कम शिक्षक, जर्जर भवन व दूषित पेयजल, बस नाम का ‘मॉडल स्कूल’

Feb 18, 2026 11:30 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, मधुबनी
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मिथिलांचल का महादेव पूरण टिबरेवाल प्लस टू हाई स्कूल (एमपीटी हाई स्कूल) अपनी पहचान खोने की कगार पर है। 1958 में स्थापित इस स्कूल में छात्रों की संख्या 1021 है, लेकिन केवल 8 कमरे हैं। संसाधनों की कमी और बुनियादी सुविधाओं की अनुपस्थिति के कारण यह स्कूल अब खंडहर में बदल गया है।

कम शिक्षक, जर्जर भवन व दूषित पेयजल, बस नाम का ‘मॉडल स्कूल’

मिथिलांचल की धरती अपनी विद्वता और शैक्षणिक गौरव के लिए जानी जाती है, लेकिन इस धरती का एक प्रतिष्ठित संस्थान आज अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। झंझारपुर का हृदय स्थल कहे जाने वाले और रेलवे स्टेशन के ठीक सामने स्थित महादेव पूरण टिबरेवाल प्लस टू हाई स्कूल (एमपीटी हाई स्कूल) अपनी पहचान खोने की कगार पर है। इस स्कूल की स्थापना 1958 में हुआ था। एक समय था जब इस स्कूल का नाम पूरे जिले में सम्मान के साथ लिया जाता था। अभिभावक अपनी बेटियों को यहां भेजने में गर्व और सुरक्षा महसूस करते थे। लेकिन आज, सरकारी फाइलों में इसे 'मॉडल स्कूल' का तमगा तो दे दिया गया है, मगर धरातल पर यह किसी भयावह खंडहर से कम नजर नहीं आता।

रेलवे स्टेशन के ठीक सामने स्थित होने के कारण इस स्कूल की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्कूल के ठीक बगल में रेलवे की पार्किंग है। आज स्थिति यह है कि पार्किंग और स्कूल के बीच की चहारदीवारी घटकर मात्र डेढ़ से दो फीट रह गई है। सड़क पर चलता कोई भी राहगीर स्कूल के भीतर की गतिविधियों को न केवल देख सकता है, बल्कि परिसर में आसानी से दाखिल भी हो सकता है। मुख्य गेट की जर्जर स्थिति किसी अनहोनी को खुला निमंत्रण दे रही है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यहां का माहौल इतना अनुशासित और सुरक्षित था कि अभिभावक बेफिक्र रहते थे, लेकिन अब सुरक्षा का नामोनिशान नहीं बचा है। संसाधनों की भारी कमी: स्कूल में नामांकित छात्र-छात्राओं की संख्या और उपलब्ध कमरों का गणित किसी को भी हैरान कर सकता है। शिक्षा विभाग के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई यहां साफ देखी जा सकती है। स्वीकृत 33 पदों के मुकाबले मात्र 26 शिक्षक कार्यरत हैं। शिक्षकों की कमी और बुनियादी ढांचे का अभाव मिलकर इस संस्थान के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। कुल 1021 विद्यार्थियों के लिए मात्र 8 क्रियाशील कमरे उपलब्ध हैं। इसका अर्थ यह है कि एक छोटे से कमरे में औसतन 125 से 150 बच्चों को बैठने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कल्पना कीजिए कि भीषण गर्मी के मौसम में, जहां एक कमरे में 50 बच्चों का बैठना मुश्किल होता है, वहां तीन गुना बच्चों के साथ पठन-पाठन की गुणवत्ता क्या रहती होगी? बारिश में 'टापू' बन जाता है परिसर: स्कूल का कुल भू-भाग 8522 वर्गमीटर में फैला हुआ है, जिसमें एक विशाल मैदान भी है। लेकिन यह मैदान आज अभिशाप बन गया है। जल निकासी (ड्रेनेज) की कोई व्यवस्था न होने के कारण हल्की सी बारिश में भी पूरा परिसर एक झील या टापू का रूप ले लेता है। छात्राओं के लिए कक्षा तक पहुंचना किसी जानलेवा जोखिम से कम नहीं होता। कीचड़ और जलजमाव के बीच से रास्ता बनाते समय कई बार छात्र फिसलकर चोटिल हो चुके हैं। मैदान की हालत इतनी खराब है कि खेलकूद की गतिविधियां तो दूर, बच्चों का वहां खड़ा होना भी दूभर है। रखरखाव के अभाव में शौचालय क्षतिग्रस्त : एक तरफ 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और 'स्वच्छ भारत' का नारा दिया जाता है, वहीं इस स्कूल में 494 छात्राएं न्यूनतम सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं। स्कूल में पेयजल के लिए न तो कोई आरओ प्लांट है और न ही समरसेबल पंप। बच्चों को प्यास बुझाने के लिए बाहर के असुरक्षित स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। स्कूल में कहने को दो महिला और दो पुरुष शौचालय हैं, लेकिन रखरखाव के अभाव में वे इतने क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि उनका उपयोग करना बीमारी को दावत देने जैसा है। झड़ता प्लास्टर और लटकते सरिया: स्कूल को 2016 में प्लस टू का दर्जा मिला था। वर्तमान में इस भवन की हालत इतनी गंभीर है कि बाहरी छज्जे टूटकर गिर चुके हैं। बरामदे और कमरों की छत से ढलाई का हिस्सा और प्लास्टर आए दिन गिरता रहता है, जिससे छतों के लोहे का सरिया अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। स्कूल में 11वीं और 12वीं कक्षा की पढ़ाई होती है, जहां कुल 700 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं। (11वीं में 307 और 12वीं में 393)। विडंबना यह है कि इतने छात्रों के भविष्य की जिम्मेदारी सिर्फ 14 शिक्षकों के कंधों पर है। स्कूल में आज भी वनस्पति विज्ञान, मैथिली, भूगोल, उर्दू, गणित और अर्थशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। प्रशासनिक उपेक्षा का आलम यह है कि केवल बाहरी दिखावे पर ध्यान दिया गया, जबकि भवन की बुनियादी मजबूती और शिक्षकों की कमी जैसे गंभीर मुद्दों को नजरअंदाज कर दिया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?

बोले जिम्मेदार- स्कूल को 'मॉडल स्कूल' का दर्जा मिलना क्षेत्र के लिए गर्व की बात है। इस लक्ष्य तक पहुंचना केवल एक शुरुआत है। अब हमारा ध्यान बुनियादी ढांचे के कायाकल्प पर है। योजना के तहत स्कूल परिसर की चहारदीवारी, सुरक्षित भवन और खेल के मैदान जैसी प्राथमिक जरूरतों को प्राथमिकता दी जाएगी। हमने स्कूल प्रशासन से विकास कार्यों का विस्तृत प्रस्ताव मांगा है। हमारा उद्देश्य विद्यार्थियों को एक आधुनिक और सुरक्षित शैक्षणिक माहौल प्रदान करना है, ताकि वे बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर हो सकें। इन सुधारों को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा। शिव नारायण कुमार सुमन, प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी

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