स्पर्श चिकित्सा को मिले सरकारी, सहयोग तो बिना दवा के दूर हों रोग
मुजफ्फरपुर में न्युरोथेरी, एक्युप्रेशर और फिजियोथेरेपी जैसी चिकित्सा पद्धतियों को सरकार से अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि इन विधाओं से इलाज सस्ता और बिना दवा के किया जा सकता है। युवा इस क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं, लेकिन प्रशिक्षण और प्रोत्साहन की कमी है।
मुजफ्फरपुर। बिना दवा के रोगमुक्त करने वालीं चिकित्सा पद्धतियां और इनसे जुड़े चिकित्सकों को वह मुकाम नहीं मिल पा रहा है, जो अन्य चिकित्सा पद्धतियों ने आज सरकार के सहयोग से हासिल किया है। प्रोत्साहन और प्रचार- प्रसार के अभाव में ये पिछड़ रही हैं। न्युरोथेरेपी, एक्युप्रेशर और फिजियोथेरेपी जैसी चिकित्सा पद्धतियों से लोगों का इलाज करने वाले शहर के चिकित्सकों में सरकारी उदासीनता से गहरी निराशा है। इनका कहना है कि शहर में आज इन विधाओं के गिने-चुने डॉक्टर हैं। सरकारी अस्पतालों में वर्षों से बहाली नहीं हुई है। युवा पीढ़ी इस क्षेत्र में कॅरियर बनाना चाहती है, लेकिन उनके प्रोत्साहन और प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है।
इन चिकित्सकों को एक ऐसे ‘स्पर्श’ की जरूरत है, जिससे इनका कायाकल्प हो सके। मुजफ्फरपुर जिले में एलोपैथ, होमियोपैथ, आयुर्वेद जैसी चिकित्सा पद्दतियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। सरकार भी इनके विकास के प्रति गंभीर है और खर्च भी कर रही है, मगर न्युरोथेरेपी, एक्युप्रेशर और फिजियोथेरेपी जैसी चिकित्सा पद्धतियों के प्रति अब भी उदासीनता है,जिसके कारण मरीज आज इन सरल, सहज और सस्ती चिकित्सा पद्धतियों से दूर हैं। स्पर्श चिकित्सा की इस विधा से जुड़े शहर के डॉक्टरों का कहना है कि इन पद्धतियों से कम खर्च और बिना दवा के लोग रोगमुक्त हो जाते हैं। आज इन चिकित्सा पद्धतियों को सरकार की ओर से अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। यही कारण है कि शहर में न्युरोथेरेपी, एक्युप्रेशर और फिजियोथेरेपी के गिने-चुने चिकित्सक ही हैं। बताया कि शहर में डिग्री प्राप्त ऐसे चिकित्सक 50 के करीब होंगे, वहीं अनुभव के आधार पर प्रैक्टिस करने वालों की संख्या दो सौ के करीब होगी। न्युरोथेरेपी, एक्युप्रेशर और फिजियोथेरेपी से जुड़े शहर के डॉक्टरों का कहना है कि इन तीनों चिकित्सा पद्धतियों को बहुत कम लोग जान पा रहे हैं।
शहर के न्युरोथेरेपी चिकित्सक डॉ. बिपिन कुमार पाठक ने बताया कि शरीर की जो नस कमजोर हो जाती है, उसे इस पैथ से दुरुस्त किया जाता है और पुन: मरीज पहले जैसा स्वस्थ हो जाता है। यह पद्धति असाध्य बीमारियों के लिए वरदान साबित होती है। कहा कि जिले में न्युरोथेरेपी चिकित्सक काफी कम संख्या में हैं। बताया कि युवाओं में इस पद्धति को सीखने के प्रति रुचि बढ़ना शुभ संकेत है। शहर में करीब 100 युवा इस चिकित्सा पद्धति का प्रशिक्षण ले रहे हैं और प्रैक्टिस भी करने लगे हैं। युवाओं को नि:शुल्क इसकी शिक्षा दी जाती है। बताया कि हमारा शरीर अपने आप में दवाखाना है। नस के सहयोग से शरीर के विभिन्न प्रकार के विकार, दर्द आदि से मुक्त हो सकता है। सरकार को इसके लिए कुशल प्रशिक्षक और जिले में प्रशिक्षण स्थल की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि लोगों को प्रत्येक बीमारी पर दवा खाने की लत से मुक्ति मिले। रोजगार के दृष्टिकोण से भी ये युवा पीढ़ी के लिए मददगार साबित होंगी। शहर की न्युरोथेरेपिस्ट डॉ. नायडू पाठक ने बताया कि महिलाओं के लिए यह चिकित्सा पद्धति वरदान से कम नहीं है। बिना दवा के सैकड़ों महिलाएं रोगमुक्त हुई हैं। महिलाओं को इसके प्रति लगातार जागरूक भी कर रही हूं। महिलाएं आज तरह-तरह के रोगों से ग्रसित हो रही हैं और उनका इलाज सही से नहीं हो पाता है। इस चिकित्सा पद्धति के जरिये उन्हें दिनचर्या और खानपान के प्रति सजग किया जा रहा है। हमारी अपेक्षा है कि सरकार इस पद्धति को बढ़ावा दे और सभी अस्पतालों में न्युरोथेरेपिस्ट की नियुक्ति करे। खास तौर पर महिलाओं और युवतियों को इस चिकित्सा पद्धति के प्रशिक्षण की आवश्यकता है, ताकि घर-घर में इसकी लोकप्रियता बढ़े।
एक्युप्रेशर चिकित्सक राधारमण झा ने बताया कि इस चिकित्सा पद्धति के डॉक्टरों की बहाली के लिए लंबे समय से सरकार से मांग की जा रही है। अगर सरकार इस चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा दे तो बिना दवा के गंभीर बीमारियों का इलाज भी किया जा सकता है। सिर्फ नसों को दबाकर और शरीर के विभिन्न हिस्सों के प्वाइंट पर रंग लगाकर इलाज किया जाता है, जिसमें दवा की जरूरत नहीं है। इस चिकित्सा पद्धति से लोगों के लाखों रुपये खर्च होने से बच सकेंगे। सरकार इस चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा दे और अस्पतालों में इसे अनिवार्य करे। फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. शाहरुख फिरोज ने बताया कि पिछले 10 वर्षों से राज्य सरकार ने फिजियोथेरेपिस्ट की बहाली नहीं की है, जिसके कारण शहर में इन चिकित्सकों की संख्या कम है। शहर में वर्तमान में डिग्री प्राप्त चिकित्सक 50 के करीब होंगे। सरकार इस चिकित्सा पद्धति को आगे बढ़ाना चाहती है तो चिकित्सकों की संख्या बढ़ानी होगी और शहर से लेकर गांव के अस्पतालों में प्रतिनियुक्त करनी होगी। इससे न सिर्फ लोग रोगमुक्त होंगे, बल्कि अकारण दवा खाने की लत से भी छुटकारा मिलेगी।
बोले जिम्मेदार
वैदिक विज्ञान पद्धति अन्तर्गत न्युरोथेरेपी को मान्यता प्रदान के संबंध में वरीय उप समाहर्ता जिला विकास प्रशाखा के पत्र के माध्यम से न्युरोथेरेपिस्ट का आवेदन कार्यालय को प्राप्त हुआ है। आवेदनकर्ता द्वारा आवेदन पत्र में वैदिक विज्ञान पद्धति अन्तगर्त न्युरोथेरेपी चिकत्सा को मान्यता प्रदान करने के लिए अनुरोध किया गया है। इसकी अग्रेतर कार्रवाई के लिए अवर सचिव स्वास्थ्य विभाग को भेजा गया है।
डॉ. अजय कुमार, सिविल सर्जन मुजफ्फरपुर

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