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तिरहुत में आठ साल में 93 लाख पौधे जमींदोज

तिरहुत में आठ साल में 93 लाख पौधे जमींदोज

1 / 231 अगस्त 2011 को एक दिन में तिरहुत प्रमंडल में लगाये गए रिकार्ड 96 लाख पौधों में से 93 लाख पौधे आठ साल में ही जमींदोज हो गए। करोड़ों की लागत से मनरेगा योजना के तहत लगाये इन पौधों के साथ ही इसके...

तिरहुत में आठ साल में 93 लाख पौधे जमींदोज

2 / 231 अगस्त 2011 को एक दिन में तिरहुत प्रमंडल में लगाये गए रिकार्ड 96 लाख पौधों में से 93 लाख पौधे आठ साल में ही जमींदोज हो गए। करोड़ों की लागत से मनरेगा योजना के तहत लगाये इन पौधों के साथ ही इसके...

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31 अगस्त 2011 को एक दिन में तिरहुत प्रमंडल में लगाये गए रिकार्ड 96 लाख पौधों में से 93 लाख पौधे आठ साल में ही जमींदोज हो गए। करोड़ों की लागत से मनरेगा योजना के तहत लगाये इन पौधों के साथ ही इसके रिकार्ड तक दफ्तर से गायब हो गए हैं। दुनियाभर की मीडिया में सुर्खियां बटोरने वाले इस अभियान का हश्र इससे समझा जा सकता है कि रखरखाव के अभाव में 96 लाख में से मात्र करीब तीन लाख पौधे ही आठ पंचायतों में बचे हैं। पंचायतों से मिली रिपोर्ट के अनुसार 95 फीसदी से अधिक पौधे नष्ट हो गये हैं। इस चर्चित अभियान की बाद में इतनी फजीहत हुई कि अभियान की बैठकों में भोजन सप्लाई करने वाले होटल व इसका रिकार्ड संधारित करने के लिए रिपोर्ट कार्ड प्रकाशित करने वाले प्रिंटिंग प्रेस तक को भुगतान के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। 93 लाख पौधों के साथ ही तिरहुत का एक उजला इतिहास मिट्टी में दफन हो गया है।

वर्ष 2011 में तत्कालीन प्रमंडलीय आयुक्त एसएम राजू ने मनरेगा योजना से प्रमंडल में रिकार्ड 96 लाख पौधे लगवाये थे। इनकी रखवाली की जिम्मेवारी मनरेगा मजदूर को ही दी गई थी। आनन-फानन में एक दिन में करोड़ों की लागत से 96 लाख पौधे लगा तो दिए गए, लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए बाड़ नहीं लगाई गई। इतना ही नहीं बिना खास तैयारी के जहां-तहां लगाये गए पौधों में पानी पटाने की जिम्मेवारी जिन मनरेगा मजदूरों को दी गई, उनका भुगतान भी अगले महीने से रोक दिया गया। करीब आठ साल बद जब ‘हिन्दुस्तान ने पंचायतों में इसकी पड़ताल की तो उस अभियान के अवशेष सकरा की पैगम्बरपुर के अलावा जारंग, भरतीपुर, जगदीशपुर बहनगरी, रूपनपट्टी, मथुरापुर, बेझा व सिराजाबाद पंचायत में ही दिखते हैं। बाकी जगहों पर जहां पौधे लगाये गए थे, वहां आज उनका नामोनिशान तक नहीं है। मनरेगा मजदूरों को मिले थे 50-50 पेड़:योजना के अनुसार पेड़ की रखवाली संबंधित गांव के मनरेगा मजदूरों को दी गई थी। उन्हें मनरेगा से मजदूरी के अलावा 50-50 पेड़ों के जलावन व फल-फूल पर अधिकार दिया गया था।

होटल व प्रिंटिंग प्रेस ने खटखटाये अदालत के दरवाजे

सभी पंचायतों के जनप्रतिनिधि व अधिकारियों की बैठक एमआईटी कॉलेज में बुलायी गई थी। सबको पेन, फोल्डर देने के साथ ही भोजन भी कराया गया था। इसका बिल करीब साढ़े सात लाख रुपये हुआ। शहर के एक नामी होटल ने भोजन की सप्लाई की थी। इसी तरह इस अभियान की पंचायतवार रिपोर्टिंग के लिए बड़े पैमाने पर बुकलेट व रिपोर्ट कार्ड पटना के एक प्रिंटिंग प्रेस से छपवाया गया था। इस राशि के भुगतान के लिए संबंधित होटल व छापाखाना को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

उस समय के मामले में मुझे जानकारी नहीं है और न ही इस बीच में कोई पूछताछ हुई है। इस संबंध में रिकार्ड देखने के बाद ही कुछ बता पाऊंगा।

-ज्योति कुमार, निदेशक, ग्रामीण विकास अभिकरण

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  • Web Title:93 lakh saplings in eight years in Tirhut