पुर्तगालियों व एंग्लो इंडियन ने स्थापित की थी लौहनगरी जमालपुर में पहला संत मेरी चर्च
) क्रिसमस का बड़ा दिन में मात्र सात दिन शेष है। बड़ा दिन मनाने को लेकर जहां इसाई धर्मालंबी ने तैयारी शुरू कर दी है।

जमालपुर, इम्तेयाज आलम (निज प्रतिनिधि) क्रिसमस का बड़ा दिन में मात्र सात दिन शेष है। बड़ा दिन मनाने को लेकर जहां इसाई धर्मालंबी ने तैयारी शुरू कर दी है। वहीं अपने पूजा गिरजाघरों की रंगरोगन कर चमकाने में भी जुट गए हैं। ईस्ट कॉलोनी स्थित संत जोसेफ चर्च में आगामी 21 दिसंबर से क्रिसमस मिलन समारोह का आयोजन किया जाएगा। जबकि 14 से 20 दिसंबर तक कैरेल गीत सुनाकर प्रभु यीशु का जन्म उत्सव का आमंत्रण देना जारी है। ईसाई समुदाय के लोग एक दूसरे के घरों पर दस्तक दे रहे हैं और प्रभु यीशु का संदेश सुना रहे हैं। जबकि 24 दिसंबर की सुबह से ही पूजा-अर्चना की शुरुआत कर दी जाएगी।
और रात 12 बजते ही प्रत्येक गिरजाघरों में प्रभु ईशु को यादकर उनके आदर्श व विचारों पर चलने की शपथ लेंगे। लोग घरों और गिरजाघरों को रंगरोगन करने में भी जुट गए हैं। शहर में 4 गिरजाधर, होती है सुबह-शाम पूजा-अर्चना एशिया प्रसिद्ध रेल इंजन कारखाना सन् 8 फरवरी 1862 को स्थापित की गयी थी। इसकी स्थापना के महज दो साल बाद 27 नवंबर 1864 ई. को लौहनगरी जमालपुर का पहला चर्च संत मेरी चर्च की स्थापना की गयी। संत मेरी चर्च द्वितीय विश्व युद्ध का साक्षी भी रहा है। शहीद हुए देश व विदेश के जवानों का यहां आज भी शिलापट्ट याद दिलाती है। तथा पूजा अर्चना के लिए देश विदेश के लोग यहां आते हैं। कहा जाता है कि पुर्तगालियों व एंग्लो इंडियन और अंग्रेजों ने प्रभु यीशु की आराधना के लिए पूजा अर्चना स्थल के रुप में इस चर्च की नींव डाली थी। दूसरा गिरजाघर संत जोसेफ चर्च है। इसकी स्थापना सन्1865 में हुई थी। जबकि रिमॉडलिंग का कार्य सन् 1936 में उस समय की गयी, जब मुंगेर में सन् 1934 में विनाशकारी भूंकप हुआ था। इस भूकंप में संत जोसेफ चर्च की कुछ दीवारें क्षतिग्रस्त हो गई थी। तीसरा चर्च सन् 1896 में जमालपुर मुंगेर पथ स्थित संत पॉल्स चर्च की स्थापना नॉर्थ इंडिया द्वारा की गई थी। वहीं चौथा चर्च ईस्ट कॉलोनी अल्बर्ट रोड स्थित बैप्टीस यूनियन चर्च है, इसकी स्थापना 22 मई 1915 ई. में की गयी थी। पूर्वजों की याद में आज भी आते हैं अंग्रेज जमालपुर अंग्रेजों द्वारा स्थापित विभिन्न चर्चों में आज भी पूजा अर्चना जारी है। प्रत्येक साल किसी न किसी देश के अंग्रेज अपने पूर्वजों की कब्र पर आते हैं, और चर्च में पूजा अर्चना कर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कराते हैं। वहीं ईसाइयों की कब्रिस्तान भी जाते हैं, जहां अपने पूर्वजों के लिए गॉड के समक्ष दुआ करते हैं।

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