पारंपरिक खेती से हटकर मोटे अनाज उपजाकर भविष्य संवार रहे किसान

Feb 09, 2026 11:01 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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​नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मानसून ने जहां मगध क्षेत्र की खेती-किसानी को संकट में डाल रखा है, वहीं नवादा जिले के कुछ प्रगतिशील किसानों ने एक पुरानी राह पकड़कर नई कामयाबी...

पारंपरिक खेती से हटकर मोटे अनाज उपजाकर भविष्य संवार रहे किसान

नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मानसून ने जहां मगध क्षेत्र की खेती-किसानी को संकट में डाल रखा है, वहीं नवादा जिले के कुछ प्रगतिशील किसानों ने एक पुरानी राह पकड़कर नई कामयाबी की इबारत लिखनी शुरू कर दी है। धान और गेहूं की पारंपरिक खेती, जिसमें पानी की भारी खपत होती है, उसके विकल्पस्वरूप अब जिले के किसान श्री अन्न यानी मिलेट्स अर्थात मोटा अनाज की ओर लौट पड़ हैं। रागी यानी मड़ुआ समेत ज्वार, बाजरा और चीना जैसी फसलें अब केवल गरीबों का भोजन नहीं, बल्कि नवादा के सुखाड़ प्रभावित इलाकों के लिए पीला सोना साबित हो रही हैं।

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नवादा जिला आरम्भ से कम वर्षा और गिरते भू-जल स्तर की समस्या से जूझता रहा है। यदि जल खपत के तकनीकी आंकड़ों पर गौर करें तो धान की खेती के लिए प्रति किलोग्राम चावल उत्पादन में लगभग 3,000 से 5,000 लीटर तक पानी की भारी आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, रागी या बाजरा जैसी फसलें मात्र 200 से 300 मिलीमीटर की औसत वर्षा में भी बंपर पैदावार देने की क्षमता रखती हैं। नवादा के कौआकोल, उग्रवाद प्रभावित गोविंदपुर और रजौली के पहाड़ी इलाकों समेत मेसकौर और सिरदला आदि क्षेत्रों में जहां सिंचाई के साधन सीमित हैं, वहां मिलेट्स एक वरदान बनकर उभरा है। स्थानीय किसान बताते हैं कि मानसून की बेरुखी के बीच मड़ुआ जैसी फसलों ने ही किसानों के आर्थिक नुकसान की भरपाई की है। जिला कृषि विभाग की पहल के बाद नवादा की पथरीली और कम पानी वाली जमीन अब अभिशाप नहीं, बल्कि मिलेट्स के रूप में एक बड़े अवसर में तब्दील होती दिख रही है। यह बदलाव न केवल गिरते भू-जल स्तर को बचाने में मदद कर रहा, बल्कि कम लागत में अधिक मुनाफा देकर जिले के किसानों को कर्ज के जाल से बाहर निकालने में भी सक्षम दिख रहा है। श्री अन्न की यह गूंज आने वाले समय में नवादा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई पहचान बनने वाली है। लागत कम और मुनाफा ज्यादा, खेती का नया गणित जिले के अनुभवी किसान जागेश्वर सिंह, मोसाफिर कुशवाहा, मनोज कुशवाहा, सुरेन्द्र सिंह आदि कहते हैं कि खेती के अर्थशास्त्र को देखें तो पारंपरिक फसलों के मुकाबले मिलेट्स किसानों की जेब पर कम बोझ डालते हैं। जहां एक एकड़ में धान या गेहूं की फसल तैयार करने में बीज, महंगी खाद और बार-बार होने वाली सिंचाई पर 12,000 से 15,000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं, वहीं रागी जैसे मोटे अनाज की खेती महज 3,000 से 5,000 रुपये की मामूली लागत में पूरी हो जाती है। मुनाफे के मामले में भी यह सौदा घाटे का नहीं है। वर्तमान में जहां धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,100 से 2,300 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास घूमता है, वहीं रागी जैसे मोटे अनाजों का बाजार भाव 3,500 रुपये से लेकर 4,500 रुपये प्रति क्विंटल तक जा रहा है। इन हालातों में नवादा के प्रगतिशील किसानों का मानना है कि खाद और कीटनाशकों पर होने वाली लगभग 70 प्रतिशत की बचत सीधे तौर पर उनकी शुद्ध आय में जुड़ रही है। कृषि विज्ञान केंद्र और सरकार का प्रोत्साहन नवादा के सोखोदेवरा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र इस बदलाव का मुख्य सूत्रधार बना हुआ है। वैज्ञानिकों की टीम गांवों में जाकर श्री अन्न की वैज्ञानिक खेती का प्रशिक्षण दे रही है। केंद्र द्वारा किसानों को रागी की उन्नत किस्में, जैसे जीपीयू-28 और 45 उपलब्ध कराई जा रही हैं, जो कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं। साथ ही, कुछ लुप्त हो रहे चीना जैसे अनाजों को फिर से उगाने के लिए लाइन सोइंग यानी कतारबद्ध बुवाई की तकनीक सिखाई जा रही है, जिससे पैदावार में 20 से 25 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है। कृषि मौसम वैज्ञानिक रौशन कुमार कहते हैं कि केन्द्र मोटे अनाज के वैल्यू एडिशन पर भी जोर दे रहा है। स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को रागी के बिस्कुट, लड्डू और मिक्स आटा बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे इसकी कीमत बाजार में सामान्य अनाज से तीन गुना तक बढ़ जाती है। मोटे अनाज का किया गया समूह प्रत्यक्षण (एकड़ में) अनाज लक्ष्य ज्वार 386 बाजरा 208 रागी 2055 चीना 600 कुल 3249 ------------------ वर्जन: नवादा की भौगोलिक स्थिति और सीमित सिंचाई संसाधनों को देखते हुए विभाग कॉप डायवर्सिफिकेशन यानी फसल विविधीकरण पर जोर दे रहा है। जिले में श्री अन्न की खेती को बढ़ावा देना कृषि विभाग की प्राथमिकता है। इसके लिए किसानों को न केवल उन्नत बीज और तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है, बल्कि क्लस्टर बनाकर उन्हें बाजार से जोड़ने की योजना पर भी काम किया जा रहा है। आने वाले दो वर्षों में नवादा के सुखाड़ प्रभावित क्षेत्रों का कम से कम 20 से 25 प्रतिशत रकबा मोटे अनाज के अधीन लाने पर जोर है, ताकि गिरते भू-जल स्तर के बीच भी किसानों की आय सुरक्षित रहे। -अजीत प्रकाश, जिला कृषि पदाधिकारी, नवादा।

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