चाक से मशीन तक पहुंचा कुल्हड़ का निर्माण पर कारोबार में नहीं आई जान

Feb 09, 2026 06:04 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर
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मुजफ्फरपुर में कुल्हड़ और गिलास बनाने वाले कुंभकारों ने सरकारी प्रोत्साहन की कमी पर चिंता जताई है। वे चाहते हैं कि कुल्हड़ की खरीद अनिवार्य हो और उन्हें प्रशिक्षण और सस्ते ऋण मिलें। नई तकनीक से कुल्हड़ बनाने में मदद मिली है, लेकिन बाजार में विदेशी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा के कारण कठिनाई बढ़ी है।

चाक से मशीन तक पहुंचा कुल्हड़ का  निर्माण पर कारोबार में नहीं आई जान

मुजफ्फरपुर। चाय और लस्सी जब अपनी माटी के कुल्हड़ में हो तो इसकी सोंधी महक आत्मा को तृप्त कर देती है। कुछ दुकानों पर लोग कुल्हड़ों में ही चाय या लस्सी पीने जाते हैं। ये कुल्हड़ इन दुकानों की खास पहचान होती है। ये मिट्टी के कुल्हड़ व गिलास चाय एवं लस्सी का स्वाद ही नहीं बढ़ाते, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी अनुकूल हैं। बावजूद इन्हें अपेक्षित सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिल सका है। पताही जगरनाथ में कुंभकारों के लगभग दस परिवार कुल्हड़ बनाने के पुश्तैनी पेशे से जुड़े हैं। इनका कहना है कि सरकारी विभागों में कुल्हड़ की खरीद अनिवार्य हो, समय-समय पर प्रशिक्षण, सरकारी योजनाओं का लाभ और सस्ता ऋण मिले तो न केवल बड़ी संख्या में लोग इस पेशे से जुड़ेंगे, बल्कि कुल्हड़ से जिले को नई पहचान मिलेगी।

जिले के कुंभकार पहले हस्तचालित चाक से कुल्हड़ बनाते थे। इस क्षेत्र में तकनीक में बदलाव हुआ है। हस्तचालित चाक की जगह बिजली से चलने वाली जिगर-जोली चाक ने ले ली है। इस मशीन ने मिट्टी के बर्तन बनाने की कला को नई उंचाइयां दी है। इसने मिट्टी के बर्तन बनाना आसान कर दिया है। हालांकि विपणन सुविधा और सही दाम नहीं मिल पाना बड़ी समस्या है। कुल्हड़ बनाने वाले छोटू पंडित कहते हैं कि कुल्हड़ बनाने के लिए विशेष मिट्टी की जरूरत होती है। स्थानीय स्तर पर इसे कुंभरौटी मिट्टी कहा जाता है। इसे तुर्की, बलिया, सिवाईपट्टी के बनघारा व मोतीपुर से खास तौर पर मंगाया जाता है। यह मिट्टी ट्रैक्टर की प्रति ट्रॉली आठ हजार रुपये में आती है। मिट्टी की छंटाई कर इसे पीसने लायक बनाया जाता है। इसके बाद इसे मशीन में बारीक पीसा जाता है। मशीन से मिट्टी पीसने के बाद इसे फूलने के लिए लगभग 12 घंटे पानी में रखा जाता है। इसके बाद पगमिल मशीन में इसकी पेड़ाई की जाती है। फिर कुल्हड़ या अन्य बर्तनों के अनुसार मिट्टी की लोनियां बनाई जाती है। इन लोनियों से जिगर-जोली मशीन पर कुल्हड़ या गिलास तैयार करते हैं। बताया कि लंबी प्रकिया के बाद तैयार कुल्हड़ को सही दाम और बाजार नहीं मिल पाना मन को दुखी करता है।

कुंभकारों ने बताया कि मिट्टी के बने कुल्हड़ व गिलास महंगे होते हैं। बाजार में इसकी तुलना में काफी कम कीमत में चीन निर्मित थर्मोकोल के कप व गिलास उपलब्ध हैं। अरुण पंडित कहते हैं कि शादी व अन्य समारोहों में कुल्हड़ की मांग कम ही होती है। कुल्हड़ या मिट्टी से बने गिलास के सबसे बड़े खरीददार चाय व लस्सी दुकानदार हैं। जिगर-जोली चाक पर 40 एमएल के कुल्हड़ से लेकर 250 एमएल तक के गिलास तैयार किए जाते हैं। 40 एमएल वाला साधारण कुल्हड़ लगभग एक रुपये प्रति पीस व 250 एमएल वाला डिजाइनर गिलास का सात से आठ रुपये प्रति पीस दाम मिलता है। चीनी थर्मोकोल इसकी तुलना में सस्ता होता है। उसके टूटने-फूटने का खतरा भी कम होता है। इससे शादी-ब्याह या अन्य समारोह में लोग कुल्हड़ या गिलास कम ही खरीदते हैं। पारंपरिक चीजों को प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण विदेशी चीजें आज बाजार पर हावी हो रही हैं। वर्षों पहले रेलवे ने अपनी कैंटिन व ट्रेनों में कुल्हड़ में चाय उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। तब कई सरकारी विभागों ने अपनी कैंटिनों में कुल्हड़ में चाय उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। इससे कुल्हड़ व्यवसाय को नई पहचान मिली थी। कुल्हड़ों की मांग बढ़ी थी। रेलवे व सरकारी विभाग इसके सबसे बड़े खरीददार बने थे। धीरे-धीरे यह योजना समाप्त हो गई। इसके बाद सरकारी विभाग के कैंटिनों में कुल्हड़ की खरीददारी बंद हो गई।

गोपाल पंडित ने बताया कि कुल्हड़ का कोई थोक खरीददार नहीं है। कुल्हड़ बनाने वाले को ही चाय व अन्य दुकानों पर पहुंचाना होता है। कुल्हड़ बेचने के लिए उन्हें शहर के इस छोर से उस छोर तक जाना होता है। कुल्हड़ों के खरीददार स्थायी चाय दुकानदार हैं। गर्मी के दिनों में कुल्हड़ की मांग घट जाती है, जबकि ठंड में बढ़ जाती है। वहीं, गिलास की मांग ठंड में कम हो जाती है और गर्मी में बढ़ जाती है।

बोले जिम्मेदार

बिहार शताब्दी असंगठित कार्यक्षेत्र कामगार शिल्पकार सामाजिक सुरक्षा योजना में कुंभकार भी शामिल हैं। मिट्टी के बर्तन बनाने को लेकर समय-समय पर प्रशिक्षण भी दिलाया जाता है। बिजली चालित चाक भी दिए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के तहत कुंभकारों को शामिल किया गया है। उनके पेशे से संबंधित बुनियादी प्रशिक्षण, टूलकिट प्रोत्साहन योजना के तहत 15 हजार रुपये तक की सहायता, रियायती दर पर ऋण व तैयार सामग्री को विपणन की सुविधाएं दी जा रही हैं। नई तकनीक से उनका काम आसान हो रहा है।

-नीरज नयन, उप श्रमायुक्त

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