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नदियों पर संकट से बिगड़ रहा पर्यावरण, स्वास्थ्य पर भी प्रभाव

नदियों पर संकट से बिगड़ रहा पर्यावरण, स्वास्थ्य पर भी प्रभाव

संक्षेप:

मुजफ्फरपुर जिले में नदियों के सूखने से कई मछलियों की प्रजातियां समाप्त हो गई हैं। बूढ़ी गंडक का पानी प्रदूषित होने से मछली पालन में कमी आई है, जिससे किसान नए बाग लगाने में असमर्थ हैं। लीची और आम के उत्पादन में करीब 35 प्रतिशत की कमी आई है। जल स्तर में गिरावट और खनन इसके मुख्य कारण हैं।

Jan 07, 2026 06:12 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर
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मुजफ्फरपुर, अजय कुमार पांडेय। कलकल बहती नदियों के कारण कई बेहतरीन मछलियों और आम-लीची की कई किस्मों के लिए मुजफ्फरपुर जिला प्रसिद्ध था। लेकिन, बदलते समय के साथ वर्षाजल की कमी से नदियों पर संकट और जलाशयों के मृत होते जाने के कारण कई जलीय जंतु और पौधे अपना अस्तित्व खो चुके हैं या फिर समाप्ति के कगार पर हैं। इनमें गंडक में पाई जानेवाली एक दर्जन तो बूढ़ी गंडक की डेढ़ दर्जन मछलियों की प्रजातियां पूरी तरह से समाप्त हो चुकी हैं। वहीं, भूजल स्तर नीचे जाने से लीची के बगानों की संख्या के साथ ही क्षेत्रफल भी सिकुड़ता जा रहा है।

राजेन्द्र केंद्रीय कृषि विवि, पूसा के मत्स्य विभाग ने अपने शोध मे पाया कि बूढ़ी गंडक का पानी प्रदूषित होने से इसमें पाई जानेवाली कई महत्वपूर्ण मछलियों की प्रजातियां खत्म हो चुकी हैं। वहीं, कछुआ, सीप और अन्य जलीय जीवों के अस्तित्व पर भी संकट है। पांच पीढ़ियों से मछली पालन से जुड़े कोठिया के रामेशवर सहनी कहते हैं कि कभी बूढ़ी गंडक में रोहू, बरारी, गरई, पटेया, मुसहा और झींगा की कई प्रजातियां भरपूर मिलती थी। पिछले दो दशक में इनका नामोनिशान मिट गया है। पहले दो से तीन घंटे में नदी से 30 से 40 किलो मछली पकड़ लेते थे। अब 15 से 20 किलो मछली मिलना भी मुश्किल है। उद्यान रत्न किसान भोला नाथ झा कहते हैं कि नदियों का अस्तित्व समाप्त होने का असर शाही लीची की बागवानी पर भी पड़ा है। भूजल स्तर नीचे जाने से पौधों के रखरखाव में अधिक खर्च और मुनाफा कम होने से किसान नये बाग नहीं लगा रहे। कई पुराने बाग भी कट गए। लीची और आम उत्पादन का क्षेत्रफल करीब 35 प्रतिशत तक कम हो गया है। अंधाधुंध खनन, गंदे पानी से भर रही गाद: बूढ़ी गंडक पर कई शोध पत्र प्रकाशित कर चुके सेवानिवृत्त शिक्षक देवीलाल यादव इसका कारण नदी का छिछला होना बताते हैं। वे कहते है कि अंधाधुंध बालू खनन के साथ शहरों का गंदा पानी नदी में बहाया जा रहा है। इससे गाद जमा हो रही है। गाद के कारण जलकुंभी जैसे खर पतवार पानी से ऑक्सीजन सोख लेते हैं। वे कहते हैं कि बूढ़ी गंडक के साथ गंडक में भी यही स्थिति है। कभी गंडक में 90 किस्म की तो बूढ़ी गंडक में 81 किस्म की मछलियां पाई जाती थी। लेकिन, कृषि विवि के नवीनतम शोध में इनकी संख्या घटकर क्रमश: 80 और 73 रह गई हैं। स्थानीय टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार बूढ़ी गंडक और बागमती नदी के पानी में आर्सेनिक का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। इस कारण उतर बिहार में तेजी से कैंसर जैसी बीमारी का फैलाव हो रहा है। इसके अलावा चर्म रोग संबंधी बीमारों की संख्या में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है।

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