The heat of the womb of heat shipwreck and dirt - गर्मी, गुरबत और गंदगी में उजड़ रही मां की कोख DA Image
6 दिसंबर, 2019|3:54|IST

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गर्मी, गुरबत और गंदगी में उजड़ रही मां की कोख

गर्मी, गुरबत और गंदगी में उजड़ रही मां की कोख

प्रचंड गर्मी, आग उगलती झोपड़ियों से लेकर पूरी बस्ती में गंदगी के अंबार और गुरबत की जिंदगी में कोख उजड़ रही हैं। मुजफ्फरपुर के कांटी प्रखंड के दो गांवों में 24 घंटे के अंतराल में चार बच्चों की मौत से लोग दहशत में हैं। आठ-नौ जून को रूपवाड़ा पंचायत के रामपुर साह गांव में एक ही परिवार के दो बच्चों की मौत हुई है। बगल की पानापुर हवेली पंचायत के दरियापुर गांव के एक ही टोला में 13 व 14 जून को दो मां के कोख उजड़ गए। जिनके कोख उजड़े उनके लिए आज भी बच्चों की मौत बड़ी पहेली हैं। कोई चमकी, कोई एईएस तो कोई इंसेफेलाइटिस कहता है। लेकिन डॉक्टर से लेकर अफसर-मंत्री तक इस रोग के कारण अथवा आरंभिक पहचान नहीं बता पा रहे हैं।

दरियापुर में एक ही गांव में दो बच्चों की मौत : दरियापुर में बाग व बसवाड़ी के बीच सुबोध पासवान की फूस पर एस्बेस्टस की झोपड़ी है। सुबोध महतो को इंदिरा आवास का पैसा मिल चुका है। उसने ईंट खरीदी, परन्तु अब तक मकान नहीं बना पाया है। सुबोध की साढ़े छह वर्षीया बेटी निधि तो रात में खाना खाकर सोई। 13 जून की सुबह नहाकर खाने के बाद मां के साथ गांव में दाल खरीदने गई। लौटने के बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई। आंगनबाड़ी सेविका रानी कुमारी ने निधि को कांटी पीएचसी में भर्ती कराया। सुबोध ने बताया कि पीएचसी के एईएस वार्ड में कमजोर एसी का हवाला देकर निधि को एसकेएमसीएच रेफर किया गया। उसी शाम करीब तीन बजे निधि ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। निधि की मौत के बाद सिसकियां थमी भी नहीं थी कि दरियापुर गांव के ही नुनु महतो के बेटे बेटा प्रिंस (4 वर्ष) की मौत केजरीवाल अस्पताल में हो गई। 24 घंटे में दो-दो बच्चों की मौत से गांववाले सदमे में हैं। मृत बच्चे प्रिंस के पिता नुनु महतो ने बताया कि मेरा बेटा 12 जून की शाम समोसा खाकर सोया। अगली सुबह तबीयत बिगड़ी। केजरीवाल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 14 जून की सुबह उसने दम तोड़ दिया। आम-लीची के पेड़ों पर ही बांस बांध कर तैयार झोपड़ी में नुनु, पांच बेटियों, इकलौते बेटे प्रिंस व पत्नी के साथ बसर करता था। उसकी झोपड़ी आम-लीची के बाग-बसबारी के बीच में है। बच्चे दिनभर लीची के सूखे पत्तों व जमीन पर ही सोते-खेलते हैं।

बच्चों की दिनचर्या के मामले में गरीब बेखबर

जिन बदनसीब मां-बाप के बच्चे मर रहे हैं, वे सब मजदूर हैं। उन्हें तो यह भी पता नहीं है कि बीमार होने से एक दिन पहले बच्चे कहां खेल, भटक या सो रहे थे अथवा क्या खाया-पीया। 13 जून को सुबोध की पत्नी रेखा स्वयं सहायता समूह की मीटिंग से लौटी तो बच्ची की हालत बिगड़ चुकी थी। उसी मीटिंग से नुनु की पत्नी शिला देवी लौटी तो उसके बेटे प्रिंस की हालत बिगड़ी हुई थी।

कूड़े के ढेर पर खेलना-सोना और खाना

इसी तरह रामपुर साह गांव में एक ही परिवार के दो-दो बच्चों की मौत से पूरा गांव खौफ में है। सभी को डर सता रहा है कि पता नहीं अगला नंबर किस परिवार के बच्चे का आ जाए। सोमवार को जिन दो मां सुनीता और उसकी जेठानी चिंता की कोख उजड़ी थी वे बसबाड़ी में कूड़े की ढेर पर उदास बैठी मिलीं। इसी जगह आठ जून से पहले उनके बच्चे खेला करते थे। सुनीता का पति सुनील मांझी मजदूर है। आठ जून की सुबह अचानक डेढ़ वर्षीय बेटे प्रिंस कुमार की हालत बिगड़ गई। रात में दूध पीकर सोया था। स्थानीय क्वैक के घर जाते समय रास्ते में ही प्रिंस ने दम तोड़ दिया। अगले दिन चिंता के दो साल के बेटे राज कुमार की हालत बिगड़ी। स्थानीय क्वैक से इलाज कराया। स्थिति गंभीर होने पर मेडिकल पहुंचे, परन्तु गेट पर ही बच्चे ने दम तोड़ दिया। इस टोला में कोई इंदिरा आवास नहीं है। इस साल जागरूकता अभियान चला ही नहीं।

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