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स्कूल में समस्या की भरमार, हेडमास्टर बनने के बाद भी नहीं मिला वित्तीय प्रभार

स्कूल में समस्या की भरमार, हेडमास्टर बनने के बाद भी नहीं मिला वित्तीय प्रभार

संक्षेप:

मुजफ्फरपुर में नए हेडमास्टरों को स्कूलों में योगदान देने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कई स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, जैसे कि बेंच-डेस्क और कक्षाएं। वित्तीय अनियमितता और...

Aug 13, 2025 06:51 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर
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मुजफ्फरपुर। बीपीएससी से बहाल हेडमास्टर मन में यह जज्बा लेकर स्कूलों में योगदान दिए कि कुछ नया करेंगे। लेकिन, कहीं टूटे कमरे तो कहीं बेंच-डेस्क नदारद। स्कूल का न खाता है और न बही। न वित्तीय प्रभार मिल रहा है और न किसी तरह का अधिकार। ऐसे में हेडमास्टर बनने की खुशी की जगह पीड़ा और डर ने ले लिया है। जिले में दर्जनभर हेडमास्टरों ने अब तक इस भय से योगदान नहीं दिया है। महिला प्रधानाध्यापकों की संख्या इनमें अधिक है। इनका कहना है कि हाईस्कूलों में किसी तरह के अभिलेख का संधारण नहीं है। हम किस कागजात के बारे में क्या बताएंगे? स्थिति यह है कि स्कूल के बाद हर दिन हेडमास्टर शिक्षा कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं।

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वे इन समस्याओं का समाधान चाहते हैं। जिले में लंबे समय से अपग्रेड प्लस 2 स्कूलों में नियमित हेडमास्टर नहीं थे। मिडिल स्कूल के हेडमास्टर के जिम्मे ही प्लस 2 स्कूल भी चल रहे थे। अभी बीपीएससी से परीक्षा के बाद जिले के 200 से अधिक अपग्रेड प्लस 2 स्कूलों में हेडमास्टर की नियुक्ति की गई है। इस नियुक्ति के बाद जहां एक ओर प्रभार को लेकर घमासान मचा है, वहीं इन स्कूलों में वित्तीय अनियमितता से लेकर संसाधनों के अभाव और स्कूल की दुर्दशा का भी खुलासा हुआ है। नए हेडमास्टर इन चुनौतियों से जूझ रहे हैं। अपग्रेड प्लस 2 स्कूलों में नवनियुक्त हेडमास्टर ने वहां की बदहाल व्यवस्था को लेकर कहा कि अधिकतर स्कूलों में अलग से हाईस्कूल का खाता ही नहीं है। दर्जनों स्कूलों में प्रभार नहीं लेने को लेकर डर का माहौल बनाया गया है, जिसकी वजह से योगदान देने के बाद भी 50 फीसदी से अधिक हेडमास्टर ने अब तक प्रभार नहीं लिया है। जिले में अब भी कई हेडमास्टर ऐसे हैं, जिन्होंने योगदान ही नहीं लिया है। जिन अपग्रेड प्लस स्कूलों में हेडमास्टर नियुक्त हुए हैं, वे स्कूल 5 से 10 साल पुराने हैं। मगर हाल यह है कि इन स्कूलों में बैठने तक की व्यवस्था नहीं है। अन्य सुविधाएं तो बहुद दूर की बात है।

हेडमास्टर मनीष कुमार, मनोरंजन कुमार, पवन, रितेश कुमार, रीमा कुमारी, सुनील कुमार, मुरारी, संजीव कुमार, उषा कुमारी, सुजीत कुमार समेत अन्य हेडमास्टरों ने कहा कि जब स्कूल में प्रभार के लिए पहुंचे तो पता चला कि कोई कोष ही नहीं है तो प्रभार किसका लिया जाए। सालों से मिडिल स्कूल के खाते से ही प्लस 2 स्कूल का संचालन करवाया जा रहा है। जब भी हमलोग किसी तरह के कोष या कागजात के बारे में पूछते हैं तो कहा जाता है कि सब खर्च किया गया है। कहां खर्च किया गया, हिसाब कहां है, इस पर कोई जवाब नहीं है। प्रधानाध्यापकों ने कहा कि अगर हमें प्रभार मिलता है तो अगला- पिछला सारा हिसाब तो हम से ही पूछा जाएगा। ऐसे में इस अनियमितता की जवाबदेही कौन लेगा। प्रधानाध्यापकों ने कहा कि हाईस्कूलों में किसी तरह के अभिलेख का संधारण नहीं है। हम किस कागजात के बारे में क्या बताएंगे। जब हमलोग पूछते हैं तो कहा जाता है कि इस पचड़े में मत पड़िए। यही नहीं, कई जगह ग्रामीणों द्वारा धमकाया भी जा रहा है। प्रधानाध्यापकों ने बताया कि अधिकतर स्कूलों में वर्ग कक्ष का अभाव है। प्लस 2 के लिए कई जगह महज दो-तीन कमरे मिले हुए हैं। ऐसे में जब बच्चों की संख्या 50 फीसदी से भी ऊपर जाती है तो बैठने की दिक्कत होती है।

उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय श्यामपुर कांटी की प्रधानाध्यापिका खुशबू कुमारी कहती हैं कि स्कूल में किसी तरह का वित्तीय संधारण नहीं है। बच्चों से जो राशि ली गई, उसका कोई कोष नहीं बनाया गया है। जब पूछा जाता है तो कहा जाता है कि खर्च कर दिया गया। इसका कोई रिकार्ड स्कूल में नहीं है। हमलोग क्या करें। अधिकारियों के पास जाते हैं तो भी कोई समाधान नहीं हो पाता है। स्कूल में कम्प्यूटर सेट भी नहीं है। पूछने पर कहा गया कि पहले जो प्रभारी थे, वे लेकर चले गए। जिले के विभिन्न विद्यालयों में दर्जनभर से अधिक हेडमास्टरों ने डर से अभी तक योगदान नहीं दिया है। इनमें महिला प्रधानाध्यापकों की संख्या अधिक है। अलग-अलग प्रखंडों में ऐसे भी हेडमास्टर हैं, जो योगदान देने के बाद भी पीछे हट रहे हैं। गायघाट दहिला की प्रधानाध्यापिका कंचन प्रभा कहती हैं कि स्कूल में आए दिन जनप्रतिनिधि आकर दबाव बनाते हैं। ग्रामीणों के सहयोग से बच्चों को भगा दिया जाता है और फिर स्कूल में आकर हल्ला करते हैं कि बच्चे कहां गए। हर पत्र हमसे मांगा जाता है। डर का माहौल है। हर बात में कहा जाता है कि आप सम्मान नहीं दे रही हैं। सोनवर्षा डीह की प्रधानाध्यापिका कुमारी मनीषा ने बताया कि न प्रभार दिया जा रहा है और न कोई जानकारी दी जा रही है। फाइलिंग से लेकर अन्य कामों में अपना पैसा लगाना पड़ रहा है। ऐसे में परेशानी बढ़ गई है। इसका समाधान किया जाना बहुत जरूरी है।

चार सौ बच्चों के लिए 20 बेंच-डेस्क बैठने के लिए आपस में करते झगड़ा :

प्रधानाध्यापक मंजूषी ने बताया कि प्लस 2 स्कूलों में आधारभूत संरचना का अभाव है। मैं गवसरा प्लस स्कूल में हूं। यहां 400 बच्चे हैं, मगर बेंच-डेस्क महज 20 ही हैं। ऐसे में किस बच्चे को हम बिठाएं और किसे खड़ा करें। स्थिति यह है कि जिन बच्चों को बेंच-डेस्क पर बैठने की जगह नहीं मिलती, वे घर वापस चले जाते हैं। कमरों की स्थिति भी ठीक नहीं है। स्मार्ट रूम में भी बेंच-डेस्क नहीं है। उच्च माध्यमिक विद्यालय सबहा के प्रधानाध्यापक मनोरंजन कुमार ने बताया कि स्कूल में एक भी बेंच-डेस्क नहीं है। न ही शिक्षकों के लिए कुर्सी-टेबुल है। 300 से अधिक बच्चे नामांकित हैं। किस-किस चीज को हमलोग दुरुस्त करेंगे। प्रधानाध्यापकों ने कहा कि यह हाल तब है, जब करोड़ों रुपए उपस्कर पर खर्च किए गए।

छह कमरों में 12 कक्षाएं :

उच्च माध्यमिक विद्यालय गिजास की प्रधानाध्यापिका डॉ. शालिनी सिंह कहती हैं कि हमारा स्कूल एक से 12 तक है और कुल मिलाकर कमरे महज छह हैं। किसी भी तरह से बिठाने की जुगत भिड़ाई जाए तो इन कमरों में बच्चे नहीं बैठ पाते हैं। हमें कोई समाधान नहीं सूझ रहा कि किस तरह बच्चों की कक्षा चलाई जाए। ऐसे में हमने अधिकारी से मांग की है कि स्कूल को दो शिफ्ट में चलाने की अनुमति दी जाए, ताकि सभी बच्चे पढ़ाई कर सकें। स्कूल में प्लस 2 में 572 बच्चे हैं, जिनके बैठने के लिए तीन कमरे हैं। अभी तक वित्तीय प्रभार भी नहीं दिया गया है।

बोले जिम्मेदार :

सभी बीईओ व वर्तमान प्रभारियों को प्रभार देने का निर्देश दिया गया था। किसी भी तरह का प्रभार अगर मिडिल स्कूल में रखा जाता है तो आगे की सारी कार्रवाई के लिए वे जवाबदेह होंगे। अपग्रेड प्लस 2 स्कूलों में संसाधन की जो कमी है, उसे लेकर जांच करवाई जा रही है। किसी स्कूल में उपस्कर अब तक क्यों नहीं है, इस पर बीईओ से जवाब मांगा जा रहा है।

-कुमार अरविन्द सिन्हा, डीईओ