प्रतिबंधित प्लास्टिक थैले से पटे बाजार कागज के ठोंगे को बढ़ावे की दरकार
मुजफ्फरपुर में प्लास्टिक थैलियों पर प्रतिबंध के बावजूद उनका उपयोग बढ़ रहा है, जिससे कागज की थैलियों का कारोबार खत्म हो रहा है। प्रशासनिक लापरवाही और कच्चे माल की उच्च कीमतों के कारण कारीगरों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है।
मुजफ्फरपुर, अजय कुमार पांडेय।
प्रतिबंध के बावजूद बाजार पर कब्जा जमाए प्लास्टिक की थैलियां कागज के ठोंगे को ठेंगा दिखा रही हैं। प्रशासनिक लापरवाही के कारण शहर में प्रतिबंध बेअसर है। कागज की थैलियों के उत्पादन में कमी आने से कई परिवारों की रोजी-रोटी छिन गई है। इस कारोबार से जुड़े लोगों ने बताया कि मुजफ्फरपुर में करीब दो दशक पहले तक कागज की थैलियों का बड़ा कारोबार था। इसे बनाने से लेकर बाजार तक पहुंचाने में हजारों लोगों को रोजगार मिला हुआ था। शहर के गन्नीपुर स्थित रिफ्यूजी कॉलोनी में बसे बंगाली परिवारों के अलावा पक्की सराय, जेल चौक, रामबाग इलाके में बड़ी संख्या में लोग इस कारोबार से जुड़े हुए थे।
इन घरों के चूल्हे इसी कारोबार से जला करते थे, लेकिन आज व्यवसाय ठप है। प्रशासन प्लास्टिक की थैलियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हुए कागज के ठोंगे को प्रोत्साहन दे तो इसमें नई जान आ सके। शहर में प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बावजूद इनके बढ़ते उपयोग ने कागज की थैलियों का कारोबार लगभग खत्म कर दिया है। प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही और नियमों का सही से अनुपालन सुनिश्चित नहीं होने के कारण प्लास्टिक की थैलियों का कारोबार रुक नहीं रहा है। इससे कागज की थैलियों की मांग पर बुरा असर पड़ रहा है। कागज के ठोंगे (बैग/लिफाफे) बनाने वाले कारीगरों ने बताया कि वे कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। छोटे उत्पादक मुख्य रूप से कच्चे माल की उच्च लागत, सीमित उपलब्धता, नमी से कागज के खराब होने और जूट/कपड़े के विकल्प जैसी चुनौतियों के आगे टिक नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा कारोबार खड़ा करने के लिए पूंजी का अभाव, सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिलना, साथ ही तैयार माल की खपत में कमी ने इस व्यापार को लगभग पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी हरिपद चक्रवती, राम विलास साह, प्रगति देवी और चंदा देवी सहित 45 परिवारों के मुखिया आजादी के बाद पूर्वी बंगाल से आकर चार पुश्त पहले बसे थे। उनके पास कोई काम नहीं था तो कागज की थैलियां बनानी सीखी, जो आज तक इनके परिवार का मुख्य पेशा बना हुआ है। हरिपद कहते हैं कि तब और अब में काफी फर्क आया है। पहले हर काम के लिए लोग कागज के थैलों को खोजते थे। तब काम बढ़िया चलता था और आमदनी भी ठीकठाक हो जाती थी, लेकिन पिछले 20-25 वर्षों में तेजी से बदलाव आया। एक तो प्लास्टिक के थैलों की भरमार तो दूसरी ओर कच्चे माल की अनिश्चितता और बढ़ती कीमत से परेशानी बढ़ती जा रही है। कागज की लगातार मांग और सीमित संसाधनों के कारण गुणवत्तापूर्ण कागज की उपलब्धता और लागत में वृद्धि बड़ी चुनौती है। कागज, गोंद और अन्य कच्चे माल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव होता रहता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है। वीणा देवी, शांति देवी, ब्यूटी कुमारी, आरती चक्रवर्ती और विचित्रा देवी कहती हैं कि उनके पास इस पेशे में निवेश करने के लायक पूंजी का घोर अभाव है। साथ ही परंपरागत तौर पर सीखे गए हुनर से उनका कारोबार चल रहा है। किसी तरह पूंजी का प्रबंध कर भी लें तो पेशे से इतनी कमाई नहीं होती कि लोन ली गई रकम को चुका सकें। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में प्रशिक्षित कारीगरों की कमी बड़ी बाधा है, जिससे काम की गति और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती है। अभी सरकार ने मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना के तहत सभी जीविका समूहों की महिला सदस्यों को 10-10 हजार रुपए दिए हैं, लेकिन आवेदन करने के बाद भी हमलोगों को कुछ नहीं मिला है। ऐसे में काम को कैसे आगे बढ़ा पाएंगे। इसके अलावा प्रशिक्षण का भी घोर अभाव है। सरकार को चाहिए कि हमें प्रशिक्षण दिलाकर मशीन लगाने में आर्थिक मदद करे, ताकि हम अपना उत्पादन बढ़ाते हुए बाजार की जरूरत को पूरी कर सकें। सालों से कागजों की थैलियां बनानेवालीं चंदा देवी, कृष्णा देवी, अंजना कुमारी, बासोना देवी बताती हैं कि साल में छह महीने ही ऐसे थैले बनाने के लिए समय उपयुक्त होता है। वातावरण में तापमान और नमी के बदलाव से कागज कमजोर हो जाता है। नमी के कारण दाग लगने से उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इस कारण खरीदार नहीं मिल पाते हैं। इसके अलावा जूट और कपड़े से बने थैलों के सामने कागज के ठोंगों की मांग घट गई है। इनका कहना था कि प्लास्टिक के कारण पहले से ही व्यवसाय चौपट हो रहा था। अब हाथ से ठोंगे बनाने वाले कारीगरों के लिए स्वचालित मशीनों ने बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। इनसे काम करने से उत्पादन सस्ता और तेज होता है। हाथ से काम करने पर आकार और फिनिशिंग में एकरूपता नहीं होती है, जबकि बाजार में सटीक कटिंग और मजबूत ठोंगे की मांग रहती है। मशीन के दौर में खुद को बाजार की प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण जरूरी है।
कार्ययोजना बनाने की दिशा में होगी पहल
कागज की थैली बनाने वाले कारीगरों की समस्या गंभीर है। प्लास्टिक के थैले पर प्रतिबंध के लिए नगर निगम और जिला प्रशासन से समन्वय बनाते हुए एक कार्ययोजना बनाने का आग्रह किया जाएगा। इसके अलावा समाज कल्याण विभाग और अन्य संबंधित विभागों से मिलकर इनके लिए सस्ता ऋण उपलब्ध कराने का प्रबंध किया जाएगा, ताकि मशीन लगाकर उत्पादन बढ़ा सकें। इसके अलावा इनका समूह बनाकर रद्दी कागज आधारित अन्य सजावटी सामान बनाने का प्रशिक्षण दिलाने की कोशिश की जाएगी।
-रंजन कुमार, नगर विधायक
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