जमीन के दावे में उलझा मुंगेर विश्वविद्यालय
मुंगेर विश्वविद्यालय के लिए भूमि अधिग्रहण का मामला लंबित है। किसानों का कहना है कि वे 4.57 एकड़ जमीन पर वैध रैयत हैं, जबकि प्रशासन इसे गैर मजरुआ बताता है। मुआवजे की दर पर भी विवाद है। प्रशासन और किसानों के बीच संवाद की कमी से समस्या बढ़ती जा रही है, जिससे विश्वविद्यालय निर्माण प्रभावित हो रहा है।

मुंगेर, एक संवाददाता। मुंगेर विश्वविद्यालय के लिए प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण का मामला लंबे समय से अधर में लटका हुआ है। विश्वविद्यालय निर्माण के लिए चिन्हित की गई जमीन में से लगभग 4.57 एकड़ भूमि पर अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। यही जमीन इस पूरे विवाद का केंद्र बनी हुई है। प्रशासन का कहना है कि, यह भूमि राजस्व अभिलेखों में गैर मजरुआ के रूप में दर्ज है, इसलिए इस पर किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत स्वामित्व मान्य नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, स्थानीय किसान खुद को इस जमीन का वैध रैयत बताते हैं। उनका दावा है कि वर्षों से वे इस भूमि पर काबिज हैं और नियमित रूप से रैयती रसीद कटवाते आ रहे हैं।
किसानों के अनुसार, केवल अभिलेखों के आधार पर जमीन को गैर मजरूआ बताना वास्तविक स्थिति से आंख मूंदने जैसा है। उनका कहना है कि इसी जमीन पर उनकी आजीविका निर्भर है और कई परिवारों का भविष्य इससे जुड़ा हुआ है। भूमि अधिग्रहण में देरी के कारण विश्वविद्यालय परियोजना भी प्रभावित हो रही है। शिक्षा और विकास से जुड़े इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को लेकर जहां सरकार बड़े दावे कर रही है, वहीं जमीनी स्तर पर यह विवाद उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा बन गया है। स्थानीय लोग मानते हैं कि, यदि समय रहते इस विवाद का समाधान नहीं हुआ, तो मुंगेर जैसे शैक्षणिक रूप से पिछड़े क्षेत्र को एक बड़े अवसर से हाथ धोना पड़ सकता है। रैयत आवासीय दर की मांग पर अड़े किसान, मुआवजे को लेकर बढ़ता असंतोष: जमीन विवाद के साथ-साथ मुआवजे की दर भी किसानों और प्रशासन के बीच टकराव की बड़ी वजह बनी हुई है। किसान स्पष्ट रूप से मांग कर रहे हैं कि, उन्हें रैयत आवासीय भूमि के दर से मुआवजा दिया जाए। उनका तर्क है कि, जिस जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है, वह केवल खेती योग्य नहीं है। इसी तरह की जमीन मेडिकल कॉलेज के लिए ली गई और वहां आभासी भूमि की दर से मुआवजा दिया गया। ऐसे में, सामान्य कृषि भूमि की दर से मुआवजा देना हमारे साथ अन्याय होगा। किसानों का कहना है कि, विश्वविद्यालय जैसे बड़े प्रोजेक्ट के लिए यदि उनकी जमीन ली जा रही है, तो बदले में उन्हें सम्मानजनक और न्यायसंगत मुआवजा मिलना चाहिए। कई किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि, प्रशासन उनकी बातों को गंभीरता से नहीं सुन रहा और केवल कागजी रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय लेने की कोशिश कर रहा है। वहीं प्रशासन का पक्ष है कि, मुआवजा पूरी तरह नियमों और सरकारी प्रावधानों के अनुसार ही दिया जा सकता है। अधिकारियों के अनुसार, यदि जमीन गैर मजरूआ श्रेणी में आती है तो मुआवजा देना संभव नहीं है। प्रशासन यह भी कह रहा है कि, सभी दावों की जांच की जा रही है और अंतिम निर्णय तथ्यों व रिकॉर्ड के आधार पर लिया जाएगा। फिलहाल किसान आंदोलन के मूड में हैं और समाधान निकलने तक विरोध जारी रखने की बात कह रहे हैं। अपने मुद्दों को लेकर उन्होंने पिछले दिनों भी आंदोलन और बैठक किया था। दूसरी ओर, प्रशासन पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि, वह इस विवाद को शीघ्र सुलझाए और जल्द से जल्द जमीन का अधिग्रहण हो, ताकि विश्वविद्यालय निर्माण का रास्ता साफ हो सके। अब यह देखना अहम होगा कि, सरकार और प्रशासन इस टकराव को संवाद से सुलझाते हैं या यह मामला और लंबा खिंचता है। कहते हैं अधिकारी: जो जमीन विश्वविद्यालय के लिए अधिग्रहित किया जा रहा है उसमें से 4.57 एकड़ जमीन खतियान के आधार पर गैर मजरुआ है। इस जमीन पर कुछ किसान अपना दावा कर रहे हैं। लेकिन, राजस्व अभिलेख में हुआ जमीन गैर मजरूआ जमीन के रूप में उल्लेखित है। ऐसे में उनका दावा सही नहीं है। यदि उनके पास कोई वैध कागजात है तो उसे अंचल कार्यालय में आकर प्रस्तुत करें। जांच के बाद निश्चित रूप से उनके साथ न्याय किया जाएगा। -अंजली कुमारी, सीओ, सदर अंचल, मुंगेर
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