बिहार के आंगनबाड़ी केंद्रों में तीन साल में 27% बच्चे कम कैसे हो गए, फर्जीवाड़े का बड़ा खेल

Nishant Nandan हिन्दुस्तान, प्रमुख संवाददाता, पटना
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आईसीडीएस के सूत्रों की मानें तो अधिकतर सेविकाओं की ओर से बच्चों की सही संख्या नहीं देकर कुछ फर्जी नाम डाल दिये जाते थे। यह फर्जी नाम जब फेस कैप्चरिंग सिस्टम शुरू हुआ तो पकड़ में आने लगा। फेस कैप्चरिंग सिस्टम से चेहरे की पहचान की जाती है।

बिहार के आंगनबाड़ी केंद्रों में तीन साल में 27% बच्चे कम कैसे हो गए, फर्जीवाड़े का बड़ा खेल

बिहार के आंगनबाड़ी केंद्रों पर तीन साल में 25 फीसदी बच्चे कम हो गए। फेस कैप्चरिंग सिस्टम शुरू हुई तो बच्चों की संख्या घटती गई। आंगनबाड़ी केन्द्र में तीन से छह साल की उम्र के बच्चों के पंजीयन की संख्या लगातार कम हो रही है। मार्च 2024 में तीन से छह साल तक के 55 लाख 60 हजार 315 बच्चे पंजीकृत थे। मार्च 2026 में 40 लाख 35 हजार 339 बच्चे ही पंजीकृत हुए, जबकि वर्ष 2023 मार्च में यह संख्या बढ़कर 51 लाख 72 हजार हो गई। यह संख्या वर्ष 2024 में बढ़कर 55 लाख 60 हजार हो गई है। लेकिन फेस कैप्चरिंग सिस्टम लागू होने के बाद हर साल बच्चों की संख्या में कमी आ रही है।

बता दें कि 2024 में राज्य के सभी आंगनबाड़ी केंद्र में फेस कैप्चरिंग सिस्टम यानी फेस डिटेक्शन तकनीक लागू की गई। इसके तहत आंगनबाड़ी केंद्र की सेविकाओं को सभी लाभार्थी के चेहरे की तस्वीर लेकर उसे पोषण ट्रैकर एप पर अपलोड करने को कहा गया था। सिस्टम के शुरू होने के बाद हर महीने बच्चों की संख्या में कमी आने लगी। अब स्थिति यह है कि दो साल में 55 लाख से घटकर 40 लाख बच्चों की संख्या हो गयी है।

बच्चों की लाइव फोटो को आधार कार्ड डेटा से लिंक किया गया तो इसका खुलासा हुआ

बच्चों को पोषाहार वितरण और विभिन्न योजना का लाभ उसी बच्चे को देना है, जो आंगनबाड़ी केंद्र में पंजीकृत हैं। पहली बार पंजीकृत बच्चे का आधार नंबर से लिंक किया गया। इसके बाद चेहरे को स्कैन करके उसे पोषण ट्रैकर एप पर अपलोड किया गया। सत्यापित होने के बाद ही बच्चे को राशन दिया गया। इसकी निगरानी हर महीने होती है। इससे जिन आंगनबाड़ी केंद्र में सेविकाओं की ओर से संख्या गिनाने के लिए फर्जी नाम (बेनामी नाम) डाल दिये जाते थे। उसे पकड़ा जाने लगा।

इससे हर महीने बच्चों की संख्या कम होती गयी। आईसीडीएस के सूत्रों की मानें तो अधिकतर सेविकाओं की ओर से बच्चों की सही संख्या नहीं देकर कुछ फर्जी नाम डाल दिये जाते थे। यह फर्जी नाम जब फेस कैप्चरिंग सिस्टम शुरू हुआ तो पकड़ में आने लगा। फेस कैप्चरिंग सिस्टम से चेहरे की पहचान की जाती है। आंगनबाड़ी केंद्र में पंजीकृत बच्चों के चेहरे की तस्वीर लेकर सेविकाओं की ओर से उसे एप पर अपलोड किया जाता है। इससे पता चलता है कि बच्चे नियमित आ रहे है या नहीं। यह एक प्रकार का वेरिफिकेशन सिस्टम है, जो कैप्चर किए गए चेहरे की तुलना पहले से मौजूद डेटाबेस से की जाती है।

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लेखक के बारे में

Nishant Nandan
एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सेवाएं दे रहे निशांत नंदन डिजिटल पत्रकारिता में आने से पहले इलेक्ट्रॉनिक/प्रसारण मीडिया में लंबे समय तक काम कर चुके हैं। निशांत ने अपने करियर की शुरुआत ETV बिहार से की थी। इसके बाद वो मौर्य न्यूज, आर्यन न्यूज, न्यूज वर्ल्ड इंडिया जैसे संस्थानों में अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर चुके हैं। साल 2018 में इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के साथ डिजिटल पत्रकारिता का सफर शुरू करने के बाद निशांत साल 2021 में लाइव हिन्दुस्तान से जुड़े। निशांत मूल रूप से बिहार के भोजपुर जिले के रहने वाले हैं। आरा में शुरुआती शिक्षा के बाद इन्होंने नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की है। और पढ़ें
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