संकट में पुश्तैनी पेशा, मदद मिले तो मुफलिसी को मात दें मूर्तिकार
मुजफ्फरपुर के मूर्तिकार आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। महंगे सामग्री के बीच, मूर्तियों के दाम कम हो रहे हैं। वे मेहनत से काम करते हैं, लेकिन उचित मूल्य नहीं मिल रहा। सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है, जिससे उनके बच्चों को शिक्षा की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
मुजफ्फरपुर। पीढ़ियों से मूर्तियां बनाने वाले आज तक मुफलिसी से नहीं उबर सके हैं। मिट्टी से लेकर पुआल और पेंट तक महंगे हो गए, पर मूर्तियों के दाम घटते जा रहे हैं। ऐसे में पुश्तैनी पेशा संकट में है। जिले के मूर्तिकारों का दर्द है कि उनकी आर्थिक स्थिति मजदूरों जैसी है। रात-दिन पूरा परिवार मिलकर मूर्तियां बनाते हैं। अभी इतनी ठंड में हाथ कंपकंपा रहे हैं, मगर कूची थामे मां सरस्वती की मूर्तियों के रंग-रोगन में जुटे हैं। लोग हमारी मुश्किलें नहीं देखते, बल्कि वे सीधे पांच सौ की मूर्ति का दाम दो से तीन सौ रुपया लगा देते हैं।
अगर वर्षों से मांग की जा रही माटी कला बोर्ड का गठन हो जाता तो हमारे कल्याण के लिए नीतियां बनतीं। मूर्तियां का वाजिब दाम ही नहीं, बल्कि बिक्री के लिए बाजार भी मिल पाता। शहर के मूर्तिकारों ने बताया कि उन्हें न मुख्यमंत्री उद्यमी योजना का लाभ मिल रहा है और न विश्वकर्मा योजना का। आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि विद्या की देवी का स्वरूप गढ़ने वाले हमारे बच्चे ही ऊंची शिक्षा को तरस रहे हैं। मुफलिसी के कारण बुरे दौर से गुजर रहे हुनरमंद हाथ को सरकार का साथ चाहिए। जिले के मूर्तिकारों को उनकी कला की उचित कीमत नहीं मिल रही है, जिससे वे आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं। हर पर्व में बड़ी उम्मीद से प्रतिमा बनाते हैं, लेकिन इतने पैसे नहीं मिल पाते, जिससे दाल-रोटी के अलावा कुछ अर्जित कर सकें। शहर में अभी मां सरस्वती की मूर्तियां बनाने में जुटे मूर्तिकारों ने बताया कि महाजनी कर्ज लेकर मूर्तियां बनाते हैं, लेकिन यह पुश्तैनी पेशा घाटे का कारोबार साबित हो रहा है। सीजन शुरू होने पर सपरिवार काम में जुट जाते हैं। जरूरत पड़ने पर बाहर के कारीगर को भी साथ रखकर प्रतिमा तैयार करते हैं, लेकिन हमारी हालत जैसी पहले थी, वैसी ही आज है। मूर्तिकारों ने बताया कि हमलोग कम पढ़-लिखे हैं, जिस कारण सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। मुख्यमंत्री उद्योग योजना या विश्वकर्मा योजना का लाभ मिलता तो न केवल आर्थिक संकट से उबर पाते, बल्कि अनुदान राशि से अपने व्यवसाय को और गति दे पाते। अभी हालत यह है कि कड़ाके की ठंड में भी दिन-रात काम कर रहे हैं। सरस्वती पूजा को देखते हुए ज्यादा से ज्यादा मूर्तियां बनाने में लगे हुए हैं। गीली मिट्टी से इस ठंड के मौसम में प्रतिमा तैयार करने में कितनी परेशानी होती है, यह कोई नहीं जानता। लेकिन, हमें मूर्तियों के वाजिब दाम नहीं मिल पाते। इसबार प्रतिमा का ऑर्डर जितना मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल रहा है, जिससे हमलोगों में मायूसी है।
पूंजी के अभाव में नहीं हो पाती अच्छी आमदनी
साहू रोड मूर्ति गली के वयोवृद्ध मूर्तिकार सह राज्य शिल्पकला संघ के उपाध्यक्ष गणेश पंडित ने बताया कि जिले में करीब 500 मूर्तिकार हैं। वहीं, शहर में नियमित रूप से मूर्ति बनाने वाले 50 से अधिक मूर्तिकार हैं। पहले और आज की कलाकृतियों में काफी अंतर है। पहले सारी मूर्तियां बिक जाती थीं, मगर आज अच्छी कलाकृतियों वाली मूर्तियां भी धरी रह जाती हैं। पहले शहर से लेकर गांव तक सामूहिक पूजा अधिक हुआ करती थी। खासकर शिक्षण संस्थानों में सरस्वती पूजा में बड़ी मूर्तियों की अधिक मांग होती थी, लेकिन अब उनकी संख्या में काफी कमी आई है। लोग छोटी-छोटी मूर्तियां खरीदकर पूजा करने लगे हैं। बताया कि मूर्तिकार खुद की पूंजी से मूर्तियां तैयार करते हैं। साज-सज्जा के महंगे सामान भी खुद ही खरीदते हैं। इसमें काफी खर्च बढ़ जाता है, लेकिन लोग लागत खर्च भी देने में हिचकिचाते हैं।
छह हजार से दस हजार प्रति टेलर मिल रही मिट्टी
हरिसभा चौक के मूर्तिकार अरुण पंडित ने बताया कि मूर्ति तैयार करने में दो तरह की मिट्टी का उपयोग किया जाता है। बड़ी मूर्तियों के लिए उपयोग में आने वाली मिट्टी छह हजार रुपए प्रति टेलर मिल रही है, जो जिले के कुछ चुनिंदा प्रखंडों के चौर से मंगवाते हैं। जबकि, छोटी मूर्तियों को तैयार करने के लिए गंगा नदी की काली मिट्टी मंगानी पड़ती है। इस मिट्टी की कीमत आठ हजार से लेकर दस हजार रुपए प्रति टेलर पड़ती है। दिनोंदिन सारी चीजों के दाम बढ़ रहे हैं, मगर विडंबना है कि लोग मूर्तिकार को वाजिब दाम भी नहीं देना चाहते।
पुआल, सुतली, पटुआ और पेंट भी हुआ महंगा
आमगोला पड़ाव पोखर के मूर्तिकार जयप्रकाश पंडित ने बताया कि बीते वर्ष की तुलना में मूर्ति निर्माण खर्च में 20 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इस बार समस्तीपुर से पुआल मंगाना पड़ा है। पांच सौ रुपए क्विंटल पुआल खरीदारी करनी पड़ी है। वहीं, एक बांस की कीमत 300 रुपए हो गई है। पटुआ और सुतली की कीमत में भी काफी उछाल आया है, क्योंकि बंगलादेश से संबंध बिगड़ने के बाद वहां से आवक नहीं हो पा रही है, जिसके कारण 200 रुपए किलो सुतली खरीदनी पड़ रही है।
पूरे वर्ष चलता है मूर्तियों का कारोबार
पड़ाव पोखर के मूर्तिकार पप्पू पंडित ने बताया कि पूरे वर्ष मूर्तियां अलग-अलग अवसरों पर बनाते हैं। यह एक उद्यम के समान है। सरकार को इसपर ध्यान देना चाहिए। सरस्वती पूजा, होलिका, विश्वकर्मा पूजा, गणेश पूजा, दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा, काली पूजा मुख्य रूप से होती है। सभी प्रतिमाएं उसी समय बेचने की मजबूरी होती है।
बचीं मूर्तियों को सालभर रखना चुनौती
आमगोला पड़ाव पोखर के मूर्तिकार बबलू पंडित ने बताया कि सरस्वती पूजा में ऑर्डर मिलने के बाद भी कभी-कभी लोग प्रतिमा लेने नहीं आते हैं। कई मूर्तियां ग्राहकों के नहीं आने पर धरी रह जाती हैं। ऐसी स्थिति में हमलोगों को मूर्तियों को सालभर संभाल कर रखना पड़ता है। यह मूर्तिकारों के लिए चुनौती बन जाती है।
मूर्तिकारों को लाभ देने का है प्रावधान
बिहार शताब्दी असंगठित कार्यक्षेत्र कामगार शिल्पकार सामाजिक सुरक्षा योजना 2011 के तहत मूर्तिकारों को लाभ देने का प्रावधान है। इसके तहत दुर्घटना में मृत्यु होने पर दो लाख रुपये, स्वाभाविक मृत्यु पर एक लाख रुपये, असाध्य बीमारियों के इलाज के लिए 50 हजार रुपये की सहायता दी जाती है। इसके अलावा अगर दुर्घटना में घायल होते हैं तो उन्हें पांच दिनों के इलाज का खर्च प्रतिदिन दो हजार रुपये के हिसाब से दस हजार रुपये देने के प्रावधान है। मैट्रिक परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने वाले मेधावी विद्यार्थियों को भी प्रोत्साहन राशि का प्रावधान है।
-नीरज नयन, उप श्रम आयुक्त
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