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खेतों में धान के अवशेषों को जलाने से बढ़ रहा प्रदूषण का प्रभाव

खेतों में धान के अवशेषों को जलाने से बढ़ रहा प्रदूषण का प्रभाव

संक्षेप:

वारिसलीगंज, निज संवाददाताप्रखंड क्षेत्र की विभिन्न पंचायतों में मजदूरों के अभाव में किसान धान की कटनी हार्वेस्टर से करवाई जा रही है।

Nov 17, 2025 11:55 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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वारिसलीगंज, निज संवाददाता प्रखंड क्षेत्र की विभिन्न पंचायतों में मजदूरों के अभाव में किसान धान की कटनी हार्वेस्टर से करवाई जा रही है। किसान उक्त खेत में जल्दी रबी बुआई को लेकर धान कटनी के बाद बचे फसल अवशेष को खेतों में जला दे रहे हैं। जिस कारण वातावरण धुंआ धूसरित होकर प्रदूषित हो रहा है। जबकि कृषि विभाग द्वारा आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से यथा रबी महाभियान, खरीफ कार्यशाला, किसान चौपाल आदि कार्यक्रम में किसानों को जागरूक किया जा रहा है। पराली या पुआल खेतों में नहीं जलाने, पराली जलाने से खेतों की मृदाशक्ति का ह्रास होने, वातावरण में कार्बन मोनो आक्साइड की मात्रा बढ़ने से जनजीवन के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ने के अलावा वायु प्रदूषण जनित अन्य बीमारियों के प्रति लोगों को सचेत किया जाता रहा है।

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बावजूद किसान अपनी क्षणिक स्वार्थवश खेतों में पुआल जलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पराली या पुआल जलाने से खेतों की उर्वरा शक्ति क्षीण होती है। संबंधित खेतों में मिट्टी की सतह पर वास करने वाले विभिन्न जीव की मृत्यु हो जाती है। जिसमें फसलों के लिए कुछ आवश्यक वैक्टेरिया भी शामिल होता है। वहीं पर्यावरण पर इसका काफी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। पराली जलाने पर संबंधित किसानों को सरकार की विभिन्न लाभकारी एवं सब्सिडी आदि योजनाओं से जहां वंचित कर देने का प्रावधान है। वहीं संबंधित किसानों पर कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है। कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि किसानों को किसी भी परिस्थिति में अपने खेतों में पराली या पुआल नहीं जलाना है। किसानों से फसल अवशेषों के प्रंबधन पर जोर दिया जा रहा है। बताया गया कि पराली जलाने से वातावरण में कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। जिसके दुष्प्रभाव से मनुष्य में फेफड़ा जनित रोगों यथा लंग्स कैंसर जैसे घातक बीमारी के अलावे खेतों की मिट्टी को शक्तिहीन कर देती है। वर्जन फसल अवशेषों के प्रबंधन को लेकर किसान पूषा वायो डी कम्पोजर कैप्सूल को पानी में घोल बनाकर फसल अवशेषों पर छिड़काव करें। पांच से आठ दिनों में अवशेष गलकर कंपोस्ट उर्वरक में तब्दील हो जाता है। डा जयवंत कुमार सिंह, वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रधान, कृषि विज्ञान केंद्र शेखोदेवरा, नवादा।