चार पीढ़ियों से रह रहे फिर भी बेगाने किनके पास जाएं फरियाद सुनाने
मुजफ्फरपुर की गन्नीपुर रिफ्यूजी कॉलोनी में चार पीढ़ियों से रह रहे लोग जमीन के मालिकाना हक की कमी के कारण नागरिक सुविधाओं से वंचित हैं। विभाजन के बाद यहां बसे परिवारों को भू-स्वामित्व नहीं मिला, जिससे वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। स्थानीय प्रशासन से समाधान की मांग की जा रही है।
मुजफ्फरपुर। शहर की गन्नीपुर रिफ्यूजी कॉलोनी में चार पीढ़ियों से रह रहे लोग आज भी बेगाने हैं। जमीन का मालिकाना हक नहीं होना नागरिक सुविधाओं की राह का रोड़ा बन रही है। यहां के बुजुर्गों ने बताया कि देश बंटवारे के बाद बंगाल का भी विभाजन हो गया। पूर्वी पाकिस्तान के पाकिस्तान के हिस्से में चले जाने के बाद वहां से हिन्दुओं का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। अपना घर, जमीन-जायदाद से बेदखल लोग पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के प्रदेशों में तो बसे ही, बिहार में जगह-जगह या तो वे खुद आकर बसे या सरकार ने रिफ्यूजी कैंपों की स्थापना कर उनमें उनको बसाने की कोशिश की।
इस क्रम में गन्नीपुर में रेलवे की जमीन पर 1956 में 35 परिवारों को बसाया गया। बताया कि हमारे पूर्वजों को एक कट्ठा जमीन और एक घर बनाकर दिया गया था, पर आज तक इस जमीन का पट्टा हमारे नाम पर नहीं किया जा सका है, जबकि हमारी ही तरह बसाए गए पंजाबी समुदाय को आज भूमि का मालिकाना हक प्राप्त है। जमीन सरकार के नाम होने के कारण हम किसी भी सुविधा का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। हमारी समस्या का समाधान हो। गन्नीपुर रिफ्यूजी कॉलोनी में रहने वाले लोगों ने बताया कि जमीन का मालिकाना हम नहीं होने के कारण कई नीतिगत समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। न तो निवास प्रमाणपत्र बन पा रहा है और न सरकार की अन्य किसी भी सुविधाओं के लिए बनने वाली सूची में ही अपना नाम दर्ज करा पा रहे हैं, जबकि हमसे कई परिवार ऐसे हैं, जिनको अपनी सैकड़ों एकड़ जमीन छोड़ विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। आरोप लगाया कि विभाजन का दंश जितना पंजाबियों ने झेला, उससे कम दुश्विारियां पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के इलाकों से आए बंगाली परिवारों की भी नहीं रही है, लेकिन पुनर्वास के मामले में आज भी सरकार और अन्य सरकारी एजेंसियां उनके प्रति दोयम दर्जे का व्यवहार कर रही हैं। इनका कहना है कि एक ही इलाके में पंजाब और बंगाल से विस्थापित हुए लोगों को बसाया गया। इस दौरान सरकार की ओर से दी गई जमीन का मालिकाना हक तो पंजाबी परिवारों को तो दे दिया गया, लेकिन हमें आज भी बस कागज का एक टुकड़ा दे दिया गया है, जिसपर आज भी भारतीय रेलवे या भारत सरकार का ही मालिकाना हक दिखाया जा रहा है, जबकि पंजाबी परिवारों को कई दशक पहले ही जमीन का मालिकाना हक मिल चुका है। जमीन उनके नाम पर स्थानांतरित की जा चुकी है। ऐसे में उनकी एक स्पष्ट पहचान बन चुकी है। वे रिफ्यूजी की जगह अब पंजाबी कौम के तौर पर पहचाने जा रहे हैं। लेकिन, हमारी पहचान आज भी रिफ्यूजी तक ही सीमित हो कर रह गई है।
रिफ्यूजी कॉलोनी के सुनील चंद्र साहा, अमल कर्मकार, कार्तिक कुमार साहा और विचित्रा देवी ने बताया कि उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी यहां रह रही है, लेकिन आज भी जमीन के मिले पट्टे हमारे पूर्वज या हमारे नाम पर नहीं किए जा सके हैं, इस कारण कई तरह की कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जमीन हमारे नाम पर नहीं होने के कारण जब भी हम सरकार से मिले घर की मरम्मत कराने का प्रयास करते हैं, तो नगर निगम के अधिकारी और कर्मचारी आकर इसे रोक देते हैं। वे दलील देते हैं कि जमीन हमारे नाम पर नहीं है। 1980 के दशक तक तो सब ठीक था। जर्जर पुराने घर को किसी तरह मरम्मत कराकर रहने लायक बना लिया, लेकिन 1990 के बाद से स्थिति तेजी से बदली। यह इलाका तेजी से विकसित होने लगा और इसके साथ ही भू- माफियाओं की नजर इस इलाके पर पड़ने लगी। वे इस जमीन खाली करने का दबाव बनाने लगे। उनकी बात नहीं मानने पर कई तरह से प्रताड़ित भी किया जाने लगा। आरोप लगाया कि बाद में इस खेल में नगर निगम के अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल हो गए। हमें समझ नहीं आता है कि अब हम क्या करें। बंटवारे के समय हमारे पूर्वज अपनी अच्छी-खासी संपत्ति वहां छोड़ कर आ गए। यहां आने पर उसके एवज में महज एक कट्ठा जमीन और एक घर मिला। ऐसे में हमारे सामने विकट स्थित बनी हुई है।
राम विलास साहा, लक्ष्मी देवी, हरिपद चक्रवर्ती, दीपक भट्टाचार्य ने बताया कि उनके पूर्वज 1947 में ही पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से बिहार आ चुके थे। उस समय इनको चम्पारण के कुमारबाग के पास बने अस्थायी शिविर में ठहराया गया था। फिर मुजफ्फरपुर के गन्नीपुर में रेलवे की जमीन खरीदकर भारत सरकार ने बसाया, लेकिन बिहार सरकार की शिथिलता से जमीन का स्थानांतरण उनके पूर्वजों के नाम पर नहीं हो सका। बाद में इसका पता चलने पर कई बार प्रयास किया गया। लेकिन, नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। अब जमीन का स्थानांतरण हमारे नाम पर नहीं होने के कारण बैंक वाले हमें लोन नहीं देते हैं। इस कारण चाहकर भी हम अपनी आजीविका के लिए पूंजी का प्रबंध नहीं कर पा रहे हैं। कागज का थैला और अन्य छोटे-मोटे काम कर अपना गुजारा करना मजबूरी बन चुकी है। बैंक से लोन मिल जाता तो कुछ और व्यवसाय करने के बारे में सोच सकते थे। महाजन भी हमारी स्थिति देखते हुए पूंजी देने से कतराते हैं। इसलिए सरकार जल्द से जल्द जमीन का मालिकाना हक हमें दिलाने की दिशा में प्रयास करे।
रिफ्यूजी कॉलोनी के सुधीर चक्रवर्ती, कालीदास पाल, अमरनाथ सिन्हा और संजय कुमार सिकदार का कहना है कि जमीन का स्वामित्व हमारे नाम पर नहीं होने के कारण नगर निगम प्रशासन हमारे घरों में पानी का कनेक्शन देने से कतराता है। हमें आसपास लगे सार्वजनिक नलों से पीने और अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पानी का प्रबंध करना पड़ता है। इसके अलावा बिजली विभाग के नये नियमों के अनुसार अब बिजली कनेक्शन देने मे आनाकानी करते हैं। बिजली कनेक्शन के लिए उनकी अनुचित मांगों को पूरा करना हमारी मजबूरी बन गई है। प्रदीप सिकदार, रोहित सिकदार, छायारानी पाल और प्रगति देवी ने बताया कि जमीन को लेकर जो कागज पूवर्जों को सौंपे गए हैं, उस जमीन का स्वामी वाले खाने में अभी भी भारतीय रेलवे और भारत सरकार का नाम दर्ज है। इसका दाखिल-खारिज कराने जाने पर सीओ नियमों का हवाला देते हुए दाखिल-खारिज करने से मना कर देते हैं, जबकि पंजाबी लोगों को मिली जमीन का दाखिल-खारिज उनके नाम पर सालों पहले ही हो चुका है। जब एक ही नियम के तहत उनको और हमको बसाया गया तो यह दोहरापन क्यों? इसमें सुधार किया जाना चाहिए, ताकि हम भी अपने नाम पर जमीन का दाखिल-खारिज करा सकें और सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकें।
बोले जिम्मेदार
काफी पुराना मामला होने के कारण इसके तकनीकी पहलू पर विचार करना होगा। किन कारणों से उनकी जमीन का दाखिल-खारिज उनके नाम पर नहीं हो पाया, इसका पता लगाकर कुछ किया जा सकता है। प्रभावित परिवारों की तरफ से किसी भी तरह का आवेदन मिलने पर संबंधित विभाग और अधिकारी से इसकी जांच कराकर रिपोर्ट मांगी जाएगी। निश्चित तौर पर उनको राहत देने के उपाय किए जाएंगे।
सुब्रत कुमार सेन, डीएम, मुजफ्फरपुर
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