सत्याग्रह पार्क का अस्तिव संकट में असामाजिक तत्वों का बना रहता डर
शहर के सत्याग्रह पार्क का अस्तित्व संकट में है। इसकी सुंदरता घट रही है और असामाजिक तत्वों की गतिविधियों के कारण लोग पार्क में जाने से डर रहे हैं। पार्क में सुविधाओं की कमी और सुरक्षा की व्यवस्था न होना मुख्य समस्याएँ हैं। 2015 में विकास के बाद भी पार्क की स्थिति खराब हो गई है।

शहर के सत्याग्रह पार्क का अस्तित्व संकट में है। इसकी सौंदर्य मिटती जा रही है। इस कारण लोग पार्क में कम आ रहे है। वर्ष 2015 में पार्क का शुभारंभ हुआ तो शहर के लोगों को एक अच्छी जगह मिली, जहां लोग बिना शोरगुल सुबह-शाम समय बिताते थे। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक पार्क की ताजी हवा का आनंद लेते थे। छुट्टियों के दिनों में यहां काफी भीड़ होती थी। पार्क में दस रुपये का टिकट लगता है, लेकिन व्यवस्थाएं बदहाल हैं। पार्क की चहारदीवारी के बाहर जुआरियों का अड्डा लगता है। जार्ज ऑरवेल की जन्मस्थली के परिसर में भी जुआरियों का जमावड़ा लगता है।
पार्क में टहलने वाले लोगों के सामान पलक झपकते लेकर भाग जाते हैं। टहलने आनेवाले लोग हमेशा भयभीत रहते हैं। लोगों का कहना है कि सुरक्षा की मुक्कमल व्यवस्था नहीं होने से असामाजिक तत्वों का मनोबल बढ़ा रहता है। हर के सत्याग्रह पार्क को इतना सुन्दर बनाया गया था कि थकान के बाद लोग सुबह व शाम वहीं बीताना पसंद करते थे। ऐसा कोई दूसरा पार्क भी नहीं था। जहां आराम से लोग सुबह की सैर कर सकें या अपना वक्त गुजार सकें। यह पार्क शहर के गोपाल साह उच्च विद्यालय के समीप है। लेकिन अब सत्याग्रह पार्क का सौंदर्य दिनोंदिन खराब हो रहा है। पार्क में लोगों के बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं है। पेयजल व शौचालय की कमी है। असामाजिक तत्वों का कब्जा रहता है। उमेश कुमार का कहना है कि यहां प्रतिदिन सुबह व शाम करीब पांच सौ से अधिक लोग टहलने आते हैं। सुबह में पार्क समय से नहीं खुलता। लोगों को पार्क में प्रवेश के लिए इंतजार करना पड़ता है। लोगों के बैठने की सही व्यवस्था नहीं है। पेयजल व शौचालय की कमी है। अमरेन्द्र सिंह ने बताया कि 2015 में सत्याग्रह पार्क के विकास व सौंदर्यीकरण पर लाखों रुपये खर्च किये गये थे। पार्क विरान हो गयी है। पाथवे व हरियाली गायब है। शुद्ध हवा भी नहीं मिलती है। रामभजन का कहना है कि इस पार्क को विकसित करने के लिए वन विभाग को जिम्मेवारी दी गयी है। इस बार के बजट में भी वन विभाग के जिम्मे वाले पार्क को शामिल किया गया है। इसे सजाने की जरुरत है। ताकि यहां पहुंचने वाले लोगों को सकुन मिल सके। बबन कुशवाहा ने कहा कि नगर निगम के सफाईकर्मी भी सुबह में टहलने के समय पहुंचते हैं। सफाईकर्मी झाडू से सफाई में जुट जाते हैं। टहलने वाले धूलकण से परेशान होते हैं। सफाई के समय में बदलाव जरुरी है। अजय कुमार गुप्ता ने कहा कि पार्क में चहारदीवारी है और पौधे भी लगाये गये हैं। असामाजिक तत्व चहारदीवारी फांदकर पार्क में घुस जाते हैं। पेड़ की टहनी काट लेते हैं। पानी का नल तोड़ देते हैं। राजेश सिंह ने कहा कि पार्क में बनाये गये उडेन गजीबो टूटकर अपना स्वरुप खो चुके हैं। मरम्मत नहीं किया गया है। उस पर चढ़ने से लोग कतराते हैं। उसका रंगरोगन व सुन्दरता लुप्त हो गयी है। पार्क विरान हो गया है। झूले के जंजीर जहां-तहां टूटने के साथ रंगहीन हो गए हैं। राजीव कुमार राजू ने कहा कि झरना की पाइप गायब हो गये हैं। झरना बेस ही समाप्त हो गया है। वह देखने में पहाड़ की तरह टीलानुमा लगता है। इसे फिर से सजाने व संवारने की जरुरत है। अजय कुमार तिवारी का कहना है कि पार्क के सभी बेंच टूट गए हैं । पाथवे को भी समाप्त कर दिया गया है। बहुत पहले पाथवे का ईंट उखाड़ा गया है। जहां बालू व मिट्टी है। उसका निर्माण कार्य शीघ्र पूरा नहीं किया जा रहा है। हवा में धूलकन उड़ने से पार्क में जाने वाले लोगों का सुबह का समय बेकार हो जाता है। गंदी व प्रदूषित हवा वहां चारों तरफ फैली रहती है। मोहम्मद असलम खान का कहना है कि पार्क में शौचालय बनाये गये हैं। शौंचालयों की संख्या छह है। किसी का दरवाजा बंद नहीं हो सकता है। सभी टूटे हैं। शौचालय की सीढ़ी से लेकर अंदर तक गंदगी भरी है। करीब जाते हैं बदबू से परेशानी बढ़ जाती है। शौचालय की साफ सफाई व मरम्मत की आवश्यकता है। सुधीर कुमार गुप्ता का कहना है कि पार्क की चहारदीवारी को उंची कर कंटीली तार से घेराबंदी की आवश्यकता है। ताकि असामाजिक तत्वों का बाहर से उसमें प्रवेश नहीं हो सके। दिन व शाम को चाहरदीवारी के समीप नशेबाज जुआ खेलते रहते हैं। आपस में मारपीट व गाली ग्लौज करते हैं। वहां काफी शोर मचाने लगते हैं।

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