पुश्तैनी पेशे से कट रहे कुम्हार, मदद की दरकार

Mar 12, 2026 07:16 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर
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मुजफ्फरपुर में कुम्हारों की नई पीढ़ी अपने पारंपरिक पेशे से दूर होती जा रही है। मिट्टी की कीमतों में वृद्धि और आधुनिकता के कारण उनके बनाए उत्पादों की मांग घट रही है। युवा पीढ़ी दिहाड़ी मजदूरी को प्राथमिकता दे रही है। सरकार से बेहतर समर्थन की उम्मीद है ताकि उनकी कला और व्यवसाय को नया जीवन मिल सके।

पुश्तैनी पेशे से कट रहे कुम्हार, मदद की दरकार

मुजफ्फरपुर। तंगहाली के कारण कुम्हारों की नई पीढ़ी आज पुश्तैनी पेशे से दूर होती जा रही है। डिजिटल हो चुके दौर में आज भी कोई शुभ कार्य कुम्हार समुदाय के उत्पाद के बिना पूरा नहीं होता, बावजूद इन्हें मुख्य धारा में लाने के उपाय न सरकार के स्तर पर किए जा रहे हैं और न समाज के स्तर पर। इस स्थिति को लेकर कुम्हारों में गहरी निराशा है। शहर के चतुर्भुज ठाकुर रोड में रहनेवाले कुम्हार परिवारों ने बताया कि मिट्टी के दाम दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन मिट्टी के उत्पाद के दाम घटते ही जा रहे हैं। बिक्री भी इतनी नहीं कि ठीक से परिवार का पेट पाल सकें।

सरकार विशेष रूप से पहल करे तो अस्तित्व संकट से जूझ रहे पुश्तैनी पेशे में नई जान आए।जिले के कुम्हार समुदाय की हालत यह है कि अब न तो गर्मी के मौसम में पानी के घड़ों की दुकान पर ग्राहकों भी भीड़ दिखती है और न दीपावली के समय कुम्हार चाक पर पसीना बहाते हुए दीयों को गढ़ते दिखते हैं। इसका कारण इनके बनाए उत्पादों के लिए न तो बाजार में कोई जगह रह गई है और न अब लोग इसके लिए लालायित हैं। इसका प्रमुख कारण घड़ों की जगह घरों में फ्रिज का बढ़ता उपयोग है। वहीं, दिवाली में डिजाइनर इलेक्ट्रिक बत्तियों ने मिट्टी के बने पारंपरिक दीयों को दरकिनार कर दिया है। टेराकोटा की कलाकृतियों के नाम पर भले ही एक बेहतर बाजार बना है, लेकिन उसका लाभ सामान्य कुम्हार तक इस कारण नहीं पहुंच पा रहा है कि मशीनों से बनी ऐसी कलाकृतियों की बनावट का मुकाबला ये अपनी हाथ से बनी कलाकृतियों से कर पाने में अक्षम हैं। समाज के लोगों का कहना है कि इनके प्रति सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की बेरुखी से इनको कोई विशेष मदद नहीं मिल पा रही है। ऐसे में ये अपनी कला, कलाकारी और रोजगार को नई उंचाइयों तक नहीं ले जा पा रहे हैं। शहर के वार्ड 29 के चतुर्भुज ठाकुर रोड में रहनेवाले कुम्हारों ने बताया कि वे कई स्तरों पर समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन उनका हाल जानने वाला कोई नहीं है।संतोष कुमार, गंगा पंडित और त्रिवेणी पंडित ने कहा कि मिट्टी की उपलब्धता में कमी आज सबसे बड़ी बाधा है। मिट्टी की बढ़ती महंगाई से कई कुम्हार अपने पारंपरिक पेशे को छोड़ते जा रहे हैं। क्योंकि, एक तो उनके बनाए उत्पाद की बाजार में मांग काफी कम है। दूसरे, गांवों तक बढ़ती शहरी आबादी के कारण कलाकृतियां बनाने लायक मिट़टी की कमी होती जा रही है। इसके कारण उसकी कीमत में काफी उछाल आया है। पिछले एक दशक में ही इसकी कीमत तीन गुना से भी अधिक तक बढ़ गई है। एक-डेढ़ दशक पहले तक एक ट्रैक्टर मिट्टी आसानी से 300 से 400 रुपये तक में मिल जाती थी, लेकिन अब यही मिट्टी बहुत कठिनाई से 1500 रुपये प्रति ट्रैक्टर तक मिल पा रही है। ऐसे में लागत बढ़ती जा रही है, लेकिन उस अनुपात में मिट्टी के बने सामान की कीमतों में इजाफा नहीं हुआ है।

मिट्टी से बने सामान के लिए बेहतर बाजार नहीं

मनोज पंडित, हर्षित कुमार, रामपुकारी देवी, दिनेश पंडित ने बताया कि एक समय लोग दीपावली से काफी पहले ही दीयों के ऑर्डर बुक कर जाते थे। पूरा परिवार उन ऑर्डरों को समय से पूरा करने में जुट जाता था, लेकिन अब ये पुरानी बातें हो गई हैं। बाजारों में बिक रहे चाइनीज इलेक्ट्रानिक दीयों और झालरों की जगमगाहट ने लोगों को मिट्टी के दीयों से दूर कर दिया है। इसके चलते कुम्हार समुदाय का पुश्तैनी पेशा घाटे का सौदा बन गया है। नई पीढ़ी इस पेशे से कोसों दूर भाग रही है। लागत और मेहनत के हिसाब से उन्हें अच्छी कमाई नहीं हो रही। यही हाल गर्मियों में देखने को मिलता है। बताया कि एक समय था, जब गर्मियों से ठीक पहले ही घड़ों की मांग होने लगती थी। हर परिवार औसत दो से तीन हजार तक घड़े एक सीजन में बेच लेता था, लेकिन अब बहुत मुश्किल से सौ घड़े ही बिक पाते हैं। नतीजतन युवा पीढ़ी चाक चलाने की जगह दिहाड़ी मजदूरी को प्रमुखता दे रही है। आज हर घर से एक या दो युवा किसी न किसी महाजन के यहां दिहाड़ी पर काम करने को मजबूर हैं, ताकि घर-परिवार की रोजी-रोटी चलती रहे। चंदन कुमार, अजीत आनंद, सुमन कुमारी का कहना है कि आज बढ़ती महंगाई और आधुनिकता के कारण ही नहीं, बल्कि सरकारी स्तर पर उदासीनता के चलते भी हमलोग हाशिये पर हैं। आज गर्मी के मौसम में कुम्हारों के मटके से ज्यादा लोगों को फ्रिज का पानी पसंद आ रहा है। सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा ने भी दुश्वारियां बढ़ाई हैं। वर्ष 2014 में रेलवे स्टेशनों के अलावा हर सार्वजनिक जगहों पर मिट्टी के कुल्हड़ में ही चाय परोसने की नीति की घोषणा हुई थी। शुरू में इसके अच्छे नतीजे मिले भी, लेकिन बाद में इसमें भी बिचौलियागिरी हावी होने से सरकारी खरीदारी धीरे-धीरे समाप्त हो गई है। इसको लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर संबंधित विभागों के सरकारी अधिकारियों से पहल की उम्मीद है।

नई मशीन और उनपर काम करने का मिले प्रशिक्षण

विनिता पंडित, साधना देवी, कृष्णामती देवी का कहना है कि आज टेराकोटा सामान के कारोबार का पूरा सिस्टम नई और बिजली से चलनेवाली आधुनिक मशीनों पर टिका हुआ है। सरकार हमारे लिए भी अनुदानित दर पर ऐसी मशीनें उपलब्ध कराए। साथ ही हमारी युवा पीढ़ी को उन मशीनों के अलावा नये-नये डिजाइन बनाने के लिए आईटीआई जैसे संस्थानों में तकनीकी प्रशिक्षण दिलाने का प्रबंध करे। इसके अलावा कारोबार शुरू करने से लेकर उसे आगे ले जाने के लिए ब्याजमुक्त या फिर दो प्रतिशत ब्याज दर पर बैंकों से सुगम तरीके से लोन दिलाए। इसके अलावा तैयार उत्पादों के लिए बाजार का भी प्रबंध हो, ताकि युवा पीढ़ी को इससे जोड़ने में मदद मिले। कुम्हार समुदाय से जुड़े लोगों ने बताया कि सरकार के स्तर पर सार्थक सहयोग की पहल हो तो इससे हमारी आर्थिक के साथ ही सामाजिक प्रगति की राह आसान होगी।

समस्याओं को विधानसभा में उठाकर समाधान की किया जाएगा प्रयास

कुम्हारों की समस्याओं को विधानसभा में उठाते हुए समाधान का प्रयास किया जाएगा। सरकार से ऐसी नीति बनवाने का प्रयास होगा, ताकि इनको सस्ता और सुलभ ऋण उपलब्ध कराया जा सके। पीएम नरेन्द्र मोदी ने 2014 में सभी सरकारी कार्यालयों में मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग अनिवार्य किया था। इसे लागू कराने के लिए एक बार फिर सरकार से अनुरोध किया जाएगा।

-रंजन कुमार, विधायक, मुजफ्फरपुर

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