मिथिलांचल-कोसी रूट पर सिर्फ लोकल ट्रेनें, एक्सप्रेस के अभाव में थमा व्यापार
मधुबनी में सकरी-झंझारपुर-निर्मली रेल लाइन की उपयोगिता का विस्तार नहीं हो पा रहा है। प्रवासियों को दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों तक नियमित ट्रेन सेवा की कमी का सामना करना पड़ रहा है। व्यापारियों और छात्रों ने इस रूट पर नियमित सुपरफास्ट ट्रेनों की मांग की है। रेलवे को इस क्षेत्र की विकास क्षमता को पहचानना चाहिए।

मधुबनी । कहते हैं कि रेल की पटरियां केवल लोहे की कड़ियां नहीं, बल्कि क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक प्रगति का जरिया होती है। मिथिला और कोशी-सीमांचल को जोड़ने वाली सकरी-झंझारपुर-निर्मली रेल लाइन के लिए यह बात शिद्दत से लागू होती है। दशकों के इंतजार और 1934 के विनाशकारी भूकंप के बाद टूटे संपर्क को बहाल करने का सपना साल 2019 में बड़ी लाइन बिछाने के साथ पूरा तो हो गया, लेकिन आज पांच साल बाद भी यह रेलखंड अपनी उपयोगिता के विस्तार का इंतजार कर रहा है। लाखों प्रवासियों की आंखों में जो चमक 2019 में दिखाई दी थी। वह अब धुंधली पड़ती जा रही है।
इसका कारण है कि प्रवासियों के लिए दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों तक सीधी और नियमित पहुंच अब भी चुनौती बना हुआ है। व्यापारियों से लेकर प्रवासियों तक की एक ही शिकायत है कि उन्हें आवागमन के लिए परेशानी अब भी झेलनी पड़ रही है। छात्र शिक्षा के लिए महानगरों से सीधी कनेक्टिविटी चाहते हैं। दरअसल, जब तक झंझारपुर और निर्मली से महानगरों के लिए दैनिक सुपरफास्ट ट्रेनें शुरू नहीं की जाती, तब तक इस क्षेत्र का आर्थिक विकास अधूरा ही रहेगा। बड़ी लाइन बनने के बाद भी स्पेशल ट्रेनों के भरोसे प्रवासियों का सफर : सकरी-निर्मली रेलखंड का इतिहास संघर्ष और धैर्य का उदाहरण है। आधी सदी से अधिक समय तक इस क्षेत्र के लोगों ने इस संपर्क के दोबारा जुड़ने का इंतजार किया। उम्मीद थी कि आमान परिवर्तन के बाद झंझारपुर और निर्मली जैसे महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन देश की राजधानी और प्रमुख आर्थिक केंद्रों से सीधे जुड़ेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि वर्तमान में इस रूट पर केवल एक दानापुर इंटरसिटी एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनों का ही नियमित परिचालन हो रहा है।रेलवे के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस क्षेत्र से हर साल लाखों की संख्या में लोग रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली, सूरत, मुंबई, कोलकाता और गुवाहाटी जैसे महानगरों का रुख करते हैं। होली, दीपावली और छठ जैसे महापर्वों पर जब इन प्रवासियों के कदम अपने गांव की ओर बढ़ते हैं, तो उनके हिस्से में केवल स्पेशल ट्रेनों की अनिश्चितता और भारी भीड़ ही आती है। सवाल यह उठता है कि जिस रेलखंड में उत्तर भारत और पूर्वोत्तर को जोड़ने वाला सबसे सुगम वैकल्पिक मार्ग बनने की क्षमता है, उसे केवल स्थानीय आवाजाही तक ही सीमित रखना न्यायोचित नहीं है। झंझारपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के प्रवासियों के लिए घर आना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता है। इस साल भी होली के अवसर पर रेलवे द्वारा आधा दर्जन स्पेशल ट्रेनें चलाई गईं, लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि यह केवल एक बैंड-एड लगाने जैसा है। करोड़ों रुपये खर्च कर बड़ी लाइन बिछाई गई और बिजली की तारें भी दौड़ने लगीं, लेकिन लंबी दूरी की नियमित ट्रेनों का अभाव आज भी बरकरार है। यहां के लाखों प्रवासी जो सूरत, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में अर्थव्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं, उन्हें अपने घर तक पहुंचना आज भी चुनौती लगता है। स्पेशल ट्रेनों का परिचालन मात्र 15 से 30 दिनों के लिए होता है। इसके बाद यात्री फिर उसी पुरानी समस्या और बसों के महंगे किराए के जाल में फंस जाते हैं।करोड़ों की लागत से तैयार विद्युतीकृत रेलखंड का पूर्ण उपयोग न होना न केवल राजस्व की हानि है, बल्कि क्षेत्र के विकास की गति को भी रोकता है। ऊपर से नियमित ट्रेनें न होने के कारण प्रवासियों को निजी बसों या अन्य रूटों से लंबी यात्रा कर घर पहुंचना पड़ता है, जो उनकी जेब पर भारी पड़ता है।विकास की राह में 'लाल सिग्नल': झंझारपुर और निर्मली के व्यापारिक संघों और स्थानीय संगठनों ने कई बार रेल मंत्रालय को ज्ञापन सौंपा है। उनकी मांग स्पष्ट है: इस रूट को केवल 'वैकल्पिक' नहीं, बल्कि 'मुख्य' धारा से जोड़ा जाए। जानकारों के अनुसार, यदि इस रेलखंड से दिल्ली और कोलकाता के लिए नियमित एक्सप्रेस ट्रेनें शुरू की जाती हैं, तो यह न केवल यात्रियों के लिए सुगम होगा, बल्कि मिथिलांचल के उत्पादों (जैसे मखाना और मछली) को बड़े बाजारों तक ले जाने में भी क्रांतिकारी बदलाव लाएगा। वर्तमान में, समस्तीपुर, बरौनी और दरभंगा के दबाव को कम करने के लिए यह रेलखंड सबसे बेहतर विकल्प है। बावजूद इसके, लंबी दूरी की ट्रेनों के लिए तकनीकी कारणों या रैक की कमी का हवाला देकर 'सिग्नल' को लाल रखा गया है।उत्तर और पूर्वोत्तर भारत के बीच सीधी ट्रेन सेवा बहाल होझंझारपुर-लौकहा के रेल नेटवर्क को सुदृढ़ करने और स्थानीय यात्रियों को लंबी दूरी की यात्रा में सहूलियत दिलाने के संबंध में क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों और रेल यात्रियों की माने तो इस रेलखंड को उत्तर और पूर्वोत्तर भारत के बीच सीधी ट्रेन सेवा बहाल करने की जरूरत है। इससे न केवल मुख्य रेल मार्गों पर दबाव कम होगा, बल्कि सामरिक और व्यापारिक दृष्टिकोण से भी यह क्षेत्र सशक्त होगा। स्थानीय लोगों का कहना है कि झंझारपुर और निर्मली से होकर दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे प्रमुख महानगरों के लिए कम से कम दो जोड़ी दैनिक सुपरफास्ट ट्रेनों का परिचालन शुरू किया जाए। वर्तमान में सीधी ट्रेनों के अभाव में यात्रियों को निजी वाहनों या अन्य साधनों से दूर-दराज के स्टेशनों तक पहुंचना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की हानि होती है। लंबी दूरी की ट्रेनों के ठहराव और सुरक्षित परिचालन को देखते हुए झंझारपुर, लौकहा और निर्मली स्टेशनों पर वाशिंग पिट और रैक पॉइंट जैसी तकनीकी सुविधाएं अनिवार्य रूप से बनाने पर जोर दिया गया है। इन सुविधाओं के उपलब्ध होने से ट्रेनों का रख-रखाव स्थानीय स्तर पर संभव हो सकेगा। इस रेलखंड के विकास से न केवल यात्रियों को लाभ होगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी सुधार की उम्मीद है। सुझाव के अनुसार क्षेत्र के कृषि उत्पादों के सुगम परिवहन के लिए विशेष पार्सल वैन या 'किसान रेल' की शुरुआत की जानी चाहिए। इससे मखाना, मछली और अन्य स्थानीय उत्पादों को बड़े बाजारों तक तेजी से पहुंचाया जा सकेगा, जिससे किसानों की आय में सीधे तौर पर वृद्धि होगी।कनेक्टिविटी में सुधार की मांग: ग्रामीण यात्रियों की सुविधा के लिए वर्तमान पैसेंजर ट्रेनों के समय सारिणी में बदलाव का भी प्रस्ताव है। यात्रियों के अनुसार पैसेंजर ट्रेनों का समय लंबी दूरी की एक्सप्रेस ट्रेनों के साथ इस तरह जोड़ा जाना चाहिए कि जंक्शनों पर पहुंचने के बाद लोगों को अगली ट्रेन के लिए घंटों भटकना न पड़े। कनेक्टिविटी बेहतर होने से झंझारपुर और निर्मली के आसपास के ग्रामीण इलाकों की निर्भरता सड़क मार्ग से कम होगी और रेलवे के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी।मिथिलांचल और कोशी का यह एकीकरण केवल भौगोलिक नहीं था, यह इस क्षेत्र के भविष्य की आधारशिला थी। रेलवे को यह समझना होगा कि केवल पटरियां बिछा देने से उद्देश्य पूरा नहीं होता, उन पटरियों पर नियमित पहियों का दौड़ना भी जरूरी है। जब तक झंझारपुर-निर्मली रेलखंड को नियमित लंबी दूरी की ट्रेनों से नहीं जोड़ा जाता, तब तक यहां के प्रवासियों के लिए 'घर पहुंचना' एक सपना ही बना रहेगा। क्या रेल मंत्रालय इस क्षेत्र की क्षमता को पहचानेगा, या फिर हर साल की तरह केवल 'स्पेशल' ट्रेनों के नाम पर खानापूर्ति की जाती रहेगी? यह प्रश्न आज मिथिलांचल के हर उस घर में गूंज रहा है, जिसका बेटा परदेस में रहकर घर आने के सुरक्षित और सुलभ साधन का इंतजार कर रहा है।--------------बोले जिम्मेदार----------- सकरी-झंझारपुर-निर्मली रेलखंड मंडल की प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में से एक है। आमान परिवर्तन और विद्युतीकरण के बाद अब प्रबंधन का पूरा ध्यान परिचालन के विस्तार पर है। रेलवे झंझारपुर और निर्मली स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ तकनीकी बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने का लक्ष्य रखा है। रेलवे इस रूट को देश के अन्य प्रमुख महानगरों से जोड़ने वाली नियमित एक्सप्रेस ट्रेनों के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। समय आने पर अंतिम रूप दिया जाएगा, ताकि प्रवासियों और स्थानीय व्यापारियों को स्थायी राहत मिल सके।-ज्योति प्रकाश मिश्र, डीआरएम
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