अपनी परंपराओं को भूल रहा रंगों का उत्सव होली
दुर्गेश सिंह ने बताया कि होली का पारंपरिक उत्सव अब बदलते समय के साथ प्रभावित हो रहा है। पहले होली पारंपरिक गीतों, रंगों और पकवानों के साथ मनाई जाती थी, लेकिन अब अश्लील गीतों और रासायनिक रंगों का प्रचलन बढ़ रहा है। इस बदलाव से भाईचारे की भावना कमजोर हो रही है।

दुर्गेश सिंह, हवेली खड़गपुर। सद्भाव और भाईचारे को अनेक चटकीले रंगों में समाहित कर मनाया जाने वाला उत्सव होली में पारंपरिक खुशबुओं की झलक अब नहीं दिखती। बदलते दौर के साथ होली की परंपरागत क्रियाएं, प्राकृतिक रंग, पिचकारियां, पकवान, होली गीत आदि पर पाश्चात्य सभ्यता का असर दिखता है। जाति, धर्म, संप्रदाय को भूलकर मनाया जाने वाला यह उत्सव कभी समूहिक रूप से मनाया जाता था लेकिन बदलते समय के साथ अब होली के त्योहार में लोक परंपरा और उससे जुड़े पहलू प्रभावित हो रहा है। पहले फागुन के आते ही लोगों में मस्ती के सुर छाने लगते थे। गांव के चौपाल और चौराहों पर फाग और होली के पारंपरिक गीतों से मन खिल उठता था।
महीने भर पूर्व से पारंपरिक होली, फाग गीत और जोगीरा गायन से गांव में होली की झलक दिखना शुरू हो जाती थी। होली के आंचलिक गीत, राम और कृष्ण काल के होली गीत आदि मंडली के दलों द्वारा गाया जाता था लेकिन जैसे-जैसे समय तेजी से आधुनिक युग में प्रवेश करता जा रहा है। होली व फाग गाने वालों की आवाजें गुम हो रही है और चौपाल सूना लगता है। अब चौपाल और गांव की गलियों में डीजे पर दो अर्थी और फूहड़, अश्लील गीतों ने जगह ले ली है। समाजसेवी राकेश चन्द्र सिन्हा बताते है कि होली का पारंपरिक उत्सव का आनन्द उसकी पारंपरिक रंग, पोशाक व पकवानों में नीहित है। एक-दूसरे से मिलकर रंग लगाने की परंपरा सीमित होती जा रही है। पहले अबीर खेलने के पूर्व गांव के बड़े-बुजुर्गों का अशिर्वाद लिया जाता था। लेकिन होली में बड़े-बुजुर्ग दरवाजे पर रहते जरूर है लेकिन लोग परम्परा के अनुरूप उनका आशीर्वाद तक नहीं लेते। समाजसेवी डा. अशोक केशरी बताते है कि गुरू रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा शांति निकेतन में माह भर बसंतोत्सव की धूम रहती थी जो अब भी परंपराओं को जीवित रखा है। ब्रज की पारंपरिक लट्ठमार होली और मथुरा, बृन्दावन आदि में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग अब भी बरक़रार है। जयशंकर प्रसाद कहते है कि होली आपसी विद्वेष को भुलाकर नए रिश्तों की डोर मजबूत करता था। परन्तु आज जिस उत्पात और उद्दंडता से अपनी परंपराओं को भूलकर रंगों की बारिश करते है। उससे भाईचारे को मजबूत करने की बजाय रिश्ते में गांठ पड़ने की संभावना ज्यादा प्रबल होती है। अश्लील गीत, फूहड़ता, उपद्रव व नशाखोरी के साथ नये वक्त में रासायनिक रंगों के प्रयोग से होली के उत्सव का मजा अब फींका पड़ने लगा है। लिहाजा अन्य सभी त्योहार या तो पूजन से जुड़े है या किसी इबादत से लेकिन होली ही एक ऐसा उत्सव है जिसे सब मिलकर मनाते है।
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