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बोले मुंगेर : सिंचाई के संकट से जूझ रहा 2000 एकड़ का खेती क्षेत्र

बोले मुंगेर : सिंचाई के संकट से जूझ रहा 2000 एकड़ का खेती क्षेत्र

संक्षेप: बरियारपुर प्रखंड के नीरपुर पंचायत में कृषि भूमि की महत्वपूर्ण स्थिति है, लेकिन बोरिंग और सिंचाई संसाधनों की कमी के कारण किसान सूखे और बाढ़ से परेशान हैं। किसानों का कहना है कि यदि बोरिंग की व्यवस्था हो जाए, तो वे साल में दो से तीन फसलें उगा सकते हैं। 

Mon, 17 Nov 2025 01:06 AMNewswrap हिन्दुस्तान, मुंगेर
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प्रस्तुति: गौरव कुमार मिश्रा

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मुंगेर जिले के बरियारपुर प्रखंड में नीरपुर पंचायत अंतर्गत करहरिया, नूरपुर और बगड़ा मौजाओं की लगभग 2000 एकड़ कृषि भूमि आज भी मूलभूत सिंचाई सुविधाओं के अभाव के साथ-साथ बाढ़ संकट से जूझ रही है। इन मौजाओं में लगभग 1000 किसानों के सक्रिय रूप से कृषि से जुड़े होने के बावजूद इस क्षेत्र में बोरिंग की व्यवस्था न होना, बार-बार आने वाली बाढ़ और सूखे की स्थितियां किसानों की कृषि उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। राज्य सरकार द्वारा हर खेत तक सिंचाई का पानी पहुंचाने की योजना वर्ष- 2025 तक लागू करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं और किसान इनके समाधान की आशा में हैं।

करहरिया, नूरपुर और बगड़ा मौजाओं में बाढ़-सुखाढ़ संकट और कृषि विकास की संभावनाएं:

बरियारपुर प्रखंड में नीरपुर पंचायत के अंतर्गत करहरिया, नूरपुर और बगड़ा मौजा में स्थित कृषि भूमि का विशेष महत्त्व है, क्योंकि इस मौजा की लगभग 2000 एकड़ उपजाऊ जमीन इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। मसूर, चना, गेहूं और धान जैसे मुख्य फसलों की खेती यहां परंपरागत रूप से होती रही है। प्राकृतिक रूप से यह क्षेत्र उत्पादन के लिए उपयुक्त है, लेकिन सिंचाई संसाधनों की कमी के कारण कृषि क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं हो रहा है।

इन क्षेत्रों में सबसे बड़ी समस्या है, बोरिंग का अभाव। खेतों तक बिजली पहुंचने के बावजूद यदि पानी उपलब्ध नहीं है, तो किसान आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग नहीं कर पाते हैं। वर्तमान में किसान वर्षा पर निर्भर रहते हैं, जिसके कारण सूखे की स्थिति में बड़ी क्षति होती है। दूसरी ओर, बाढ़ के कारण लगभग ढाई महीने तक खेत डूबे रहते हैं, जिससे खरीफ और रबी दोनों मौसमों की कृषि प्रभावित होती है।

यदि बोरिंग की व्यवस्था हो जाए, तो किसान मसूर और चना के साथ-साथ धान-गेंहू-मकई जैसे बहुफसली चक्र अपनाकर उत्पादन बढ़ा सकते हैं। इससे प्रति किसान आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। सिंचाई उपलब्ध होने का सीधा लाभ यह होगा कि, किसान केवल एक मौसम पर निर्भर नहीं रहेंगे, बल्कि साल में दो से तीन फसलें उगा सकेंगे।

किसानों ने हिन्दुस्तान संवाददाता के साथ संवाद के दौरान कहा कि, राज्य सरकार की हर खेत तक पानी योजना यदि समय पर और प्रभावी रूप से लागू होती है, तो इन तीनों मौजाओं के किसानों को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है। यह योजना क्षेत्रीय कृषि संरचना को बदलने की क्षमता रखती है। ऐसे में स्थानीय किसानों के लिए आवश्यक है कि, वे योजनाओं की प्रगति की जानकारी रखें, संबंधित अधिकारियों से समन्वय बढ़ाएं तथा खेत-स्तर पर सिंचाई के वैकल्पिक साधन, जैसे- सामूहिक बोरिंग, डीजल पंप और लिफ्ट-सिंचाई, पर भी विचार करें।

कुल मिलाकर, सिंचाई व्यवस्था में सुधार होने पर करहरिया, नूरपुर और बगड़ा मौजा न केवल आत्मनिर्भर कृषि क्षेत्र बन सकते हैं, बल्कि यह मुंगेर जिले के कृषि उत्पादन में अग्रणी स्थान भी प्राप्त कर सकते हैं।

सिंचाई व्यवस्था का अभाव और किसानों की कठिनाइयां:

इन मौजाओं में सिंचाई सुविधाओं की कमी किसानों की सबसे बड़ी समस्या है। बिजली उपलब्ध होने के बावजूद बोरिंग न होना उत्पादन क्षमता को सीमित कर देता है। किसान अभी भी वर्षा और प्राकृतिक जल पर निर्भर हैं, जिसके कारण सूखे में फसलें नष्ट हो जाती हैं। वहीं, बाढ़ यहां की दूसरी बड़ी समस्या है। बाढ़ की अवधि में तो खेत महीनों तक डूबे रहते हैं, जिससे समय पर बुआई संभव नहीं हो पाती है। इस समस्याओं का समाधान केवल तेजी से जल विकास की व्यवस्था, गहरे बोरिंग, सामूहिक सिंचाई परियोजनाओं और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में ही निहित है।

कृषि की संभावनाएं और बहुफसली उत्पादन की क्षमता:

यदि सिंचाई उपलब्ध हो जाए, तो यह क्षेत्र मुंगेर का सबसे उर्वर कृषि क्षेत्र बन सकता है। मसूर, चना, धान, गेहूं और मकई जैसी फसलों की खेती बड़े पैमाने पर संभव है। पानी मिलने से किसान एकल फसल के बजाय बहुफसली चक्र अपना सकेंगे, जिससे उनकी आय दोगुनी होने की क्षमता है। मिट्टी की गुणवत्ता इस बात का संकेत देती है कि, उचित सिंचाई होने पर यहां साल में दो से तीन फसलें नियमित रूप से ली जा सकती हैं।

सरकारी योजनाएं और स्थानीय स्तर पर कार्यान्वयन की चुनौतिया:

राज्य सरकार की हर खेत तक पानी योजना महत्वाकांक्षी है, लेकिन मौजा-स्तर पर इसका क्रियान्वयन धीमा है। जून- 2025 तक लक्ष्य तो तय है, परंतु जमीन पर प्रगति सीमित दिखती है। किसानों को योजना की वास्तविक स्थिति से अवगत कराने और अधिकारियों द्वारा नियमित निगरानी की आवश्यकता है। स्थानीय स्तर पर पाइपलाइन, बोरिंग, और लिफ्ट-सिंचाई जैसी परियोजनाओं का समयबद्ध निष्पादन ही इस क्षेत्र की कृषि समस्याओं का स्थायी समाधान बन सकता है।

समस्याएं:

1. बिजली उपलब्ध होने के बावजूद बोरिंग न होने से लगभग 2000 एकड़ जमीन सिंचाई से वंचित है। किसान वर्षा पर निर्भर होकर खेती करते हैं, जिससे उत्पादन अनिश्चित रहता है।

2. प्रति वर्ष लगभग ढाई महीने तक खेत पानी में डूबे रहते हैं। इससे खरीफ की फसल प्रभावित होती है और रबी फसल की तैयारी भी समय पर नहीं हो पाती है।

3. बरसात की कमी होने पर खेत सूखे रह जाते हैं, क्योंकि सिंचाई का कोई वैकल्पिक साधन मौजूद नहीं है। इससे मसूर, चना और अन्य फसलें बर्बाद हो जाती हैं।

4. सिंचाई न होने के कारण किसान साल में केवल एक फसल ही सुरक्षित रूप से ले पाते हैं। धान, गेंहू, मसूर एवं मकई जैसे बहुफसली विकल्प उपलब्ध होते हुए भी किसानों को मजबूरी में सीमित खेती करनी पड़ती है।

5. राज्य सरकार की हर खेत तक पानी योजना का मौजा-स्तर पर अमल बेहद धीमा है। किसानों को समय पर जानकारी नहीं मिल रही और जमीन पर प्रगति भी सीमित है।

सुझाव:

1. किसानों को समूह-आधारित सामूहिक बोरिंग योजना अपनानी चाहिए। पंचायत और कृषि विभाग के माध्यम से सामूहिक सिंचाई कूप का प्रस्ताव भेजकर कार्य शीघ्र शुरू किया जा सकता है।

2. लगभग ढाई महीने खेत के डूबे रहने से बचाने के लिए जल निकासी मार्गों का निर्माण एवं पुराने नहरों की सफाई आवश्यक है। इससे बाढ़ का पानी तेजी से निकल सकेगा और कृषि चक्र प्रभावित नहीं होगा।

3. सूखे के दिनों में किसानों को सोलर पंप, डीजल पंप और लिफ्ट सिंचाई जैसे विकल्प अपनाने की आवश्यकता है। सरकार इन पर सब्सिडी देती है, जिसका लाभ उठाया जा सकता है।

4. पानी उपलब्ध होते ही किसान मसूर–चना के साथ-साथ धान, गेहूं, मकई जैसी दो–तीन फसलों का चक्र अपना सकते हैं। कृषि विभाग द्वारा दिए जाने वाले फसल-आधारित तकनीकी प्रशिक्षण का लाभ लेना चाहिए।

5. पंचायत स्तर पर किसानों की एक समिति बनाई जाए, जो सिंचाई योजनाओं की प्रगति का निरीक्षण करे, अधिकारियों से नियमित संवाद स्थापित करे और सुनिश्चित करे कि, हर खेत तक पानी योजना समय पर पूर्ण हो।

इंफोग्राफिक:

1. करहरिया, नूरपुर और बगड़ा मौजा में लगभग 2000 एकड़ कृषि भूमि है।

2. यहां लगभग 1000 किसान कृषि कार्य से जुड़े हैं।

3.लगभग 30 हजार टन फसल की होती है खेती

परंपरागत के बीच संघर्ष करता कुम्हार समाज

मुंगेर, एक प्रतिनिधि।

संग्रामपुर प्रखंड के बलिया पंचायत के केन्दुआ गांव में बसे कुम्हार समुदाय का जीवन सदियों से मिट्टी और चाक के इर्द-गिर्द घूमता आया है। यह समुदाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिट्टी के बर्तन, खपड़े, कुल्हड़ और सुराही बनाकर अपनी आजीविका चलाता रहा है। लेकिन, आधुनिकता की तेज रफ्तार, प्लास्टिक और धातु के बर्तनों का बढ़ता चलन, सरकारी उदासीनता, कच्चे माल की उपलब्धता में कमी और महंगी बिजली ने इस कला और परंपरागत व्यवसाय को संकट में डाल दिया है।

यह समस्या केवल केन्दुआ गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रखंड के अन्य क्षेत्रों में बसे कुम्हारों का भी यही हाल है। यह संघर्ष केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक भी है, क्योंकि मिट्टी के बर्तन बनाना मात्र आजीविका का साधन नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण जीवन की सांस्कृतिक पहचान भी है।

इस समस्या को लेकर बीते 13 मई को हिन्दुस्तान अखबार से संवाद के दौरान जिले के कुम्हार समाज के लोगों ने अपनी परेशानियां साझा की थीं। अब समाज के प्रतिनिधि पप्पू कुमार पंडित ने बताया कि, सरकार की ओर से डेढ़ सौ यूनिट मुफ्त बिजली देने की व्यवस्था की गई है, जिससे कुम्हार परिवारों को बड़ी राहत मिली है। वहीं, मिट्टी की समस्या भी काफी हद तक हल हो गई है, क्योंकि नदी से अब मुफ्त में मिट्टी उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने

इसके लिए हिंदुस्तान अखबार का आभार जताते हुए कहा कि, आपके अखबार के माध्यम से हमारी आवाज सरकार तक पहुंचाई गई, जिसका असर यह हुआ कि, बिजली के दरों को कम किया गया और कच्चे माल की समस्या का समाधान भी हुआ। इससे हमें अपने पारंपरिक धंधे को बचाए रखने में कुछ उम्मीद मिली है।

बोले मुंगेर:

बिहार सरकार के द्वारा खेतों तक पहुंचने की बात थीं लेकिन अबतक खेतों तक पहुंच नहीं पाई है जिस कारण किसान खेती नहीं कर पाते हैं।

-दुर्गेश सिंह

बाढ़ के पानी में लगभग पांच महीने खेत डुबें रहते हैं कभी सुखार तो कभी बाढ़ के पानी से किसान परेशान हैं। समय पर मुआवजा भी नहीं मिल पाती है।

-युवल कुमार सिंह

यहां के अधिकतर किसान बिजली बिल से परेशान हैं। हम लोग केवल रवि फसल की बुआई करते हैं, खेतो तक पानी उपलब्ध होनी चाहिए।

-मनीष कुमार सिंह

खेती के समय यूरिया खाद हमें सरकारी दर से अधिक कीमत पर खरीदनी पड़ती है, और कई बार समय पर खाद उपलब्ध भी नहीं हो पाती। किसान के लिए जनप्रतिनिधि को ध्यान देने की जरूरत है।

-नरेंद्र सिंह

किसान की स्थिति हमेशा खराब रहती है — कभी सूखा तो कभी बाढ़ का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमारी समस्याओं की सुध लेने वाला कोई नहीं है।

-मुकेश कुमार

साल में केवल एक ही फसल रवि की होती है, उसमें भी नीलगाय फसल को बर्बाद कर देती हैं, फिर भी वन विभाग कोई ठोस कदम नहीं उठाता।

-रमेश कुमार

हम लोग चना या मसूर की खेती ही कर पाते हैं, पर कई बार फसल नष्ट हो जाती है। बिजली व्यवस्था सही नहीं रहने से पटवन में कठिनाई होती है।

-संजय सिंह

सरकार द्वारा तय 266 रुपये प्रति बोरी की जगह किसानों को बाजार में 325 रुपये देकर यूरिया खरीदना पड़ रहा है। प्रशासन को सख्त निगरानी करनी चाहिए।

-बौधु पासवान

छह महीने तक खेतों में बाढ़ का पानी भरे रहने से केवल तीन महीने खेती हो पाती है। इससे किसान पूरे वर्ष आर्थिक रूप से कमजोर बने रहते हैं।

-रतन राम

खेतों तक अगर पानी उपलब्ध हो जाए, तों यहां के किसान दो फसल कर सकते हैं। किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आएंगी। खेतों तक बोरिंग करवाया जाए।

-विपुल सिंह

नीलगाय के झुंड खेतों की फसल बर्बाद कर रहे हैं, जबकि इस बार वन विभाग ने उनकी रोकथाम के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

-प्रदीप यादव

खेतों तक पानी नहीं पहुंचने से किसानों को परेशानी होती है जबकि सिंचाई विभाग के द्वारा हर खेत तक पहुंचाया जाना था, लेकिन अबतक खेतों तक पानी नहीं पहुंच पाई है।

-मो नौशाद

किसान कभी सूखा तो कभी बाढ़ का दंश झेलते हैं, फिर भी सरकार स्थायी समाधान नहीं निकाल रही है। केंद्र और राज्य दोनों को इस पर ध्यान देना चाहिए।

-सुनील तांती

यूरिया की समय पर उपलब्धता नहीं होने और कालाबाजारी से किसान प्रभावित हैं। अगर खाद सरकारी दर पर समय से मिले तो किसान खुशहाल हो सकते हैं।

-कुलदीप कुमार

बरियारपुर प्रखंड के किसान जलजमाव के कारण खेती नहीं कर पा रहे हैं, जिससे वे गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं।

-संजीव कुमार

मुख्यमंत्री निजी नलकूप योजना के अंतर्गत किसानों को निजी नलकूप लगाने में मदद नहीं की जा रही है सरकार के द्वारा सिंचाई की व्यवस्था होनी चाहिए।

-सुबोध कुमार

बोले जिम्मेदार:

सरकार की योजना हर खेत तक पानी पहुंचाना है, जिसे सिंचाई विभाग द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है। सिंचाई विभाग के माध्यम से प्रत्येक खेत तक पानी पहुंचाने का कार्य लगातार जारी है। बरियारपुर प्रखंड में भी शीघ्र ही किसानों के खेतों तक पानी उपलब्ध करवाया जाएगा।

-अजीत कुमार, डीडीसी, मुंगेर