प्रोसेसिंग के लिए नहीं मिल पा रही बी-ग्रेड लीची
फोटो: - लीची पल्प और रसगुल्ला बनाने में हो रही मुश्किल - समस्तीपुर, मोतिहारी से

मुजफ्फरपुर, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। जिले की प्रोसेसिंग यूनिट के संचालकों को इस बार बी-ग्रेड लीची भी नहीं मिल पा रही है। इस कारण उन्हें लीची का पल्प और रसगुल्ला बनाने में मुश्किल हो रही है। कारोबार बंद नहीं हो, इसके लिए वे दूसरे जिले से बी-ग्रेड लीची मंगा रहे हैं। इससे उनका लागत खर्च बढ़ रहा है। संचालकों को बी-ग्रेड लीची के लिए पिछले साल से 20 से 25 रुपये प्रतिकिलो अधिक खर्च करना पड़ रहा है।
लीची की पैदावार में कमी
बेला की एक प्रोसेसिंग यूनिट के संचालक राजेश कुमार व अमित कुमार ने बताया कि इस बार लीची की पैदावार में 75 फीसदी तक कमी आई है। इससे पल्प और रसगुल्ला तैयार करने में परेशानी हो रही है। बताया कि बीते वर्ष 40-45 रुपये प्रतिकिलो मिली बी-ग्रेड लीची इस बार 60 से 70 रुपये किलो दूसरे जिलों से मंगानी पड़ रही है।
ऑर्डर पूरा करना हो रहा मुश्किल
उन्होंने बताया कि बड़ी कंपनियों का ऑर्डर पूरा करना मुश्किल हो रहा है। कहा कि पिछले वर्ष 200 टन लीची का रसगुल्ला और 100 टन पल्प तैयार हुआ था। इसबार 100 टन रसगुल्ला और 60 टन पल्प मुश्किल से तैयार हो पाएगा। संचालक राजेश कुमार ने बताया कि बीते वर्ष पल्प का कीमत कंपनियां 45-50 रुपये किलो लगा रही थी, मगर इस बार 70 रुपये से कम में बेचने पर नुकसान होगा।
मजदूरों को नहीं मिल रहा काम
लीची प्रसोसिंग यूनिट में एक माह तक मजदूरों को काम मिलता है। इसमें 75 फीसदी महिलाएं होती है। बेला की प्रोसेसिंग यूनिट संचालक केपी ठाकुर ने बताया कि लीची की पैदावार कम होने से मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है। कहा कि एक हजार लीची की छिलाई पर 250 रुपये दिए जाते हैं। बीते साल एक महिला मजदूर 2000-3000 तक लीची की छिलाई करती थी। इस बार उन्हें छिलाई के लिए एक हजार लीची भी नहीं मिल पा रही है।
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