DA Image
हिंदी न्यूज़   ›   बिहार  ›  मुजफ्फरपुर  ›  बच्चों को पढ़ाने को मां-बाप ने की मजदूरी फिर भी नहीं पढ़ पाने की मजबूरी

मुजफ्फरपुरबच्चों को पढ़ाने को मां-बाप ने की मजदूरी फिर भी नहीं पढ़ पाने की मजबूरी

मुजफ्फरपुर। अनामिकाPublished By: Abhishek Kumar
Mon, 01 Jun 2020 11:49 AM
बच्चों को पढ़ाने को मां-बाप ने की मजदूरी फिर भी नहीं पढ़ पाने की मजबूरी

घर के खर्च से लेकर तमाम चीजों में कटौती कर माला और उसके पति ने अपने बच्चों का नामांकन प्राइवेट स्कूल में कराया था। मेहनत-मजदूरी से कमाए रुपये से बच्चों के लिए किताबों का इंतजाम भी कर लिया। मगर इनकी सारी मेहनत तकनीक के सामने फेल हो गई है। प्राइवेट स्कूलों में इनके बच्चों का नामांकन तो है। किताबें भी हैं पर वे पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। मजदूरी करने के बाद भी बच्चों के नहीं पढ़ पाने की मजबूरी अब अभिभावकों को साल रही है।
माला के दो बच्चे माधुरी और कुणाल ही नहीं बल्कि प्राइवेट स्कूलों में नामांकित ऐसे 40-45 फीसदी बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। शहरी क्षेत्र के साथ ही खासकर ग्रामीण क्षेत्र में स्थित प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। इन बच्चों के घरों में स्मार्ट फोन या इंटरनेट का नहीं होना और अभिभावक का तकनीक के बारे में ज्यादा नहीं जानना ऑनलाइन पढ़ाई में बाधक है। लॉकडाउन में अधिकांश प्राइवेट स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई ही चल रही है। इसमें संपन्न परिवार के बच्चे तो शामिल हो रहे हैं मगर उन परिवार के बच्चे नहीं पढ़ पा रहे, जिनके पास साधन का अभाव है।

दो महीने की कक्षा के बाद बच्चों की संख्या कर रही खुलासा
मणिका स्थिम मदर टेरेसा विद्यापीठ में अपने बच्चों को पढ़ाने वाली माला कहती है कि हम ऑनलाइन कक्षा के बारे में क्या जानें। किताब तक की जुगाड़ हो जाती थी। मगर अब यह पढ़ाई हमारे बूते से बाहर है। बोचहां के प्राइवेट स्कूल में अपने तीन बच्चों को पढ़ा रहे सीताराम साह कहते हैं कि एक दुकान में काम करता था। अभी काम बंद है। एक ही फोन है घर में। अलग-अलग काम की तलाश में निकलता हूं। ऐसे में हम अपने बच्चों को मोबाइल पर कैसे पढ़ाएं। कांटी के एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे छठी कक्षा का छात्र मनोज कहता है कि हम स्कूल तो पहुंच जाते थे। मगर ऑनलाइन कक्षा में नहीं पहुंच रहे।

सारे बच्चे नहीं जुड़ पा रहे ऑनलाइन कक्षा से
विभिन्न प्राइवेट स्कूल के निदेशक कहते हैं कि आरटीई के तहत नामांकन से लेकर सामान्य तौर पर भी ऐसे बच्चों की संख्या 50 फीसदी से कम नहीं है। एक कक्षा में अगर 250-300 बच्चे हैं तो इसमें 100-200 बच्चे ऑनलाइन कक्षा से नहीं जुड़ पा रहे हैं। हर स्कूल में ऐसे बच्चों की संख्या अधिक है। लगातार इन बच्चों की अनुपस्थिति पर जब संपर्क में आने वाले कुछ अभिभावकों से बात की गई तो कहा गया कि स्मार्ट फोन, इंटरनेट और इसके बारे में नहीं जानने के कारण ऑनलाइन कक्षा नहीं करा पा रहे हैं।

 

संबंधित खबरें