पोस्टकार्ड भेज होती थी वोट की अपील, खुद खर्च उठाते थे वोटर

पोस्टकार्ड भेज होती थी वोट की अपील, खुद खर्च उठाते थे वोटर

संक्षेप:

मुजफ्फरपुर के हरिकिशोर ने 1952 के विधानसभा चुनावों की यादें साझा की हैं, जब चुनाव प्रचार में नैतिकता और जिम्मेदारी थी। उस समय मतदाता बूथ पर खुद खर्च उठाते थे और उम्मीदवारों को पोस्टकार्ड के माध्यम से...

Sep 03, 2025 07:07 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर
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मुजफ्फरपुर, अनामिका मेरा नाम हरिकिशोर है। मैं औराई गांव से हूं। आपलोगों की सेवा करने के लिए मैं चुनाव लड़ना चाहता हूं। अभी अलग अलग जगहों पर जा रहा हूं। अबतक आपके पास नहीं पहुंच पाया हूं, इसलिए यह भेज रहा हूं। पोस्टकार्ड पर कुछ इसी तरह से हाथ से लिखा संदेश लोगों के घर पर पहुंचता था, जिसमें वोट डालने की अपील भी होती थी। तब न तो प्रचार का शोर होता था और न ही पंफलेट आदि। पोस्टकार्ड के जरिए ही उम्मीदवार अपनी बात मतदाताओं तक पहुंचाते थे। इतना ही नहीं, बूथों पर होनेवाले खर्च भी उम्मीदवार नहीं वोटर उठाते थे।

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1952 के विधानसभा चुनाव में मुजफ्फरपुर में लोगों के घर इसी तरह से पोस्टकार्ड पहुंचे थे। तमाम दलों ने इसी को माध्यम बनाया था। चुनाव में मतदाताओं की नैतिकता का आलम यह था कि मुजफ्फरपुर में जब प्रत्याशी साधुशरण ने बूथ पर व्यवस्था के लिए पैसे दिए तो लोगों ने लौटा दिया था। मतदाताओं ने कहा था कि यह देश निर्माण की बात है। इसलिए हमारी भी जवाबदेही है। 1952 के चुनाव प्रचार में शामिल रहे समाजवादियों ने इन रोचक किस्सों को साझा करते हुए बताया कि तब वोट डालने से बूथ व्यवस्था तक लोग अपनी जिम्मेदारी समझते थे। राजनीतिक कार्यकर्ताओं के सम्मान में लोग खेतों में भी करते थे इंतजार वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता लक्षणदेव बाबू कहते हैं कि 1952 के चुनाव की यादें आज भी जेहन में हैं। उस समय की स्थिति देश के नवनिर्माण को लेकर थी। मेरे एक मित्र साधुशरण शाही ने कुछ बूथ पर व्यवस्था प्रबंध के लिए पैसे दिए तो लोग नाराज हो उठे थे। पैसा लौटाते हुए लोग पूछ बैठे थे- यह केवल आपका काम तो नहीं है? लोगों ने खुद खर्च किये। 1952 ही नहीं, 1962 के चुनाव में भी ऐसा ही वातावरण था। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता जब प्रचार में जाते थे तो उनके सम्मान में लोग खेतों में भी खड़े होकर इंतजार करते थे। लक्षणदेव बाबू कहते हैं कि कुढ़नी से साधुशरण शाही चुनाव लड़ रहे थे। जब उनकी मदद को कुछ लोगों ने हाथ बढ़ाये तो उन्होंने कहा कि मैं किसी भी अंवाछित से मदद नहीं लूंगा। इस परहेज के बावजूद आमलोगों ने उनकी मदद की थी। प्रतिद्वंद्वी भी साथ निकलते थे प्रचार में, खाना भी होता एक-दूसरे के घर सर्वोदयी संजीव साहू व सुरेन्द्र कुमार बताते हैं कि उस समय का दौर ऐसा था कि आमने-सामने खड़े प्रतिद्वंद्वी भी प्रचार में एक साथ निकलते थे। खाना भी एक-दूसरे के घर होता था। 1962 में हरिकिशोर बाबू और शशिरंजन बाबू एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे। बावजूद इसके हर चीज में दोनों एक दूसरे के साथ खड़े थे। पुपरी क्षेत्र से ये दोनों लड़ रहे थे। तब सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर एक ही था। हरिकिशोर बाबू जब प्रचार में आते तो औराई में शशिरंजन बाबू के यहां खाना खाते।