चिमनी के धुएं में कैसे उजाला देखें, बच्चों को पढ़ाएं कि निवाला देखें

Jan 09, 2026 05:40 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर
share

मुजफ्फरपुर के ईंट भट्ठों पर काम कर रहे श्रमिक संकट में हैं। 260 भट्ठों में से 30 बंद हो गए हैं, जिससे रोजी-रोटी का संकट बढ़ गया है। मजदूरों को सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल रहा, जिससे उनके बच्चों का भविष्य भी संकट में है। सरकार से मदद की उम्मीद है ताकि जीवनयापन सुगम हो सके।

चिमनी के धुएं में कैसे उजाला देखें, बच्चों को पढ़ाएं कि निवाला देखें

मुजफ्फरपुर। जिस ईंट से इमारतें खड़ी होती हैं, शहरी विकास की बुनियाद पड़ती है, उसे बनाने वाले हाथों पर इतने भी पैसे नहीं कि चिमनी के धुएं के पार बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का ख्वाब देख सकें। बाहर से आकर जिले के ईंट भट्ठों पर मजदूरी कर रहे श्रमिकों को तो सरकारी राशन का भी सहारा नहीं। इनका कहना है कि तीन से सात सौ रुपए की दिहाड़ी में खाना और कल के लिए बचाना मुमकिन ही नहीं। ज्यादा से ज्यादा सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाया जाए, ताकि जीवनयापन सुगम हो। वहीं, ईंट उत्पादन से जुड़े व्यवसायियों की भी अपनी व्यथा है।

कड़े नियम, अनुचित कर और लागत से भी कम ईंट की सरकारी दर इनकी परेशानी का सबब है। मजदूर और कारोबारी दोनों सरकार से मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जिले के ईंट संचालक और इसमें दिहाड़ी कमाने वाले मजदूर मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। एक-एक कर बंद होते भट्ठे के कारण मजदूरों के रोजी-रोटी का जरिया छिन रहा है। जिले में 260 ईंट भट्ठों में अबतक 30 बंद हो चुके हैं। अभी भट्ठा में काम करने वाले जिले में करीब 9200 मजदूर हैं, जिनका जीवनयापन ईंट भट्ठा से ही चल रहा है। इनमें 60 फीसदी मजदूर स्थानीय हैं, जबकि 40 फीसदी झारखंड एवं राज्य के विभिन्न जिलों से आकर यहां काम कर रहे हैं। मजदूरों में 20 फीसदी महिलाएं हैं, जो प्रवासी मजदूर हैं। ये अपने बच्चों के साथ ईंट भट्ठा में पूरे छह माह तक रहती हैं। ज्यादातर मजदूरों का कहना है कि सरकारी सुविधाओं का लाभ तो दूर, जोखिम भरे क्षेत्र में काम करते हुए चिकित्सा सुविधा से भी वे वंचित हैं। उनके बच्चों को समुचित शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है। उनका भविष्य भी ईंट भट्ठा मजदूर की तरफ जाता दिख रहा है। सकरा के ईंट भट्ठे में अपने परिवार के साथ नवादा से आई महिला मजदूर संगीता देवी ने कहा कि हम छह माह यहां रहते हैं। हमलोगों को सरकारी राशन मिलता तो पैसा बचता। वहीं, झारखंड के राकेश उरांव, जीता उरांव व राजेश उरांव ने बताया कि छह माह ईंट भट्ठा पर परिवार के साथ रहते हैं। बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे हैं। यहां सुविधा मिलती तो हमारे बच्चों का भविष्य भी संवरता। बेगूसराय के त्रिवेणी सदा ने बताया कि डॉक्टर कभी-कभी यहां आकर हमलोगों का चेकअप करें तो अच्छा रहता।

वहीं, जिला ईंट व्यवसायी संघ के सचिव उदय शंकर ने बताया कि ईंट व्यवसायी का व्यापार संकट में तो है ही, लेकिन मजदूरों को किसी प्रकार की दिक्कत न हो, इसका ख्याल रखा जाता है। बताया कि ज्यादातर मजदूरों को राशन कार्ड तक नहीं है। दिहाड़ी में जो मिलता है, उससे बाजार से राशन खरीदकर खाते हैं। ईंट भट्ठा संचालक उनके बच्चों के इलाज में अपने पैसे खर्च करते हैं। मजदूर का परिवार शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधा से वंचित न रहे, इसकी जिम्मेदारी सरकार की है। जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि ईंट भट्ठा मजदूरों की स्थिति को आकर देखें और उन्हें ज्यादा से ज्यादा सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित कराने की पहल करें। दूसरी जगहों से आकर ईंट भट्ठा में काम कर रहे मजदूरों को पंचायत या प्रखंड प्रशासन की ओर से सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना तो दूर, कड़ाके की ठंड में कंबल और अलाव तक नहीं दिया जाता है। यह व्यवस्था भी ईंट भट्ठा संचालक ही कर रहे हैं। अगर ईंट व्यवसायी इन मजदूरों पर ध्यान नहीं दे तो इनकी स्थिति और खराब हो जाएगी। कहा कि सरकार ईंट व्यवसायियों के साथ ही यहां काम करने वाले मजदूरों के प्रति भी उदासीन है। अगर इन्हें सरकार की तरफ से सुविधाएं नहीं मिलें तो मजदूर का रोजगार बंद हो जाएगा और राज्य में बाहर के मजदूर नहीं आएंगे। जिला ईंट व्यवसायी संघ के अध्यक्ष संत प्रताप नारायण सिंह ने कहा कि बिहार में सात हजार से घटकर अब 6500 के आसपास ईंट भट्ठा बच गए हैं। नुकसान के कारण पांच सौ ईंट भट्ठा बंद हो गए। एक भट्ठा में चार सौ मजदूरों के परिवार का रोजगार चलता है। अगर 6500 भट्ठे में प्रति भट्ठा चार सौ मजदूरों को जोड़ा जाए तो 26 लाख मजदूरों को बिहार में रोजगार मिल रहा है। ईंट भट्ठा संचालकों को टैक्स और सख्त नियमों से परेशान करने की जगह सरकार की ओर से प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

बोले जिम्मेदार

ईंट भट्ठा में काम करने वाले असंगठित मजदूरों की श्रेणी में आते हैं। दुर्घटना या स्वाभाविक मौत पर श्रम विभाग उनकी मदद करेगा। अगर मजदूरों को मजदूरी मिलने में कठिनाई हो रही हो तो उन्हें ईंट भट्ठा संचालकों से उचित मजदूरी दिलाई जाएगी। अगर स्थानीय मजदूर, उनके बच्चे या पत्नी गंभीर बीमारी से ग्रसित होते हैं या दुर्घटना में अस्पताल में भर्ती होते हैं तो उन्हें एक सप्ताह का इलाज खर्च देने का प्रावधान है।

-नीरज नयन, उपश्रम आयुक्त

वन नेशन वन राशन कार्ड के तहत किसी भी प्रदेश में काम करने वाले लाभुक स्थानीय जनवितरण प्रणाली की दुकान से राशन प्राप्त कर सकते हैं। जिले के ईंट भट्ठा में दूसरे जिला या प्रदेश से आकर काम कर रहे मजदूरों के पास राशन कार्ड है तो वे अपनी नजदीकी जविप्र की दुकान से राशन प्राप्त कर सकते हैं और जिनका राशन कार्ड घर पर छूट गया है, वे डिजिटल माध्यम से थंब इंप्रेशन लगाकर राशन प्राप्त कर सकते हैं।

-संजीव सिंह, जिला आपूर्ति पदाधिकारी

Hindustan

लेखक के बारे में

Hindustan
हिन्दुस्तान भारत का प्रतिष्ठित समाचार पत्र है। इस पेज पर आप उन खबरों को पढ़ रहे हैं, जिनकी रिपोर्टिंग अखबार के रिपोर्टरों ने की है। और पढ़ें

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।