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पांच साल से कुढ़नी व सकरा के छठ व्रती नहीं दे पा रहे कदाने और नून में अर्घ्य

पांच साल से कुढ़नी व सकरा के छठ व्रती नहीं दे पा रहे कदाने और नून में अर्घ्य

संक्षेप:

मुजजफ्फरपुर में पिछले पांच वर्षों से कुढ़नी और सकरा के छठ व्रती कदाने और नून नदी में अर्घ्य नहीं दे पा रहे हैं। जलकुंभी के कारण नदी का पानी प्रदूषित हो गया है। स्थानीय लोग नदी की सफाई की मांग कर रहे...

Oct 18, 2025 01:36 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर
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मुजजफ्फरपुर, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। पांच साल से कुढ़नी व सकरा के छठ व्रती कदाने और नून नदी में अर्घ्य नहीं दे पा रहे हैं। उन्हें कृत्रिम घाट में अर्घ्य देना पड़ता है। नदी में अत्यधिक जलकुंभी के कारण इन नदियों में छठ पूजा लोग नहीं कर पा रहे हैं। यहां हर चुनाव में नदी की सफाई करने का जनप्रतिनिधि वादा करते हैं। चुनाव जीतने के बाद भूल जाते हैं। इस बार विधानसभा चुनाव से पहले छठ होने जा रहा है। व्रतियों के बीच इस बार सभी पार्टी के प्रत्याशियों एवं निर्दलीय प्रत्याशियों को इस मुद्दे पर जवाब देना मुश्किल होगा। दोनों विधानसभा क्षेत्रों की एक दर्जन से अधिक पंचायतों के व्रती कदाने व नून नदी में अर्घ्य देते थे।

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सोनबरसा के दिलीप कुमार ठाकुर ने बताया कि करीब पांच वर्ष से स्थानीय लोगों की ओर से नदी की सफाई कराने की मांग की जा रही है। बीते वर्ष लोकसभा चुनाव एवं विधानसभा उप चुनाव से पूर्व के सांसद और वर्तमान के स्थानीय विधायक से भी सफाई कराने का आश्वासन मिला था। नमामी गंगे योजना से सफाई कराने की मांग की गई थी। वहीं, दूसरी ओर शहर का प्रदूषित पानी फरदो नदी में जाता है, जिसका जुड़ाव कदाने नदी से है। इस कारण नदी का पानी प्रदूषित होकर काला हो गया है। इस नदी से जुड़ाव कुढ़नी के पुपरी, गोरिहारी, चढ़ुआं, बसौली, केरमा, बछुमन, झिकटी, किनारू, सोनबरसा, सकरा में हुस्सेपुर, मुरियारी, भड़वारी, जोगिनी, बरियारपुर, कुतबपुर, रामनगर, लठा, बाजी है गांव जलकुंभी से प्रभावित है। वहीं नून नदी से साहपुर मरीचा, बरियापुर आदी दर्जनों पांचायत प्रभावित हैं। नून कदाने बाया तब तीनों तीरथ भाया सोनबरसा शिव मंदिर के पुजारी 85 वर्षीय बाबा राम नारायण दास त्यागी ने बताया कि सोनबरसा में कदाने नदी, मरीचा के नून नदी व महुआ के बाया नदी का धार्मिक महत्व है। 40 वर्ष पहले नेपाल समेत उत्तर बिहार के श्रद्धालु गंगा स्नान कर लौटते समय बारी-बारी से तीनों नदियों में स्नान करते थे। तभी उनका तीर्थ पूरा माना जाता था। इसी कारण कहा जाता था कि ‘नून, कदाने बाया, तब तीनों तीरथ भाया...। कदाने में केला, मकुंदाना और चवन्नी अर्पित करते थे।