्स में खरीद शुरू ही नहीं होती। पैक्स अध्यक्ष बेहद कम लक्ष्य निर्धारित किए जाने के बहाने किसानों को बैरंग लौटा देते हैं। कहीं न कहीं समिति अध्यक्षों का कहना भी सही है, क्योंकि जिले भर में 337 एमटी गेहूं की खरीदारी का लक्ष्य निर्धारित किया जाना अधिक से अधिक किसानों को उनके हक से वंचित कर दिए जाने जैसा ही है। ऊपर से सरकारी केंद्रों पर फसल बेचने के बाद पैसे आने में महीनों लग जाते हैं, जबकि किसान को अगली फसल मूंग या अन्य गर्मा फसल के लिए तत्काल नगद चाहिए होता है। इसी मजबूरी में किसान गांव के महाजन या बिचौलियों को एमएसपी से 300-400 रुपए प्रति क्विंटल कम दाम पर गेहूं बेच देते हैं। मुनाफे की जगह खाली रह जा रहे हैं किसानों के हाथ नवादा के एक औसत किसान की आय का विश्लेषण करें तो तस्वीर बेहद निराशाजनक ही कहा जाएगा। हिसुआ के लटावर निवासी अनुभवी किसान अर्जुन सिंह कहते हैं कि पिछले साल 2025 प्रति एकड़ में 17,600 रुपए खर्च होता था। औसत 18 क्विंटल पैदावार होने पर फसल लगभग 40,000 रुपए में बेची गई थी। उस साल 22,400 रुपए तक औसतन मुनाफा हुआ था। इस साल 2026 में प्रति एकड़ 22,700 रुपए तक खर्च हुआ। मौसम की खराबी से पैदावार घटकर 16 क्विंटल रह गई। बाजार भाव गिरने और बिचौलियों को बेचने के कारण फसल मात्र 35,000 रुपए में ही औसतन गेहूं की बिकी हो सकी है। इस साल मुनाफा घटकर मात्र 12,300 रुपए रह गया, जिसमें किसान की अपनी और उसके परिवार की मेहनत शामिल नहीं है। देखा जाए तो गत वर्ष की तुलना में सीधे-सीधे मुनाफा 10100 रुपए अर्थात 45 फीसदी यानी लगभग आधा के बराबर ही हो सका। यह परिस्थिति किसानों को तोड़ती जा रही है। पुराना फसल चक्र और तकनीकी अभाव जिले में आज भी 90% किसान वही पुराना धान-गेहूं फसल चक्र अपना रहे हैं। मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है, लेकिन फसल विविधीकरण की जानकारी अभाव में किसान नई फसलों की ओर नहीं बढ़ रहे। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब गेहूं की बोआई नवंबर के प्रथम सप्ताह तक पूरी हो जानी चाहिए, लेकिन सिंचाई की कमी और धान की देरी से कटनी के कारण यह दिसंबर तक खिंच जाती है, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। यह खेती-किसानी के लिए प्रतिकूल साबित हो रहा है, जिससे किसान कृषि को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं। ------------------------ जिम्मेदार और किसान की राय: सभी फोटो नाम से अब खेती सिर्फ पेट पालने के लिए रह गई है। डीजल और खाद का दाम बढ़ गया है, लेकिन जब हम बेचने जाते हैं तो कोई नहीं पूछता। थक-हार कर बिचौलियों की शरण में आना पड़ता है। -सुरेन्द्र सिंह, किसान, बलियारी, नवादा। सरकार को इनपुट सब्सिडी बढ़ानी चाहिए और पैक्स में खरीद की प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिए। छोटे किसानों के पास भंडारण की सुविधा नहीं है, जिसका फायदा बिचौलिए उठाते हैं। -राजीव कुमार, जिलाध्यक्ष, भारतीय किसान संघ, नवादा। किसानों को अब कम पानी वाली और कम समय में तैयार होने वाली गेहूं की किस्मों पर शिफ्ट होना होगा। साथ ही जीरो टिलेज तकनीक अपनाकर लागत कम की जा सकती है। -अजीत प्रकाश, जिला कृषि पदाधिकारी, नवादा। समितियों को सक्रिय किया गया है। कुछ तकनीकी समस्या रहती है, लेकिन समिति अध्यक्षों की कोशिश रहती है कि अधिक से अधिक किसानों का निबंधन हो और उन्हें समय पर भुगतान मिले। -मिथिलेश कुमार टुन्नी, अध्यक्ष, व्यापार मंडल, नवादा। ------------------------ लागत में वृद्धि का तुलनात्मक विवरण (प्रति एकड़): मद वर्ष 2025 (रुपए) वर्ष 2026 (रुपए) वृद्धि (%) खाद (डीएपी/यूरिया/पोटाश) 2,800 3,500 25% बीज (उन्नत किस्म) 2,500 3,200 28% सिंचाई (डीजल/पंप सेट) 4,000 5,500 37% मजदूरी (कटाई-बोआई) 6,500 8,000 23% ट्रांसपोर्टेशन/थ्रेसिंग 1,800 2,500 38% कुल लागत 17,600 22,700 29% नवादा से राजेश मंझवेकर
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