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लोकसभा चुनाव 2019 : झंझारपुर में जातीय वेग में मुद्दों को बहा लेना कठिन

लोकसभा चुनाव 2019 :  झंझारपुर में जातीय वेग में मुद्दों को बहा लेना कठिन

झंझार मतलब पानी का वेग, पुर अर्थात नदी की धार। लोग कहते तो यही हैं कि झंझारपुर बाढ़ की व्युत्पत्ति है। हाल के दशकों में बाढ़ की त्रासदी यहां कम तो जरूर हुई है, मगर गरीबी और राजनीतिक उपेक्षा का मंजर ज्यों का त्यों है । पूरी राजनीति जातीय गुणा-भाग में सिमटी है, पर अबकी दृश्य थोड़े अलग है। जनता अपने पत्ते नहीं खोल रही, चुनावी रणबांकुरों के रणनीतिकार बस जनता का मूड भांपने में लगे हैं। प्रेक्षकों की मानें तो इस बार नेताओं के लिए जातीय वेग में मुद्दों को बहा ले जाना यहां आसान नहीं होगा। लोगों की खामोशी क्या गुल खिलाएगी यह कहा नहीं जा सकता है।

फुलपरास, फुलकाही, कुशमार सहित दर्जनभर गांवों के लोगों का एक बड़ा हिस्सा मुंबई और गुजरात के विभिन्न शहरों में ‘झंझारपुर बसा रखा है। पलायन की पीड़ा पूरे बिहार की है मगर साल में तीन से चार महीने तक बाढ़ की तबाही झेलने के कारण मिथिलांचल में यह समस्या कुछ अधिक त्रासदीपूर्ण है। दशकों से यह पीड़ा नहीं मिटी। पलायन बड़ी समस्या है तथा कहीं-न-कहीं बड़ा मुद्दा भी।

उपाधियों से जनता का पेट नहीं भरता

1972 से लगातार मतदान कर रहे सेवानिवृत्त शिक्षक शोभा कांत यादव कहते हैं, झंझारपुर को कभी मुख्यमंत्री का गांव कहा जाता था। मगर उपाधियों से जनता का पेट नहीं भरता है। अयोध्या अगर श्रीराम की जन्मभूमि है तो मधुबनी के कई इलाकों में सीता मैया से जुड़ी कहानियां बिखरी पड़ी हैं। मंदिर भी हैं। मगर आज तक राष्ट्रीय पटल पर इसे नहीं लाया जा सका।

इतने उम्मीदवार मैदान में

गुलाब यादव: राजद, राज कुमार सिंह : बसपा, रामप्रीत मंडल : जदयू, गंगा प्रसाद यादव : पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया, छेदी राम : भारतीय मित्र पार्टी, देवेंद्र प्रसाद यादव : समाजवादी जनता दल डेमोक्रेटिक, प्रभात प्रसाद : सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, रत्नेश्वर झा : आदर्श मिथिला पार्टी : रामानंद ठाकुर : शिवसेना, रमेश कुमार कामत : आम अधिकार मोर्चा, लक्ष्मण प्रसाद यादव: रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, सुरेंद्र प्रसाद सुमन : ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक, ओम प्रकाश पोद्दार : स्वतंत्र, गणपति झा, स्वतंत्र : बबलू गुप्ता, स्वतंत्र, विपिन कुमार सिंघवैत : स्वतंत्र, संजय भरतीया: स्वतंत्र

ध्वस्त रेल ट्रैक अभी तक नहीं बना

ग्रामीण बजरंगी कहते हैं, 1932 में ध्वस्त हुआ झंझारपुर-निर्मली रेलवे ट्रैक अबतक नहीं बन पाया है। हालांकि सड़कों में बहुत सुधार हुआ है। मगर रेलमार्ग का कोई विकल्प नहीं है।

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  • Web Title:Lok Sabha election 2019 Difficult to shed issues in ethnic velocity in Jhansarpur