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भदौनी पशु हाट में सुविधाओं का अभाव, संकट झेल रहे पशुपालक

भदौनी पशु हाट में सुविधाओं का अभाव, संकट झेल रहे पशुपालक

संक्षेप:

​नवादा। राजेश मंझवेकरनवादा जिले का भदौनी पशु हाट कभी केवल एक बाजार नहीं, बल्कि मगध और झारखंड के सीमावर्ती इलाकों के पशुपालकों के लिए उम्मीद का केंद्र हुआ करता था। लेकिन आज यह हाट अपनी बदहाली की...

Jan 08, 2026 02:17 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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नवादा। राजेश मंझवेकर नवादा जिले का भदौनी पशु हाट कभी केवल एक बाजार नहीं, बल्कि मगध और झारखंड के सीमावर्ती इलाकों के पशुपालकों के लिए उम्मीद का केंद्र हुआ करता था। लेकिन आज यह हाट अपनी बदहाली की दास्तां खुद बयां कर रहा है। धूल, कीचड़, प्यास और प्रशासनिक उपेक्षा के बीच यह ऐतिहासिक हाट अब अंतिम सांसें गिन रहा है। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यह केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह जाएगा। भदौनी पशु हाट का अस्तित्व खतरे में होना नवादा की कृषि-अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी है। यदि समय रहते सुविधाओं का विस्तार नहीं किया गया, तो पशुपालक पूरी तरह से इस व्यवसाय से किनारा कर लेंगे।

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यह न केवल एक बाजार का अंत होगा, बल्कि नवादा की उस सांस्कृतिक पहचान का भी अंत होगा जहाँ कभी मेलों जैसा उत्साह रहता था। प्रशासन को टैक्स वसूली से आगे बढ़कर सेवा और विकास की सोच अपनानी होगी। बतादें कि भदौनी पशु हाट का इतिहास दशकों पुराना है। यह हाट कभी जिले की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ था। यहां उत्तर प्रदेश, झारखंड और बंगाल तक के व्यापारी उत्तम नस्ल की गायों, भैंसों और बैलों की खरीद-बिक्री के लिए जुटते थे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का सबसे बड़ा प्रवाह इसी हाट के जरिए होता था। लेकिन आज स्थिति यह है कि यहां आने वाले व्यापारियों की संख्या पिछले पांच वर्षों में 60 प्रतिशत तक गिर गई है। यहां के कारोबारी और समीपस्थ निवासियों का कहना है कि जिस तरह से इस हाट की उपेक्षा की जा रही है, उसके बाद तो बस यही कहा जा सकता है कि इस हाट का अस्तित्व बचा रह जाए, यही गनीमत होगा। बुनियादी सुविधाओं का शून्य धरातल जब हम किसी व्यापारिक केंद्र की बात करते हैं, तो पानी, छाया और सुरक्षा प्राथमिक आवश्यकताएं होती हैं। भदौनी हाट में इन तीनों का घोर अभाव है। भीषण गर्मी में पशुओं को सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है। हाट परिसर में लगे इक्का-दुक्का चापाकल या तो खराब हैं या उनसे निकलने वाला पानी दूषित है। पशुपालकों को शोभ मंदिर परिसर से पानी ढोकर लाना पड़ता है। यह बेहद श्रमसाध्य होने के साथ ही व्ययसाध्य भी साबित हो रहा है। शेड का अभाव बड़ी परेशानी का सबब है। मवेशियों को चिलचिलाती धूप में घंटों खड़ा रखा जाता है। इससे पशु न केवल सुस्त पड़ जाते हैं, बल्कि उनकी चमक कम होने से व्यापारियों को सही कीमत नहीं मिल पाती। छायादार वृक्षों की कटाई ने स्थिति को और भयावह बना दिया है। सुरक्षा और रोशनी का हाल तो सबसे बुरा है। हाट में बिजली की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। शाम ढलते ही पूरा परिसर अंधेरे में डूब जाता है, जिससे पशुओं की चोरी या व्यापारियों के साथ छिनैती का डर बना रहता है। जलजमाव से नरकीय स्थिति, खरीदार का टिकना दूभर मानसून के दौरान भदौनी हाट की स्थिति किसी नरक से कम नहीं होती। जल निकासी की कोई व्यवस्था न होने के कारण पूरा परिसर दलदल बन जाता है। मवेशी घंटों कीचड़ में खड़े रहते हैं, जिससे उनके खुरों में संक्रमण जैसी बीमारियां हो जाती हैं। गंदगी के कारण मक्खियों और मच्छरों का प्रकोप इतना बढ़ जाता है कि व्यापारियों का वहां खड़ा होना दूभर हो जाता है। गिरियक हाट का उभरता विकल्प और भदौनी का नुकसान भदौनी हाट की बर्बादी का सबसे बड़ा फायदा पड़ोसी जिले नालंदा के गिरियक पशु हाट को मिल रहा है। व्यापारियों का कहना है कि गिरियक में प्रशासन ने बुनियादी ढांचा तैयार किया है। वहां पशुओं के लिए पक्की नाद, पेयजल और छाया की व्यवस्था है। नतीजतन, नवादा के स्थानीय व्यापारी भी अब भदौनी के बजाय गिरियक जाना पसंद करते हैं। यह न केवल नवादा के व्यापारियों का पलायन है, बल्कि जिले के राजस्व की भी बड़ी हानि है। हाट की बंदोबस्ती से मिलने वाला पैसा यदि हाट के विकास पर खर्च किया जाता, तो आज यह स्थिति नहीं होती। सुविधाओं की कमी के कारण आम पशुपालक सीधे हाट में आने से कतराने लगा है। इसका फायदा बिचौलिए उठा रहे हैं। वे किसानों से सस्ते दामों पर गांव में ही पशु खरीद लेते हैं और फिर उन्हें दूसरे जिलों के हाटों में ऊंचे दामों पर बेचते हैं। इससे वास्तविक पशुपालक को उसकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। स्थानीय अर्थव्यवस्था पर चोट हाट केवल पशुओं की बिक्री का स्थान नहीं होता। इसके इर्द-गिर्द एक पूरा इकोसिस्टम काम करता है। रस्सी बेचने वाले, चोकर-दाना के दुकानदार, होटल चलाने वाले और परिवहन (पिकअप-ट्रक) से जुड़े लोग। भदौनी हाट के उजड़ने से इन हजारों परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट मंडरा रहा है। --------------------- लोगों की जुबानी, दर्द की कहानी: 1.हम पुश्तैनी रूप से भदौनी हाट में अपनी गायें लेकर आते रहे हैं, लेकिन अब यहां आना सजा जैसा लगता है। न पशुओं के लिए पानी की नाद है, न हमारे बैठने के लिए छाया। दिन भर धूप में तपने के बाद पशु बीमार पड़ जाते हैं। अगर यही हाल रहा, तो अगले साल से हम भी गिरियक हाट का ही रुख करेंगे। -नंदू पासवान, हाट व्यापारी, भदौनी, नवादा। 2.व्यापारी सुरक्षा और सुविधा चाहता है। भदौनी हाट में गंदगी और कीचड़ का अंबार लगा रहता है। खरीदार अब यहां आने से कतराते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि गंदगी के कारण पशु बीमार न हो जाए। गिरियक हाट में सुविधाएं भदौनी से कहीं बेहतर हैं, इसलिए लोग वहां जाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। -प्रदीप चौधरी, हाटपर, भदौनी, नवादा। 3.हाट से ही समीप के छोटे-बड़े दुकानों की रौनक रहती थी, जो धीरे-धीरे खत्म हो गई है। पशु कम आते हैं तो हमारा दाना-चोकर भी नहीं बिकता। प्रशासन बस टैक्स वसूली में लगा है, लेकिन विकास के नाम पर एक ईंट भी नहीं जोड़ी गई। अनेक गरीब दुकानदारों का भविष्य अब अंधकारमय दिख रहा है। -वीरेंद्र यादव, हाटपर, भदौनी, नवादा। 4.भदौनी हाट जिले की पहचान रहा है, लेकिन आज यह अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। जलजमाव और बिजली की व्यवस्था न होने से रात में व्यापारियों को डर लगता है। सरकार को चाहिए कि अविलंब यहां शेड और पानी की व्यवस्था करे, वरना यह ऐतिहासिक बाजार इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएगा। -रामकृपाल पंडित, हाटपर, भदौनी, नवादा। ---------------------------- समाधान की दिशा के सार्थक कदम: भदौनी हाट को फिर से जीवित करने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास की आवश्यकता है। आधुनिकीकरण के क्रम में पूरे परिसर को कंक्रीट युक्त किया जाए ताकि जलजमाव न हो। उन्नत सुविधा के क्रम में सुरक्षा के दृष्टिकोण से परिसर में हाई-मास्ट लाइटें लगाई जाएं। चिकित्सा केन्द्र के तहत हाट के दिन एक मोबाइल वेटनरी यूनिट की तैनाती हो, जो मवेशियों की जांच कर सके। सहुलियत प्रदान करने के तहत दूर से आने वाले किसानों के लिए पशुपालक विश्राम गृह व शुद्ध पेयजल की व्यवस्था हो। ---------------------- दूध के कर्ज में डूबा पशुपालक: बढ़ती लागत और घटती नस्ल का संकट नवादा, हिसं। भदौनी पशु हाट की बदहाली केवल बुनियादी सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जिले के पशुपालन क्षेत्र में आ रहे एक गहरे संरचनात्मक संकट का भी प्रतीक है। नवादा के ग्रामीण इलाकों में पशुपालन अब लाभ का सौदा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक मजबूरी का निवेश बन गया है। इस संकट के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं, चारा महंगा, नस्ल कमजोर और इलाज की अनुपलब्धता। पिछले दो वर्षों में सूखे चारे (कुट्टी या भूसा) और पशु आहार (खली, चोकर, दाना) की कीमतों में 40 से 50 प्रतिशत तक का उछाल आया है। पशुपालक नारायण यादव व सकलदेव यादव बताते हैं, जितने का दूध नहीं बिकता, उससे ज्यादा का चारा मवेशी खा जाते हैं। पहले नदियों के किनारे और साझा जमीनों पर चारागाह हुआ करते थे, जहां पशु मुफ्त में चर लेते थे। अब वे जमीनें या तो अतिक्रमण का शिकार हैं या नदियों के सूखने से बंजर हो चुकी हैं। भदौनी हाट में अब देसी नस्लों की उपलब्धता रहती है, जिनकी दूध देने की क्षमता कम होती है। उन्नत नस्ल की गायों जैसे गिर या साहीवाल या भैंसों जैसे मुर्रा के लिए पशुपालकों को हरियाणा या पंजाब के व्यापारियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो बेहद महंगे होते हैं। जिले में कृत्रिम गर्भाधान की सरकारी सुविधाएं कागजों तक सिमटी हुई हैं, जिससे नई पीढ़ी के पशु कमजोर पैदा हो रहे हैं। साथ ही, हाट में बीमार पशुओं की जांच के लिए कोई स्थायी केंद्र नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पशु अस्पताल भवनों तक सीमित हैं, जहां न समय पर डॉक्टर मिलते हैं और न ही दवाइयां। जब पशु बीमार पड़ता है, तो पशुपालक को निजी डॉक्टरों की भारी फीस भरनी पड़ती है, जो अक्सर उनकी जमा-पूंजी खत्म कर देती है। आमजन कहते हैं कि हाल यह है कि हाट की बदहाली और बढ़ती लागत के कारण नवादा का युवा वर्ग अब पशुपालन से मुंह मोड़ रहा है। यदि प्रशासन ने केवल हाट की मरम्मत की और पशुपालक की इन बुनियादी समस्याओं को नजरअंदाज किया, तो आने वाले समय में जिले की दूध आपूर्ति के लिए हमें पूरी तरह बाहरी राज्यों पर निर्भर होना पड़ेगा। पशुपालन को बचाने के लिए चारे पर सब्सिडी और नस्ल सुधार के ठोस कार्यक्रमों की तत्काल आवश्यकता है।