जिम्मेदारी हजार फिर भी छह माह से मानदेय का इंतजार

Newswrap हिन्दुस्तान, मुजफ्फरपुर
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मुजफ्फरपुर में आंगनबाड़ी सेविकाओं का मानदेय छह माह से लंबित है, जिससे वे आर्थिक तंगी का सामना कर रही हैं। उन्हें मजदूरों से भी कम मेहनताना मिलता है और केंद्रों में सुविधाओं की कमी है। सेविकाएं बच्चों के पोषण की जिम्मेदारी निभाते हुए खुद कुपोषण का शिकार हो रही हैं।

जिम्मेदारी हजार फिर भी छह माह से मानदेय का इंतजार

मुजफ्फरपुर। गोदभराई, अन्नप्राशन जैसे सामाजिक सरोकारों की बुनियाद पर पांच दशक पहले एक ऐसे केंद्र की कल्पना की गई, जहां न सिर्फ बच्चों को अक्षर ज्ञान, बल्कि उनके पोषण सहित संस्कारों के बीज से उन्हें पल्लवित-पुष्पित करना था। इस केंद्र की महती जिम्मेवारी दी गई आंगनबाड़ी केन्द्र की सेविका और सहायिकाओं को। कई स्तरों पर समस्याओं से जूझते हुए ये आज भी अपने दायित्व का निर्वहन कर रही हैं। इनका कहना है कि मजदूरों से भी कम मेहनताना मिलता है, वह भी छह माह से लंबित है। आसपास के बच्चों के पोषण की जिम्मेदारी निभाते हुए आर्थिक तंगी के कारण हमारे घर के बच्चे ही कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। हमारे बाद बहाल शिक्षामित्र न केवल राज्यकर्मी बन गए, बल्कि 1500 से बढ़कर उनका वेतन 50 हजार के करीब हो गया, लेकिन हजार तरह के काम करते हुए भी हमारा मानदेय महज नौ हजार है। सरकार हमारी बेहतरी को लेकर पहल करे तो आंगनबाड़ी केंद्र अपने उद्देश्यों को शत-प्रतिशत पूरा कर सकें।

जिले में आंगनबाड़ी केन्द्रों की स्थिति

जिले में करीब 5600 आंगनबाड़ी केन्द्र संचालित हो रहे हैं, जिनमें 5600 सेविकाएं और 4800 सहायिकाएं हैं। सभी केन्द्रों को मिलाकर ये करीब दो लाख 24 हजार बच्चों का भविष्य संवार रही हैं। इसके अलावा अपने क्षेत्र के कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें पोषण देने की जिम्मेवारी भी इनके कंधों पर है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर काम करने वालीं इन सेविका-सहायिकाओं की पीड़ा है कि हमलोग बच्चों का कुपोषण तो दूर कर रहे हैं, लेकिन खुद कुपोषण का शिकार हैं। मानदेय इतना कम है कि यह रोज का 300 रुपये होता है। महंगाई के दौर में एक मजदूर से भी दो सौ रुपये कम मिलते हैं। बताया कि एक तो कम मानदेय मिलता है, दूसरा यह कि पिछले छह महीने से इसका भुगतान नहीं हुआ है, जिसके कारण भुखमरी की नौबत है।

आंगनबाड़ी केंद्रों में सुविधाओं की कमी

आंगनबाड़ी केंद्रों की सेविका-सहायिकाओं का कहना है कि केन्द्रों पर सुविधाओं का अभाव है। महंगाई दिनोंदिन आसमान छू रही है। पोषाहार भी दो साल से पुरानी दर पर ही मिल रहा है। विभाग ने वर्ष 2024 में जो पोषाहार राशि तय की थी, उसमें अभी तक बदलाव नहीं किया गया। प्रतिमाह 14 से 15 हजार पोषाहार की राशि मिलती है, मगर बाजार मूल्य की तुलना की जाए तो उतना पोषाहार 18 से 19 हजार में भी पूरा करना मुश्किल है। विभागीय बैठकों एवं कार्यस्थल पर पोशाक में नहीं रहने पर स्पष्टीकरण मांगा जाता है, जबकि सेविकाओं को तीन साल से पोशाक नहीं मिली है।

पोशाक की गुणवत्ता में कमी

कुढ़नी की आंगनबाड़ी सेविका सह संघ की प्रखंड अध्यक्ष रीना कुमारी दास ने कहा कि पहले 400 रुपये पोशाक राशि दी जाती थी तो अभिभावक अपने बच्चों के लिए मनपंसद कपड़े सिलवा लेते थे, लेकिन आज जीविका 425 रुपये लेकर सस्ती दर के कपड़े दे रही है। गुणवत्ता में कमी को लेकर बच्चों के अभिभावक आंगनबाड़ी केंद्र पर आकर हमलोगों से बकझक कर चले जाते हैं। कहते हैं कि इन कपड़ों को पहनने से मेरे बच्चे के शरीर में घाव होने लगता है।

पोषाहार का निरीक्षण जरूरी

मोतीपुर की सेविका सह संघ की प्रखंड सचिव दामिनी कांत कहती हैं कि विभाग द्वारा आदेश मिला है कि जहां आंगनबाड़ी केन्द्र के लिए भवन नहीं है, वहां सामुदायिक भवन पर केन्द्र संचालित किया जाए, मगर महिलाओं के लिए वहां पर मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव रहता है। बिजली, पानी, शौचालय जैसी आवश्यक जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। समय-समय पर अधिकारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि केन्द्र की जांच करने जरूर पहुंचते हैं, लेकिन वे पहले पोषाहार की जानकारी लेते हैं। बाद में बच्चों के विकास पर बात करते हैं। दुख तब होता है, जब उन्हें केन्द्र पर सुविधाओं की कमी के बारे में बताया जाता है तो वे हमलोगों की बात टालते हुए केन्द्र से निकल पड़ते हैं। आखिर हमलोग किस से अपनी समस्याएं साझा करें। आंगनबाड़ी केन्द्र आज भी उपेक्षा का शिकार हैं।

मोबाइल की खराब गुणवत्ता

कांटी की सेविका सह संघ की प्रखंड अध्यक्ष निर्मला नीलू ने बताया कि वर्ष 2018 में सेविकाओं को एक-एक मोबाइल दिया गया, मगर उसकी गुणवत्ता खराब होने से छह माह में ही वह खराब हो गया। सरकार जितना हमलोगों से काम लेती है, वह कार्य टैब से भी नहीं होने वाला है। कहा कि अब जब सरकार हमलोगों को मोबाइल ही देना चाहती है तो उसके पैसे दे दे, ताकि हमलोग उस पैसे से अच्छा मोबाइल खरीद सकें।

मानदेय नहीं मिलने से आर्थिक तंगी

मोतीपुर की सेविका सह संघ की प्रखंड अध्यक्ष सिंपी कुमारी ने बताया कि बीते छह माह से हमलोगों को मानदेय नहीं मिला है, जिसके कारण हमलोग आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं। केन्द्र पर सुविधाओं का अभाव के कारण काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वहीं, बोचहां की सेविका सह संघ की प्रखंड अध्यक्ष चांदनी कुमारी ने कहा कि जिले में पोषाहार मामले में सभी प्रखंडों में एकरूपता नहीं है। एक बच्चे पर आठ रुपये प्रतिदिन, गर्भवती महिला को नौ रुपये 50 पैसे प्रतिदिन, अति कुपोषित को 12 रुपये देने हैं, लेकिन आवश्यकतानुसार राशि विभाग से नहीं मिल पाती है।

मानदेय मिला नहीं, कैसे भेजें रिपोर्ट

औराई की सेविका सह संघ की प्रदेश महामंत्री संजू कुमारी ने बताया कि छह माह से मानदेय नहीं मिला है। इधर, विभाग की ओर से ऑनलाइन और ऑफलाइन रिपोर्ट मांगी जा रही है। मानदेय नहीं मिलने के कारण हमलोगों के पास न फोटोस्टेट कराने के पैसे हैं और न मोबाइल में इंटरनेट पैक भराने को राशि। ऐसे में कैसे रिपोर्ट भेजें? आरोप लगाया कि समय से रिपोर्ट जमा नहीं की तो विभाग के अधिकारी सेविकाओं से स्पष्टीकरण मांगने लगते हैं।

एक बैग में 5-8 किलो कम रहता है चावल

औराई की सेविका सह संघ की प्रखंड अध्यक्ष रंजू कुमारी कहती हैं कि एसएफसी से आंगनबाड़ी केन्द्रों पर जो चावल आता है, उसमें 5 से 8 किलो कम रहता है। गोदाम में कहा जाता है कि 50 किलो से अधिक चावल होगा, मगर जब केन्द्र पर लाती हूं तो कम रहता है। इतना ही नहीं, गोदाम से केन्द्र तक लाने का भाड़ा और पलदारी भी सेविकाओं को ही देनी पड़ती है। आखिर यह कहां का न्याय है?

राशि भुगतान में भेदभाव का आरोप

पारू की सेविका सह संघ की प्रखंड सचिव बबन कुमारी कहती हैं कि हमलोगों से चुनाव कार्य या दूसरे विभागों के काम करवा लिये जाते हैं, लेकिन जब मानदेय देने की बारी आती है तो सरकारी कर्मचारियों को पहले भुगतान हो जाता है, लेकिन हमलोगों को छह-छह महीने इंतजार करने के बाद भी समय से भुगतान नहीं हो पाता है।

कार्यक्रम मद की राशि का समय पर भुगतान

पारू की सेविका सह संघ की प्रखंड अध्यक्ष विभा कुमारी कहती हैं कि केन्द्रों पर साप्ताहिक व मासिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। गोदभराई, अन्नपराशन जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम होते हैं, मगर उनका पैसा विभाग की ओर से समय पर भुगतान नहीं किया जाता है। इसके लिए छह-छह माह तक इंतजार करना पड़ता है।

यात्रा भत्ता का अभाव

साहेबगंज की सेविका सह संघ की प्रखंड सचिव राजकुमारी देवी कहती हैं कि अधिकतर सेविकाओं को प्रखंड कार्यालय जाने में 10 से 20 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। प्रत्येक सप्ताह किसी न किसी कार्य से कार्यालय जाना पड़ता है, मगर विभाग कोई यात्रा भत्ता नहीं देता है। सेविकाओं के 100 से 150 रुपये खर्च हो जाते हैं।

पोषाहार की दर में अंतर

मोतीपुर की सेविका सिंपी कुमारी कहती हैं कि सरकार की पोषाहार दर और बाजार मूल्य में काफी अंतर है। इसके कारण सेविकाओं को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। मूल्य में वृद्धि ही हो रही है, पर वर्ष 2024 की सरकारी दर ही दी जा रही है।

सेविकाओं की स्थिति

दो अक्टूबर 1975 को बिहार में आंगनबाड़ी केन्द्र शुरू हुआ था। बीते 50 वर्षों में आंगनबाड़ी सेविकाओं को राज्यकर्मी का दर्जा तो दूर उचित मनादेय तक नहीं मिल रहा है। शिक्षामित्र का मानदेय 1500 से 50 हजार के करीब हो गया। वे राज्यकर्मी भी बन गए, मगर हमलोग मजदूर से भी कम मानदेय पर नौ हजार मासिक पर काम करने को विवश हैं।

-चन्द्रलेखा कुमारी, जिलाध्यक्ष, बिहार प्रदेश आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ

अन्य राज्यों की तुलना

पुदुच्चेरी में आंगनबाड़ी सेविकाओं को राज्यकर्मी का दर्जा दिया गया है। गोआ में 23 हजार, महाराष्ट्र में 15 हजार, मध्यप्रदेश में 15 हजार, गुजरात में 13 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिए जाते हैं। पर बिहार में नौ हजार मानदेय मिलता है। सेविकाओं को पर्यवेक्षक के पद पर प्रोन्नत करने को अबतक जिले में रोस्टर तक नहीं बना और फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

प्रतिमा कुमारी, प्रदेश अध्यक्ष, बिहार प्रदेश आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ

जिम्मेदार का बयान

आंगनबाड़ी केन्द्रों की सेविका-सहायिकाओं का लंबित मानदेय जल्द भुगतान किया जाएगा। पोषाहार राशि की पुरानी दर को संशोधित किया जाएगा। इनकी कई तरह की समस्याओं का मैंने गहराई से अवलोकन किया है। सेविका-सहायिकाओं की जो परेशानियां या मांगे हैं, उनपर विचार किया जा रहा है। इस माह के अंत तक सकारात्मक परिणाम दिखने लगेंगे।

डॉ. श्वेता गुप्ता, मंत्री, समाज कल्याण विभाग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आंगनबाड़ी सेविकाओं को मानदेय क्यों नहीं मिला?
आंगनबाड़ी सेविकाओं को पिछले छह माह से मानदेय नहीं मिला है, जिसके कारण वे आर्थिक तंगी का सामना कर रही हैं।
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