
नदियों पर संकट से पर्यावरण और स्वास्थ्य पर पड़ रहा बुरा असर
नवादा, हिन्दुस्तान संवाददातानवादा की जीवनदायिनी नदियों पर गहराता संकट, पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है। नवादा जिले में जल, जीवन और हरियाली का आधार रही नदियां आज अपने अस्तित्व की लड़ाई...
नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता नवादा की जीवनदायिनी नदियों पर गहराता संकट, पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है। नवादा जिले में जल, जीवन और हरियाली का आधार रही नदियां आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। खुरी, सकरी, धनार्जय, तिलैया और ढाढर जैसी प्रमुख पांच नदियों का दम घुटने लगा है। कभी कल-कल बहती इन धाराओं का सूखना और प्रदूषित होना केवल एक भौगोलिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि इसने जिले की जैव विविधता, कृषि और मानव स्वास्थ्य पर एक ऐसा संकट खड़ा कर दिया है, जिसके परिणाम भविष्य में और भी भयावह हो सकते हैं। नवादा में नदियों का सूखना केवल पानी का कम होना नहीं, बल्कि एक समृद्ध संस्कृति और स्वस्थ भविष्य का मिटना है।
अगर जल्द ही जल संचयन, वृक्षारोपण और बालू खनन पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल रेत के रेगिस्तान विरासत में मिलेंगे। समय रहते नहीं चेते तो जिले की नदियों का अस्तित्व ही समाप्त हो कर रह जाएगा। गायब हो रही जलीय संपदा, विलुप्त हुईं मछलियां नदियों के इकोसिस्टम में आई गिरावट का सबसे पहला और दर्दनाक असर जलीय जंतुओं पर पड़ा है। नवादा की नदियों में कभी रेहू, कतला, देसी मांगुर यानी सिंघी और विशेष रूप से स्थानीय टेंगरा, बचवा व पोठिया मछलियों की भरमार होती थी। लेकिन, जलस्तर में भारी गिरावट और बढ़ते रासायनिक प्रदूषण ने इनके प्रजनन चक्र को नष्ट कर दिया है। मत्स्य विभाग के विशेषज्ञ मत्स्य प्रसार पदाधिकारी सह नोडल पदाधिकारी नंदन कुमार का कहना है कि नदियों के सूखने और बचे हुए पानी में ऑक्सीजन की कमी होने के कारण अनेक प्रजातियां अब पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। जलीय जीवों के विलुप्त होने से न केवल खाद्य श्रृंखला प्रभावित हुई है, बल्कि उन हजारों परिवारों की आजीविका पर भी संकट आ गया है जो पुश्तैनी रूप से मछली पालन और शिकार पर निर्भर थे। वर्तमान में रेहू और कतला के अलावा अन्य मछलियों की उपलब्धता पर बुरा असर पड़ा है। सिंघी तो पूरी तरह से विलुप्त ही हो चुकी है, जबकि अब कम पसंद की जाने वाली कवई और तिलापिया के अलावा सिल्वर कॉर्प आदि जैसी मछलियों से काम चलाना पड़ रहा है। जैव विविधता पर प्रहार, उजड़ रहा है प्राकृतिक संतुलन नदियों के किनारों पर पनपने वाली जैव विविधता आज दम तोड़ रही है। नदी बचाओ अभियान से जुड़े रहे एमपी सिन्हा जैसे जानकार कहते हैं कि नदियों के अविरल बहाव में रुकावट और अवैध बालू खनन ने किनारों की मिट्टी की नमी सोख ली है। इसका सीधा असर आसपास की वनस्पति पर पड़ा है। जो इलाके कभी घने वृक्षों और झाड़ियों से ढके रहते थे, वहां अब धूल और बंजर जमीन दिखाई देती है। हरियाली का बड़े पैमाने पर ह्रास हुआ है। जल की कमी के कारण अब प्रवासी पक्षी भी इन नदियों के तट पर नहीं रुकते। नदियों के किनारों पर हरियाली न होने से मिट्टी का कटाव बढ़ गया है, जिससे बाढ़ और सूखे जैसी स्थितियां और अधिक अनियंत्रित हो गई हैं। तापमान का तांडव और जलवायु परिवर्तन नवादा जिला पिछले कुछ वर्षों से असामान्य तापमान का सामना कर रहा है। एमपी सिन्हा समेत प्रो.अनुज कुमार आदि पर्यावरणविदों के अनुसार, नदियों का सूखना स्थानीय माइक्रो-क्लाइमेट को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। नदियां वातावरण में नमी बनाए रखने का काम करती थीं, लेकिन अब उनके शुष्क होने से गर्मियों में लू का प्रकोप बढ़ा है और सर्दियों में तापमान का उतार-चढ़ाव अत्यंत अनिश्चित हो गया है। यह असंतुलन न केवल फसलों को बर्बाद कर रहा है, बल्कि भू-जल स्तर के पाताल में जाने का मुख्य कारण भी बन गया है। मानव स्वास्थ्य पर कुप्रभाव, बीमारियों का बढ़ा प्रकोप नदियों के इस संकट का सबसे गंभीर पहलू मानव स्वास्थ्य है। नदियों के सूखने के बाद जो थोड़ा-बहुत पानी बचता है, वह सीवेज और कचरे के कारण जहर बन चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसी पानी के संपर्क में आने से चर्म रोग के मामले तेजी से बढ़े हैं। दूषित जल के कारण पेट संबंधी बीमारियां और टाइफाइड जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। सूखी नदियों की उड़ती बालू और धूल ने आसपास के निवासियों में दमा और एलर्जी जैसी सांस की बीमारियों को जन्म दिया है। प्रशासनिक अनदेखी और अवैध खनन का खेल इस संकट के पीछे प्राकृतिक कारणों से ज्यादा मानवीय हस्तक्षेप जिम्मेदार है। जिले की नदियों से बड़े पैमाने पर होने वाला अवैध बालू उत्खनन नदियों के स्वरूप को बिगाड़ रहा है। बालू का अनियंत्रित उठाव नदियों की जलधारण क्षमता को खत्म कर रहा है, जिससे मानसून के दौरान भी पानी ठहर नहीं पाता। नदी बचाओ अभियान को लेकर सतत प्रयत्नशील एमपी सिन्हा जैसे जानकार कहते हैं कि नदियां हमारे समाज की धमनियां हैं। यदि ये सूखती हैं, तो सभ्यता का अंत निश्चित है। नवादा की नदियों को बचाने के लिए केवल सरकारी योजनाओं की नहीं, बल्कि जन-भागीदारी और सख्त पर्यावरण कानूनों की आवश्यकता है।

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