सदर अस्पताल में बढ़ी मरीजों की संख्या, गंभीर मरीजों के लिए एम्बुलेंस बनी 'लाइफलाइन'
मुंगेर सदर अस्पताल में गंभीर मरीजों का सिलसिला जारी है। नवंबर से जनवरी तक 900 मरीजों को बेहतर इलाज के लिए बाहर रेफर किया गया। प्रसव जटिलताओं और हृदय रोगों वाले मरीज सबसे ज्यादा हैं। अस्पताल में सुविधाओं की कमी और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों को पटना और भागलपुर भेजा जा रहा है।

मुंगेर, एक प्रतिनिधि मुंगेर सदर अस्पताल में जिले भर से आने वाले गंभीर मरीजों का सिलसिला जारी है। हालिया आंकड़े, नवंबर से जनवरी तक पर नजर डालें तो लगभग 900 कि संख्या में गंभीर स्थिति वाले मरीजों को बेहतर इलाज के लिए जिले से बाहर बड़े अस्पतालों में रेफर किया गया है। सरकारी एम्बुलेंस सेवा इन मरीजों को समय पर पटना, भागलपुर और अन्य शहरों में पहुंचाने के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही है। इधर, रेफर होने वाले मरीजों में सबसे अधिक संख्या प्रसव संबंधी जटिलताओं और हृदय रोगों से पीड़ित मरीजों की रही। मुख्य रूप से हृदय रोग में दिल का दौरा या सांस लेने में गंभीर समस्या वाले कई मरीजों को तत्काल आईजीआईएमएस पटना रेफर किया गया।
वहीं प्रसव के बाद की जटिलताओं और 'फैमिली प्लानिंग' से जुड़े गंभीर मामलों को भागलपुर के जेएलएनएमसीएच भेजा गया। सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायल मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर ट्रामा सेंटर के लिए पटना रेफर किया गया। नवजात शिशुओं में सांस की तकलीफ और अन्य जन्मजात समस्याओं के कारण उन्हें विशेष देखभाल के लिये बाहर भेजा गया। इसके अलावा पेट दर्द, चोट और अन्य पुरानी बीमारियों के गंभीर मरीजों को भी अन्य अस्पताल में रेफर किया जाता है। वहीं विशेष उपचार और एडवांस केयर के लिए एम्स पटना भी मरीज़ को रेफर किया जा रहा है। ---------- चालकों की सक्रियता से बच रही जान रेफर होने वाले मरीज़ को जीवन दान देने में अहम रोल निभाने वाले एम्बुलेंस चालक हैं जो दिन-रात मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। देखा जाए तो कई मामलों में रात के 12 बजे से सुबह के 4 बजे तक भी एम्बुलेंस मरीजों को लेकर पटना या भागलपुर की दौड़ लगा रही है। इधर, अस्पताल सिविल सर्जन डॉ राजू का कहना है कि सदर अस्पताल में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन जिन मरीजों को सुपर-स्पेशलिटी केयर या वेंटिलेटर जैसी सुविधाओं की आवश्यकता होती है, उन्हें बिना समय गवाएं उच्च संस्थानों में भेज दिया जाता है ताकि उनकी जान बचाई जा सके। 300 बेड वाला अस्पताल को मात्र सौ बेड की क्षमता के अनुसार डॉक्टर दिया गया है। अस्पताल में सर्जन नहीं है। आज ऑपरेटर के कमी की वजह से करोड़ों की मशीन भी धूल फांक रही है। सरकार को इस संबंध में चिट्ठी भी लिखी गई है। कागजों पर सुपर, हकीकत में 'स्टॉपेज' कहने को तो सदर अस्पताल को सुपर स्पेशलिटी का दर्जा मिल गया है, लेकिन सेवा का हाल यह है कि यहां मरीज इलाज कराने कम और 'रेफर' होने ज्यादा आते हैं। अस्पताल की चमचमाती बिल्डिंग और बड़े-बड़े बोर्ड देखकर मरीज इस उम्मीद में आता है कि अब पटना के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, पर डॉक्टर की पहली ही पर्ची उसे फिर उसी पुराने हाईवे की राह दिखा देती है। -------- नाम बड़े और दर्शन छोटे स्पेशलिस्ट की कमी : सुपर स्पेशलिटी बिल्डिंग तो खड़ी है, लेकिन गंभीर रोगों के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों का आज भी टोटा है। वहीं करोड़ों की मशीनें धूल फांक रही हैं या ऑपरेटर के इंतजार में हैं। हृदय रोग हो या प्रसव की जटिलता, 'लाइफ सपोर्ट' अस्पताल के भीतर नहीं, बल्कि बाहर खड़ी एम्बुलेंस में ही नजर आता है। अस्पताल अब इलाज का केंद्र कम और 'रेफरल जंक्शन' ज्यादा लगने लगा है। जब तक हर मर्ज का इलाज यहीं मुमकिन नहीं होता, तब तक 'सुपर स्पेशलिटी' का टैग केवल एक सजावटी शब्द ही बना रहेगा। -------------- एक तरफ जहां प्रशासन स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के दावे कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रेफरल के ये बढ़ते आंकड़े व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। सदर अस्पताल का सुपर स्पेशलिटी विभाग सफेद हाथी साबित हो रहा है, जहां से हर गंभीर मरीज को अंततः 150-200 किलोमीटर दूर पटना या भागलपुर ही भेजा जाता है।
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