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लोकसभा चुनाव 2019 : नीति-सिद्धांतों की बात हर बार अटक जाती है जातीय गोलबंदी पर

लोकसभा चुनाव 2019 : नीति-सिद्धांतों की बात हर बार अटक जाती है जातीय गोलबंदी पर

पूर्वी चंपारण को दो स्तरों पर ज्यादा शोहरत हासिल है। दुनिया में लोग इसे महात्मा गांधी के ‘चंपारण सत्याग्रह की वजह से जानते हैं। दूसरी पहचान एशिया महादेश में केसरिया के बौद्ध स्तूप को लेकर है। गौतम बुद्ध की करुणा और महात्मा गांधी की अहिंसा की इस भूमि पर लगभग हर चुनाव में पार्टी के नीति-सिद्धांतों से बात शुरू होती है और अंत में जातीय गोलबंदी पर आकर ठहर जाती है। सत्रहवीं लोकसभा के गठन को लेकर हो रहे चुनाव के लिए एक ओर भाजपा के कद्दावर नेता हैं, तो दूसरी ओर तीन नये प्रत्याशी। भाजपा ने पांच बार इस क्षेत्र से सांसद रहे राधामोहन सिंह को नौवीं बार प्रत्याशी बनाया है। रालोसपा ने आकाश कुमार सिंह को महागठबंधन के प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारा है। आकाश कुमार सिंह यहां से सांसद और केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री रहे अखिलेश प्रसाद सिंह के पुत्र हैं। सीपीआई ने अपने कैडर प्रभाकर जायसवाल को मैदान में उतारा है। बसपा प्रमुख मायावती ने भी डा. अनिल कुमार सहनी को पार्टी का उम्मीदवार बनाया है। वे राज्यसभा सदस्य रहे हैं।

कांग्रेस व भाजपा को पांच मौके

अबतक के सोलह लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा ने पांच- पांच बार कब्जा जमाया है। मोतिहारी अब पूर्वी चंपारण संसदीय क्षेत्र बन गया है। इस सीट से सन् 1952 से 1971 तक लगातार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विभूति मिश्र सांसद रहे। लेकिन, 1977 की आंधी से दरकी पार्टी फिर संभल नहीं पाई। अंतिम बार 1984 में कांग्रेस की प्रभावती गुप्ता जीतीं। कांग्रेस के बाद इस सीट पर सीपीआई की पकड़ बनी। लेकिन, उसके लिए भी यह सीट महफूज नहीं रही। 1991 के बाद उसने भी कभी जीत का स्वाद नहीं चखा।

दिलचस्प होगी चंपारण की लड़ाई

इस बार यहां की लड़ाई काफी दिलचस्प होगी। एक ओर भाजपा के दिग्गज नेता राधामोहन सिंह को अपने लंबे अनुभव और सामाजिक सरोकार पर भरोसा है तो दूसरी ओर महागठबंधन के उम्मीदवार को अपने युवा होने और पिता के राजनीतिक अनुभव की कुशल बाजीगरी का विश्वास है। इसके बावजूद दोनों गठबंधनों को अपनी ‘कास्ट केमिस्ट्री के लाभ की उम्मीद है। सीपीआई के प्रभाकर जायसवाल को अपने कैडरों की ताकत का भरोसा है। यहां से सीपीआई के कमला मिश्र मधुकर दो-बार सांसद रहे हैं।

गठबंधन की झोली में जाती है सीट

चंपारण की धरती कांग्रेस के लिए मुफीद रही है। लेकिन, 1977 के बाद नौ बार हुए लोस चुनावों में कांग्रेस ने सिर्फ 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर में जीत हासिल की। कांग्रेस की जमीन खिसकने की वजह से इस सीट का गठबंधन की राजनीति में दूसरी पार्टी की झोली में चला जाना रहा है। दूसरी ओर, भाजपा ने क्षेत्र पर लगातार अपनी पकड़ मजबूत की। यही वजह है कि 1989 में इस सीट से पहली दफा लड़ी भाजपा ने पांच बार जीत हासिल की है।

कुल मतदाता

163118

7पुरुष मतदाता

871576

महिला मतदाता

759582

मतदान केंद्र

3269

थर्ड जेंडर

29

कौन जीते

कौन हारे

2014

जीते: राधामोहन सिंह, भाजपा, 400452

हारे: विनोद कु. श्रीवास्तव, राजद, 208289

2009

जीते: राधामोहन सिंह, बीजेपी, 2011140

हारे: अखिलेश प्र. सिंह, राजद, 121824

2004

जीते: अखिलेश प्र. सिंह, राजद, 348596

हारे: राधामोहन सिंह, भाजपा, 251572

1999

जीते: राधामोहन सिंह, भाजपा, 338696

हारे: रमा देवी, राजद, 317026

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  • Web Title:The principle of policy principles is stuck every time on ethnic grouping