खेती के साधन बढ़े, लागत बढ़ी पर मुनाफा बढ़ने की रफ्तार सुस्त
नवादा जिला कृषि प्रधान है, लेकिन पिछले एक दशक में यहां खेती की लागत में बेतहाशा वृद्धि हुई है। मशीनीकरण और आधुनिकता के बावजूद, किसानों को उचित मुनाफा नहीं मिल पा रहा है। सिंचाई की समस्या और महंगे इनपुट, जैसे खाद और बीज, किसानों के लिए चुनौतियाँ बन गए हैं।

नवादा जिला एक प्रमुख कृषि प्रधान जिला है। यहां की मिट्टी और किसानों का परिश्रम राज्य के अन्न भंडार में महत्वपूर्ण योगदान देता है। लेकिन पिछले एक दशक में नवादा की कृषि का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। जहां एक ओर खेती में मशीनीकरण और आधुनिकता आई है, वहीं दूसरी ओर खेती की लागत में बेतहाशा वृद्धि ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। नवादा जिले में खेती के साधन, लागत और मुनाफे का गणित ऐसा उलझ कर रह गया है कि किसानों की मेहनत पर का पारितोषिक उस अनुपात में नहीं मिल पा रहा है, जिसकी अपेक्षा पाल कर हर सीजन में वह खेती-बाड़ी की शुरुआत करते हैं।
खेती के साधन: परंपरा से आधुनिकता का सफर नवादा में अब बैलों की जगह ट्रैक्टर और कल्टीवेटर ने ले ली है। जिले में लगभग 85-90% जुताई का कार्य अब मशीनों से होता है। हार्वेस्टर और थ्रेशर का उपयोग भी अब आम हो चुका है। इससे समय की बचत तो हुई है, लेकिन छोटे किसानों के लिए यह मशीनें किराए पर लेना एक बड़ा वित्तीय बोझ है। आत्मा और कृषि विज्ञान केंद्र, नवादा के माध्यम से किसान अब श्री विधि (धान) और जीरो टिलेज जैसी तकनीकों को अपना रहे हैं। यह आने वाले दिनों की बेहतरी का संकेत देता है, हालांकि सुखद परिणाम आने में अभी विलम्ब दिख रहा है। सिंचाई: मानसून पर निर्भरता और निजी खर्च नवादा जिले में सिंचाई एक गंभीर चुनौती रही है। जिले की सभी पांचों नदियां खुरी, सकरी, धनार्जय, तिलैया और ढाढर मौसमी हैं। नाटी और बघेल तथा पंचााने जैसी उप नदियों में भी पानी इनके भरोसे ही आती है। ऐसे में दोनों एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं और यह किसानों के लिए निराशाजनक बनी रहती हैं। बस बरसात में ही इनका साथ किसानों को मिल पाता है। पइन और नहरों की स्थिति अभी भी शत-प्रतिशत संतोषजनक नहीं है। किसानों ने खुद के बोरवेल और पंपिंग सेट पर निवेश बढ़ाया है। पहले सिंचाई के लिए डीजल का खर्च सीमित था, लेकिन अब डीजल की कीमतें 90-95 रुपये प्रति लीटर होने से सिंचाई की लागत 10 साल पहले की तुलना में 150% बढ़ गई है। सौर ऊर्जा पंपों से कुछ राहत मिली है, लेकिन इसकी पहुंच अभी भी काफी सीमित है। लागत में वृद्धि से खाद, बीज और कीटनाशक हुए महंगे खेती की लागत में सबसे बड़ा उछाल इनपुट खााद, बीज और कीटनाशकों की कीमतों में आयी है, जबकि यही खेती-बाड़ी की सबसे अहम इकाई हैं। इन सामग्रियों की कीमतों में आई उछाल ही किसानों की आमदनी पर ग्रहण साबित हो रही है। वैसे प्रकृति आधारित खेती-बाड़ी का एक बड़ा दुश्मन मौसम की अनियमितता भी बनी पड़ी है। लागत के साथ ही मुनाफा में भी वृद्धि जरूर हुई है, लेकिन अन्य प्रतिकूलताओं के कारण मुनाफा का ग्राफ बढ़ ही नहीं रहा है या फिर इतनी धीमी गति से बढ़ रहा है कि यह किसानों की खेती से मुंह मोड़ने की वजह बनती जा रही है। -------------------------- विगत 10 वर्षों में बढ़ी कीमतों का तुलनात्मक आंकड़ा: मद 10 साल पहले (औसत) वर्तमान स्थिति (2024-25) वृद्धि (%) डीजल (प्रति लीटर) 45-50 रुपए 94-96 रुपए 100% डीएपी खाद (प्रति बोरी) 450-500 रुपए 1350 रुपए (सरकारी दर) 200% मजदूरी (प्रति व्यक्ति/दिन) 150-200 रुपए 400-500 रुपए 150% बीज (उन्नत किस्म/किग्रा) 30-50 रुपए 120-250 रुपए 300% कीटनाशक पर खर्च 500-800रुपए 2,500-3,500 रुपए 500% ---------------------------------------- भंडारण की है बड़ी समस्या, समाधान नहीं नवादा। नवादा में आलू, प्याज और टमाटर की पैदावार अच्छी होती है, लेकिन भंडारण की भारी कमी है। जिले में गिने-चुने कोल्ड स्टोरेज हैं, जिनमें से कई तकनीकी कारणों से बंद रहते हैं। भंडारण न होने के कारण किसान फसल कटते ही उसे औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर होते हैं। उदाहरण के लिए, सीजन में 5-8 रुपए किलो बिकने वाला प्याज, भंडारण के अभाव में किसान नहीं रख पाते और बाद में वही प्याज 40 रुपए किलो खरीदना पड़ता है। लागत के अनुरूप नहीं मिल रही किसानों को कीमत नवादा। यह सबसे कड़वा सच है कि नवादा जिले में लागत जहां 2 से 3 गुना बढ़ी है, वहीं फसलों के दाम में वैसी वृद्धि नहीं देखी गई। सरकार ने धान और गेहूं का एमएसपी बढ़ाया तो है, लेकिन नवादा के दूरदराज के गांवों के किसान अक्सर पैक्स में समय पर फसल की बिक्री नहीं कर पाते, जिससे उनकी जरूरत ही पूरी नहीं हो पाती। मजबूरी में किसान अपनी फसल स्थानीय आढ़तियों को एमएसपी से 300-400 प्रति क्विंटल कम दाम पर बेच देते हैं। सब्जी उत्पादक भी इसकी चपेट में हैं। सब्जी उत्पादक किसान अक्सर बाजार की अस्थिरता के शिकार होते हैं। परिवहन खर्च और मंडियों में कमीशन देने के बाद किसान के हाथ में लागत का 20% हिस्सा भी मुनाफे के रूप में नहीं बचता। --------------- किसानों की राय: 1.अब खेती करना काफी महंगा सौदा है। यह रिस्की भी हो चला है। पहले डीजल और खाद सस्ते थे, तो कुछ बच जाता था। आज स्थिति यह है कि 95 रुपए का डीजल जलाकर खेत सींचते हैं, और जब फसल तैयार होती है, तो पैक्स में खरीदारी शुरू होने का इंतजार करना पड़ता है। मजबूरी में हमें साहुकारों को कम दाम पर अनाज बेचना पड़ता है। लागत दोगुनी हो गई, पर मुनाफा आधा। - आदित्य सिंह, कौवाकोल। 2.सब्जी उत्पादक किसान टमाटर और गोभी उगाते हैं, लेकिन जिले में एक भी बड़ा कोल्ड स्टोरेज सही स्थिति में नहीं है। मंडी ले जाने का भाड़ा इतना बढ़ गया है कि कभी-कभी उनकी लागत भी नहीं निकलती। खाद और कीटनाशक के दाम आसमान छू रहे हैं। अगर सरकार यहां प्रोसेसिंग यूनिट लगा दे, तो इन जैसे छोटे किसानों का पलायन रुक सकता है। कोल्ड स्टोरेज की भी प्रबल जरूरत है। - एहतेशाम, फरहा, अकबरपुर। 3.कई किसान नई तकनीक और बीजों पर भरोसा कर रहे हैं। यह अच्छा है, लेकिन तकनीकी मदद और भी उन्नत होनी चाहिए। उन्नत बीज इतने महंगे हैं कि आम किसान की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं। कीटनाशकों पर हर साल खर्च बढ़ रहा है क्योंकि पुराने कीट अब दवाओं से मरते नहीं। लागत के अनुपात में एमएसपी पर फसल न बिकना सबसे बड़ी समस्या है। बेहतर मंडी बेहद जरूरी है। - इशरत खातून अकबरपुर 4.सिंचाई की समस्या ने कमर तोड़ दी है। नदियां सूख गई हैं और भूजल स्तर नीचे चला गया है। बोरिंग कराने में लाखों का खर्च है। बिजली मिलती है, पर वोल्टेज नहीं रहता। खाद के लिए लंबी लाइनें लगानी पड़ती हैं और कालाबाजारी में महंगा मिलता है। किसान अब सिर्फ पेट भरने के लिए खेती कर रहा है, बचत के लिए नहीं। अन्य कोई पुख्ता रास्ता निकालना जरूरी है। - राजेंद्र प्रसाद, गोनावां (नवादा से राजेश मंझवेकर)
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