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31 अक्तूबर, 2020|9:51|IST

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खरपतवार प्रभावित करते हैं पैदावार

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जिले में इस बार समय पर पहुंचे मानसून एवं अच्छी बारिश के कारण धान की बंपर रोपाई हुई है। यदि समय पर विभिन्न रोगों, कीटों एवं खरपतवार का नियंत्रण नहीं किया गया तो उत्पादन काफी प्रभावित हो सकता है। विशेष रूप से खरपतवार का प्रबंधन धान बुवाई के समय से ही किसानों को शुरू कर देना चाहिए।

इस संबंध में मंगलवार को पौधा संरक्षण पर्यवेक्षक बसंत नारायण सिंह ने कहा कि, धान रोपाई के बाद खेत में मकड़ा, कोदो, कनकवा, सफेद मुर्गा, भंगर, बड़ी दुग्धी, जंगली धान, दूब एवं मोथा जैसे खरपतवार उग आते हैं और धान को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। वहीं जलीय क्षेत्रों में कर्मी एवं जलकुंभी जैसे खरपतवार धान के लिए हानिकारक होते हैं।

यह खरपतवार धान के पौधों को मिलने वाले पोषक तत्व, प्रकाश, जल आदि का अतिक्रमण करते हैं और धान की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ते हैं। यदि समय रहते इन पर नियंत्रण नहीं किया जाए तो धान का उत्पादन दर काफी कम हो जाता है। इस संबंध में चर्चा करते हुए जिला पौधा संरक्षण विभाग के सहायक निदेशक, अवधेश प्रसाद गुप्ता ने किसानों को सलाह देते हुए कहा कि, वे बुवाई के समय से ही खरपतवार नियंत्रण के लिए उपाय शुरू कर दें।

क्योंकि, धान रोपाई के 45 दिन के अंदर खरपतवार का नियंत्रण आवश्यक है। धान की निकाई- गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण का सबसे उत्तम तरीका है। इसके लिए किसानों को यांत्रिक विधि अपनाना चाहिए। इस विधि के तहत 8 से 10 इंच की दूरी पर लगाए गए धान में खरपतवार की निकाई - गुड़ाई के लिए कोनोवीडर यंत्र का प्रयोग करना सबसे अधिक उपयुक्त होता है।