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5 दिसंबर, 2020|10:39|IST

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स्थितियां बदली पर आज भी स्त्रियां दायित्वों के बोझ से दबी

वर्तमान सदी में सतत स्त्री-संघर्ष व आंदोलनों के फलस्वरूप स्थितियां पहले से बदली हैं, पर आज भी स्त्रियां घर और बाहर के दायित्वों के बोझ से दबी हैं। उसे एक उत्पाद के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। ये बातें आरडीएस कॉलेज में मुख्य वक्ता के रूप में मोतीलाल नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की प्राध्यापिका डॉ. कौशल पवार ने कहीं। शुक्रवार को कॉलेज के हिन्दी व संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘वर्तमान सदी: स्त्री और शृंखला की कड़ियां विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उन्होंने कहा कि मेरी समझ व दृष्टि में स्त्रीवादिता न केवल स्त्री-विमर्श और न पुरुष प्रति-विमर्श वरन समाज-बदलाव का एक सांझा विमर्श है। धर्म व सम्प्रदाय की परिकल्पना तत्कालीन मनुष्य-समाज को भेदभाव रहित और बेहतर बनाने के लिए की गई थी। लेकिन कालांतर में उसमें रूढ़ियां घर कर गयी और समाज स्त्री-पुरुष की बराबरी की बजाय पुरुष वर्चस्ववादी पितृ सत्तात्मक मानस से संचालित होने लगा। विषय-प्रवेश युवा आलोचिका डॉ. सुनीता गुप्ता ने कराया। अध्यक्षता प्राचार्य डॉ. व्यास मिश्रा ने की और विमर्शात्मक संचालन युवा साहित्यकार-प्राध्यापक डॉ. रमेश प्रसाद गुप्ता ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मंजू सिंह ने किया। कार्यक्रम में डॉ. विकास नारायण उपाध्याय, डॉ. अनिता घोष, डॉ. अनिता सिंह, डॉ. श्यामबाबू शर्मा, डॉ. संजय कुमार, डॉ. संजय सुमन, डॉ नीलिमा झा, डॉ. अमिता शर्मा, डॉ. सत्येन्द्र प्रसाद सिंह, डॉ. राकेश कुमार सिंह, डॉ. राम कुमार, डॉ. एमएन रजवी, डॉ. पायोली आदि उपस्थित थे।

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  • Web Title:Stories still on the burden of women obligations