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28 जनवरी, 2020|6:36|IST

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बड़ी गाड़ियां नहीं बल्कि तांगा और साइकिल से होता था प्रचार

बड़ी गाड़ियां नहीं बल्कि तांगा और साइकिल से होता था प्रचार

तब लोकसभा या विधानसभा चुनाव में न आज की तरह पैसे का बोलबाला था न ही प्रचार में तड़क-भड़क। चुनाव प्रचार बड़ी सादगी से चलता था। सुबह में प्रचार के लिए हमलोग एक जगह जुटते और फिर कौन किस दिशा में निकलेगा इसकी रणनीति तय होती थी। तब न तो बड़ी-बड़ी गाड़ियां होती थी न खर्चीला चुनाव प्रचार। बड़ी पार्टियों के कार्यकर्ता भी साइकिल और तांगे से प्रचार के लिए निकलते थे।

कांग्रेस के टिकट से पूर्वी चंपारण से पांच बार लोकसभा चुनाव जीते विभूति मिश्र के चुनाव प्रचार अभियान को याद करते हुए उनके साथ सक्रिय रहनेवाले पूर्व मंत्री व गांधीवादी नेता ब्रजकिशोर सिंह बताते हैं कि 1977 के लोकसभा चुनाव में विभूति मिश्र के पास केवल एक जीप थी। वह भी कांग्रेस पार्टी की ओर से मिली थी। चुनाव होने के बाद उन्होंने फिर उसको पार्टी को लौटा दिया।

माइक नहीं, भोंपू से होता था संबोधन

गांधीवादी ब्रजकिशोर सिंह के अनुसार उन दिनों घर-घर जाकर प्रचार का प्रचलन नहीं था। प्राय: मठ अथवा स्कूलों में लोगों का जुटान होता। विभूति मिश्र लोगों के बीच बैठकर उनकी बातें सुनते। माइक सहज सुलभ नहीं था, भोंपू से संबोधित किया जाता। प्रत्याशी के चुनाव प्रचार के लिए निकले नेताओं के भोजन के लिए विशेष कुछ सोचने की जरूरत नहीं पड़ती थी। लोग खुद ही आमंत्रित करते और भोजन करवाते।

खर्चीला नहीं था प्रचार, होती थी मुद्दों पर चर्चा

ब्रजकिशोर सिंह के अनुसार उस दौरान मौजूदा दौर की तरह जात-पात और व्यक्तिगत स्वार्थ की बातें नहीं होती थी। लोगों के बीच जाने पर जनसरोकार के मुद्दे उठते। उनपर चर्चा होती और समाधान के उपाय तलाशे जाते। चुनाव प्रचार की शैली ऐसी थी कि किसी भी पार्टी के उम्मीदवार को अधिक खर्च नहीं होता था। ब्रजकिशोर सिंह ने खुद के 1980 के विधानसभा चुनाव का स्मरण करते हुए बताया कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए पार्टी की ओर से 30 हजार रुपये मिले थे। अपने समर्थकों के साथ जब चुनाव प्रचार शुरू किया और अंत में खर्चे का ब्योरा जुटाया तो पता चला कि पूरे प्रचार के दौरान मात्र 27 हजार ही खर्च हो पाए। इसके बाद शेष तीन हजार पार्टी को लौटा दिए।

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  • Web Title:No big cars but copper and bicycle was promoted