बिसुआ मेला कल, मछंदरा जलप्रपात पर सैलानियों का लगेगा जमघट

Newswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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बैशाखी पर्व बिसुआ पर कौआकोल का मछंदरा जलप्रपात सैलानियों से भरा रहेगा। लोग यहां स्नान कर बाबा मछंदरनाथ की पूजा करते हैं। यह स्थल धार्मिक और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। मछंदरा जलप्रपात का पानी गर्मियों में भीड़ को आकर्षित करता है, लेकिन विकास की कमी के कारण यह पर्यटन स्थल नहीं बन पाया है।

बिसुआ मेला कल, मछंदरा जलप्रपात पर सैलानियों का लगेगा जमघट

बैशाखी पर्व बिसुआ पर कौआकोल का प्रसिद्ध जलप्रपात मछंदरा में सैलानियों का जमघट लगेगा। यह जलप्रपात पिकनिक स्पॉट के साथ आस्था का स्थल रहने के कारण 14 अप्रैल यानी बैशाखी पर्व बिसुआ के दिन काफी भीड़ रहती है। लोग मंछदरा कुंड में स्नान कर बाबा मछंदरनाथ की पूजा अर्चना कर मनोवांछित फल की कामना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति एवं बिसुआ के दिन मछंदरा कुंड में स्नान करने से चर्मरोग से छुटकारा मिल जाती है। गौरतलब है कि बिहार का कश्मीर कहा जाने वाला ककोलत जलप्रपात का ही दूसरा रूप कौआकोल का मछंदरा जलप्रपात है। ककोलत की तरह ही इसकी पहचान तथा खासियत अब दूर दूर तक फैल चुकी है।

ऐतिहासिक, पुरातात्विक और धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण यह जलप्रपात अपने शीतल जल और नैसर्गिक सौंदर्य के लिए काफी प्रसिद्ध है। नवादा जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर तथा प्रखंड मुख्यालय से 6 किलोमीटर दूरी पर पूरब उत्तर की दिशा में जमुई तथा कौआकोल की पर्वत मालाओं के मध्य तीन ओर से ऊंचे ऊंचे पर्वत शृंखलाओं से घिरे सुरम्य वादियों के बीच यह जलप्रपात अवस्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए नवादा से बस के द्वारा कौआकोल तथा कौआकोल से छोटी गाड़ी जैसे टेम्पु, रिक्शा तथा मोटर साइकिल से जाया जा सकता है। प्राकृतिक छटाओं के बीच पर्वत शृंखलाओं व वन लताओं की फूलों तथा रमणीय मनोरम दृश्य को अपने में समेटे यह जलप्रपात हर किसी का मन को मोह लेता है। अपनी मनोरम दृश्य तथा शीतल जल धारा के कारण यह जल प्रपात क्षेत्रीय तथा दूर दूर के लोगों के लिए पर्यटक के रूप में पसंदीदा स्थल बन चुका है। इस स्थल पर सीमावर्ती राज्य झारखंड तथा बिहार के दूर दराज के इलाके से लोग स्नान व पूजन करने तथा पिकनिक मनाने के लिए आते हैं। खास कर 14 अप्रैल को बिसुआ पर्व के दिन यहां स्नान, पूजा एवं पिकनिक मनाने आने वाले लोगों से यह स्थल पट जाता है। पिकनिक स्पॉट के रूप में भी यह स्थान बिहार एवं झारखंड के लोगों के बीच काफी प्रसिद्ध हो चुका है। बाबा गोरखनाथ के अनुयाई बाबा मछंदरनाथ ने की थी घोर तपस्या किंवदंती के अनुसार लगभग 400 वर्ष पूर्व जैन धर्म के धर्मावलंबी बाबा गोरखनाथ के अनुयाई बाबा मछंदरनाथ ने की वर्षों तक यहां पर घोर तपस्या किया था। उनका निर्वासन भी इसी स्थान पर हुआ था। तब से ही इस स्थल का नाम बाबा मछंदरनाथ के नाम पर ही मछंदरा पड़ा है। आज भी इस क्षेत्र तथा सीमावर्ती राज्य के लोग यहां प्रत्येक वर्ष पूजा अर्चना करने आस्था और श्रद्धा से पहुंचते हैं। जिसके चलते यह स्थल श्रद्धा और आस्था का केन्द्र बना हुआ है। दूसरी किंवदंती के अनुसार रामायण काल में कागभुशुण्डि जी ने भी इस स्थान पर आकर प्रवचन किया करते थे। हालांकि इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं। पर इसकी सभी जगह पर चर्चाएं होती हैं। धरातल से करीब 200 फीट ऊंची पहाड़ी के ऊपर बाबा मछंदरनाथ के निर्वासन स्थल के इर्द गिर्द 6 छोटे बड़े कुंड व कई देवी देवताओं की पिंडी स्थापित हैं। जिसे लोग वन देवी के नाम से जानते हैं और पूजा करते हैं। इसी स्थान पर एक भगवान शिव की मंदिर भी है। जिसे लोग हाल के दिनों में बने होने की बात करते हैं। पहाड़ी से प्रवाहित होती है शीतल जल की धारा पहाड़ी के ऊपर के कुंडों से निर्बाध रुप से हमेशा ही शीतल जल की धारा प्रवाहित होती रहती है। लगातार प्रवाहित पानी से अगल बगल के गांवों के किसानों की खेती के लिए पटवन का काम होता है। इस दृष्टिकोण से भी यह जलप्रपात काफी महत्वपूर्ण बना हुआ है। मछंदरा अपने नैसर्गिक सौन्दर्य और शीतल जल की धारा के कारण क्षेत्र के लोगों के साथ साथ दूर दराज के लोगों को भी लुभाता रहा है। इसके धारा की शीतलता के कारण गर्मी के दिनों में खास कर मार्च से जून जुलाई तक यहां आने वाले लोगों की काफी भीड़ रहती है। हालांकि सरकार की उदासीनता के कारण इस स्थल का चहुमुखी विकास नहीं हो सका है। जिसके कारण यह जलप्रपात पर्यटन स्थल का रुप नहीं ले पा रहा है। अगर मछंदरा जलप्रपात तक पहुंचने वाले रास्ते को सुगम कर दिया जाए और इस स्थल को विकसित कर दिया जाए तो आने वाले दिनों में अपनी प्रसिद्धियों को ले मछंदरा जलप्रपात पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो सकता है तथा ककोलत की तरह ही यह स्थल विश्व के मानचित्र पर अपना स्थान बना सकता है। कौआकोल से शिव शंकर सिंह

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