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जलवायु परिवर्तन : समय पर नहीं हो पा रही फसलों की बुआई

जलवायु परिवर्तन : समय पर नहीं हो पा रही फसलों की बुआई

संक्षेप:

नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता।जिले में जलवायु परिवर्तन से खेती से लेकर जनजीवन पर गहरा असर पड़ रहा है। विगत पांच वर्षों से खरीफ और रबी सीजन में सामान्य से अधिक तापमान, तेज धूप और बारिश की कमी और असमान...

Dec 07, 2025 01:18 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। जिले में जलवायु परिवर्तन से खेती से लेकर जनजीवन पर गहरा असर पड़ रहा है। विगत पांच वर्षों से खरीफ और रबी सीजन में सामान्य से अधिक तापमान, तेज धूप और बारिश की कमी और असमान वितरण से समय पर खेती माकूल तरीके से नहीं हो पा रही है। इस वर्ष भी 06 दिसंबर शनिवार को भी पारा असामान्य बना हुआ है। सुबह और शाम को ठंड लग रही है। दोपहर में तेज धूप निकल रही है। यानी स्थिति यह है कि इस वर्ष दिसंबर में कड़ाके की ठंड नहीं पड़ रही है। बल्कि विगत सात वर्षों में तापमान में 7-8 डिग्री का अंतर देखा जा रहा है।

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यह सब कुछ जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है। अब तो इसका दुष्प्रभाव पड़ने लगा है। इन दिनों जलवायु परिवर्तन की मार के कारण धान की कटनी प्रभावित हो रही है। ऐसे में समय पर रबी फसलों की बुआई संभव नहीं हो पा रही है। पिछले सात वर्षों में दिसंबर के पहले सप्ताह का तापमान औसतन 3 से 7 डिग्री बढ़ा है। जिले में ठंड अब देर से शुरू हो रही है। गर्मी अक्टूबर तक रह रही है। मानसून की बारिश भी अंतिम महीनों तक खिसक गई है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, स्थानीय और वैश्विक स्तर पर जलवायु में आए बदलावों का असर स्पष्ट महसूस किया जा रहा है। दिसंबर का पहला सप्ताह जहां पहले कड़ाके की ठंड की शुरुआत माना जाता था, वहीं, अब हल्की सर्दी के साथ दिनभर धूप खिली रहती है। इसका असर पूरे कृषि चक्र, जल संसाधन और दैनिक जीवन पर पड़ रहा है। देर से पड़ रही ठंड, कृषि का फसल चक्र प्रभावित कृषि विभाग और मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2017 से 2024 के बीच दिसंबर के पहले सप्ताह के औसत न्यूनतम तापमान में 3 से 7 डिग्री का अंतर दर्ज किया गया है। अब न्यूनतम तापमान 13-14 डिग्री सेल्सियस तक रह रहा है। ठंड की शुरुआत अब दिसंबर के अंतिम पखवारे में होती है और जनवरी के मध्य तक पहुंचते-पहुंचते खत्म भी होने लगती है। पूर्व के वर्षों पर नजर डालें तो 2017 में 05 दिसंबर को न्यूनतम तापमान 06 डिग्री, 2018 में 07 डिग्री, 2019 में 07 डिग्री, 2020 में 08 डिग्री, 2021 में 08 डिग्री, 2022 में 09 डिग्री, 2023 में 09 डिग्री और 2024 में 10 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। जबकि इस बार शनिवार 06 दिसंबर को न्यूनतम तापमान 11 डिग्री सेल्सियस रहा। ऐसे तापमान के कारण फसल चक्र सीधे-सीधे प्रभावित हो रहा है। आसमान रह रहा पूरी तरह साफ, सुबह-शाम रह रही ठंड इन दिनों बस सुबह-शाम हल्की हवा चल रही है। लेकिन दिन में आसमान पूरी तरह साफ और धूप तीखी बनी रहती है। यह तापमान के असंतुलन का परिणाम है। कृषि मौसम वैज्ञानिक रोशन कुमार बताते हैं कि असमय धूप, बादलों की कमी और वायुमंडल में बढ़ते प्रदूषण ने स्थानीय तापमान को प्रभावित किया है। शहरी क्षेत्रों में बढ़ते वाहनों का धुआं, निर्माण कार्य और औद्योगिक गतिविधियां स्थानीय स्तर पर हीट आइलैंड इफेक्ट बना रही हैं, जिससे रात में तापमान सामान्य से अधिक रहता है। ------------------------ रबी की बुआई का सत्र बदल रहा धीरे-धीरे नवादा। मौसम की बदलती चाल का सबसे अधिक असर किसानों पर पड़ रहा है। रबी फसलों की बुआई के लिए नवंबर के अंत से दिसंबर के पहले सप्ताह तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता था, लेकिन अब ठंड देर से आने के कारण किसान असमंजस में पड़े रहते हैं। इसका असर भी दिख रहा है। अब तक जिले में सबसे प्रमुख रबी फसल गेहूं का महज 8 प्रतिशत ही आच्छादन हो सका है। किसान अब 15 दिसम्बर बुआई करने को लेकर बाध्य हैं। जबकि पूर्व के आकलन के अनुसार, अब तक 55 प्रतिशत गेहूं और शत-प्रतिशत दलहन-तेलहन का आच्छादन हो जाना चाहिए था। कई किसानों का कहना है कि पहले दिसंबर की शुरुआत में सुबह खेतों में ओस की मोटी परत जम जाती थी, जो इस वर्ष नदारद है। मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करने वाली ओस अब पहले की तुलना में कम पड़ रही है। इस कारण गेहूं, चना, मसूर, सरसों, मटर जैसी फसलों की बुआई में देरी के अलावा तापमान अधिक रहने से फसलों पर रोग-कीट का खतरा भी बढ़ रहा है। -------------------- आने वाले वर्षों में मौसम चक्र में और अधिक होगा बदलाव : कृषि वैज्ञानिक नवादा। आने वाले वर्षों में मौसम चक्र में और अधिक बदलाव की संभावना जताई गयी है। कृषि मौसम वैज्ञानिक रोशन कुमार ने बताया कि गर्मी के दिनों की संख्या बढ़ेगी और फसलों का बढ़वार प्रभावित होगा। सर्दी छोटी और कमजोर होती जाएगी, जिस कारण पैदावार में गिरावट होगी। बरसात का पैटर्न और अनियमित होगा। ऐसे में स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खतरा बढ़ेगा। सुबह-शाम प्रदूषण के स्तर में और वृद्धि होगी। इस कारण सांस और हृदय रोगियों को अधिक परेशानी होगी।