खेती के साधन बढ़े, पर लागत और जोखिम भी बढ़ा,
हरित क्रांति के बावजूद, बिहार के किसानों को खेती की बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सिंचाई, बीज, और कीटनाशकों की महंगाई ने किसानों की उपज का उचित मूल्य पाने में मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को जलवायु स्मार्ट कृषि अपनाने की जरूरत है।

मुंगेर, निज प्रतिनिधि। हरित क्रांति के बाद खेती के साधन तो जरूर बढ़े हैं। ट्रैक्टर, पंपसेट, थ्रेशर, हार्वेस्टर, हाईब्रिड बीज, कीटनाशक और उन्नत खाद सब कुछ किसान के पास पहुंचा। लेकिन हकीकत यह है कि पहले की तुलना में खेती की लागत कई गुना बढ़ गई है और जोखिम भी। सिंचाई, बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और भंडारण पर भारी खर्च के बावजूद किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। किसानों से बातचीत में सामने आया कि एक एकड़ धान की खेती पर अब 25 से 30 हजार रुपये तक खर्च आ जाता है। डीजल महंगा होने से सिंचाई की लागत बढ़ी है।
अच्छी क्वालिटी का बीज, डीएपी-यूरिया और कीटनाशक भी महंगे हुए हैं। कटाई और मड़ाई में मजदूरी बढ़ी है। भंडारण की सुविधा न होने से तुरंत बेचना मजबूरी है। नतीजा, व्यापारी औने-पौने दाम पर खरीद लेते हैं। एमएसपी का लाभ गिने-चुने किसानों को ही मिल पाता है। मुंगेर के बरियारपुर प्रखंड के किसान रामविलास मंडल कहते हैं, पहले हल-बैल से खेती करते थे, खर्च कम था। अब सब मशीन से होता है, लेकिन एक बीघा में 5 हजार का डीजल ही लग जाता है। धान बेचें तो 1800-1900 रुपये क्विंटल, जबकि लागत 2200 से ऊपर पड़ती है।----जलवायु परिवर्तन बनी सबसे बड़ी चुनौती :कृषि वैज्ञानिक डा. विनोद कुमार का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने खेती को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। मौसम की अनिश्चितता बढ़ी है। कभी असमय बारिश तो कभी लंबा सूखा। ओलावृष्टि, आंधी, बाढ़ और सूखा अब हर साल किसानों के लिए नई चुनौती लेकर आते हैं। मार्च-अप्रैल में बेमौसम बारिश और ओले से गेहूं, दलहन और सब्जी की फसल बर्बाद हो जाती है। मानसून की बेरुखी से धान की रोपनी पिछड़ती है। ज्यादा बारिश से खेतों में जलजमाव हो जाता है।------सूख रहे पारंपरिक जलस्रोत :सिंचाई के पारंपरिक स्रोत आहर, पइन, पोखर और कुएं या तो सूख गए हैं या विलुप्त हो गए हैं। नहरों की स्थिति बदहाल है। टेल एंड तक पानी नहीं पहुंचता। भू-जल स्तर भी लगातार नीचे जा रहा है। मजबूरी में किसानों को डीजल पंप या सबमर्सिबल पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे सिंचाई महंगी हो गई है। जमालपुर के किसान सुरेश यादव बताते हैं, कि पहले गांव के पास बड़ी पइन थी, उसी से पूरा गांव पटवन करता था। अब पइन पर अतिक्रमण हो गया। नहर में पानी नहीं आता। 400 फीट बोरिंग करानी पड़ी, तब जाकर पटवन हो रहा है।-----कृषि वैज्ञानिक की राय: जोखिम प्रबंधन पर दें जोर :बिहार कृषि विज्ञान केन्द्र मुंगेर के कृषि वैज्ञानिक मुकेश कुमार कहते हैं, किसानों को अब ‘जलवायु स्मार्ट कृषि’ अपनानी होगी। कम पानी में होने वाली फसलें, छोटी अवधि की प्रजाति, मौसम पूर्वानुमान आधारित खेती, फसल बीमा और प्रसंस्करण पर जोर देना होगा। सरकार को एमएसपी के साथ-साथ भंडारण, ग्रेडिंग और मार्केट लिंकेज मजबूत करना होगा। पारंपरिक जलस्रोतों का जीर्णोद्धार और सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देना समय की मांग है।किसान महेश कुमार, प्रीतम सिंह , सोने लाल का कहना है कि जब तक लागत कम नहीं होगी और फसल का वाजिब दाम नहीं मिलेगा, तब तक खेती घाटे का सौदा बनी रहेगी। सरकार को सिर्फ उत्पादन नहीं, ‘किसान की आमदनी’ बढ़ाने की नीति पर काम करना होगा।
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