
बिहार की 5 दर्जन से अधिक नदियों के अस्तित्व पर संकट, क्या है वजह
कई नदियों की स्थिति ऐसी है कि उनके बहाव क्षेत्र में किसान खेती कर रहे हैं। कई जगह पर मानसून बीतते नदियों के बीच बड़े-बड़े मैदान बन जाते हैं और बच्चों के लिए वह खेल का मैदान बन जाता है। कई जगहों पर मेला लगने लगता है।
बिहार की पांच दर्जन से अधिक नदियों का अस्तित्व खतरे में है। जीवनदायिनी ये नदियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गयी हैं। कई नदियां अतिक्रमण के कारण अंतिम सांसें ले रही हैं। यही नहीं जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण, बेहतर प्रबंधन का अभाव और सरकारी तंत्र की लापरवाही के कारण ये बरसाती नदियां बनकर रह गयी हैं।
ये हालात बिहार के किसी एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि हर तरफ के हैं। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों की बात करें तो कोसी, सीमांचल और पूर्वी बिहार के जिलों में बहने वाली एक दर्जन से अधिक नदियों के वजूद पर संकट है। सहरसा जिले में कोसी की सहायक नदी तिलावे और सुरसर नदी का वजूद मिटने के कगार पर है। सिमरी बख्तियारपुर के धनुपुरा में कमला बलान, सिमरटोका नदी, दह कोसी उपधारा, आगर नदी पूरी तरह से सूख गई है। अररिया जिले के रानीगंज प्रखंड से गुजरने वाली कारी कोसी नदी के अस्तित्व पर संकट है।
सौरा नदी अतिक्रमण के कारण नाले में तब्दील होती जा रही है
वहीं, सौरा नदी जो दशकों पहले अपने उन्मुक्त धारा के साथ बहती थी, लगातार हो रहे अतिक्रमण के कारण नाले में तब्दील होती जा रही है। कटिहार जिले में कोसी धारा में गाद जमा होने के कारण यह नदी लगभग विलुप्त है। जमुई जिले के लक्ष्मीपुर प्रखंड के सबलपुर जंगली इलाके से बहने वाली दुहवा, सिर्मनिया नदी अपना अस्तित्व खो चुकी है।
इस नदी में करीब पांच किलोमीटर पहाड़ के पानी का बहाव होता है। अब सिर्फ बरसात के दिनों में ही इस नदी में पानी का बहाव होता है। लखीसराय जिले की प्रमुख नदियों में शामिल किऊल नदी, हरोहर नदी अतिक्रमण की चपेट में है। इससे इनका अस्तित्व खतरे में है। बांका जिले की प्रमुख नदियां बदुआ, चांदन, ओढ़नी और चीर भी आखिरी सांस ले रही है। जिससे इलाके में सिंचाई और खेती में किसानों को परेशानी हो रही है।
कहीं खेती शुरू हो गई कहीं बन गए खेल मैदान
कई नदियों की स्थिति ऐसी है कि उनके बहाव क्षेत्र में किसान खेती कर रहे हैं। कई जगह पर मानसून बीतते नदियों के बीच बड़े-बड़े मैदान बन जाते हैं और बच्चों के लिए वह खेल का मैदान बन जाता है। कई जगहों पर मेला लगने लगता है। वहीं, कई जगह पर नदी सूखने के बाद वहां अतिक्रमण बढ़ते जा रहा है, जिससे नदी के अस्तित्व खतरा बढ़ गया है।





